त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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उन्मत्ताश्च ततोऽभूवन् मार्गाद् भ्रष्टाश्च ते तदा ।
अन्धीभूयातिगहने पतन्तो निम्नभूमिषु ॥ ४३ ॥
कण्टकैःक्षतसर्वाङ्गा भग्नबाहूरुपादकाः ।
अधिक्षिपन्तश्चान्योऽन्यं कलहञ्चक्रुरुच्चकैः ॥ ४४ ॥
मुष्टिभिश्च शिलाभिश्च काष्ठैर्जघ्नुः परस्परम् ।
अथ ते दीर्णसर्वाङ्गाः पुरं कञ्चित् समासदुः ॥ ४५ ॥
निशीथे दैववशतः पुरद्वारमुपाययुः ।
पुरद्वाराधिपालैस्ते प्रतिरुद्धाः प्रवेशने ॥ ४६ ॥
देशकालानभिज्ञानात् कलहञ्चक्रुरुच्चकैः ।
अथ ते प्रहृता द्वारपालैरतितरां यदा ॥ ४७ ॥
तदा पलायनपरा बभूवुः परितस्तु ते ।
पतिताः परिखे केचिद् भक्षिता मकरादिभिः ॥ ४८ ॥
लिये खोज करने लगे तो उन्हें धतूरेके फल मिल गये । भ्रमवश उन
सबने उन्हें नीबू समझकर खा लिया ॥ ४० उ०-४२ ॥
इससे वे और भी पागल हो गये और अपने मार्गसे भटककर उस
घोर जंगलमें गड्ढोंमें गिरने-पड़ने लगे ॥ ४३ ॥
उनके सारे शरीरमें काँटे लग गये, हाथ-पैर और घुटने घायल
हो गये तथा वे एक दूसरेको बुरा-भला कहकर आपसमें बड़ा कलह
करने लगे ॥ ४४ ॥
होते-होते वे एक-दूसरेपर घूँसे, पत्थर और लकड़ियाँ चलाने लगे ।
इससे उनके सब अंग क्षत-विक्षत हो गये । अन्तमें वे किसी नगरके
पास जा निकले ॥ ४५ ॥
दैववश वे आधी रातके समय नगरके द्वारपर पहुँचे । उस समय
द्वारपालने उन्हें नगरमें प्रवेश करनेसे रोका ॥ ४६ ॥
उन्हें कुछ देश-कालका ज्ञान तो था ही नहीं, इसलिये वे
उनके साथ भी झगड़ा करने लगे । अब तो द्वारपालों ने भी उनको
खूब पीटा ॥ ४७ ॥
तब वे इधर-उधर भागने लगे । उनमेंसे कुछ तो नगरकी खाईमें
गिर गये और वहाँ मकर आदि जलजन्तुओंने उन्हें खा लिया ॥ ४८ ॥