त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
पृष्ठ 30, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ें१६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
तदल्पफलमेवेति श्रुतं संवर्त्तवक्त्रतः ।
मन्ये तदहमल्पं यद् दुःखमेवेति सर्वथा ॥ १८ ॥
असुखं नहि दुःखं स्याद् दुःखमल्पं सुखं स्मृतम् ।
यतः सुखात्यये दुःखं भवेद् गुरुतरं किल ॥ १९ ॥
नैतावदेव चैतस्मादधिकं चास्ति वैभवम् ।
मृत्यूपयोगो यद्भूयो न तन्न स्यात्कदाचन ॥ २० ॥
एवमेव भवेद्यन्मे क्रियते त्रिपुराविधौ ।
बालक्रोडेव मे भाति सर्वं तन्मानसं यतः ॥ २१ ॥
एतद्यदुक्तं भवता कर्तुं तस्यादितोऽन्यथा ।
नियतं चाप्यन्यथा तद्वचोभेदसमाश्रयात् ॥ २२ ॥
आलम्बभेदतश्चापि विविधं प्रतिपद्यते ।
कथमेतत्क्रतुसममसत्यफलसम्मितम् ॥ २३ ॥
किन्तु संवर्त्तजीके मुखसे सुना कि वे सब तो तुच्छ फल
देनेवाले हैं। और जो तुच्छ होता है उसे तो मैं सर्वथा दुःखरूप ही
मानता हूँ ॥ १८ ॥
वास्तवमें सुखका अभाव ही दुःख नहीं है, अल्प सुख भी दुःख
ही माना जाता है; क्योंकि सुखका अन्त होनेपर भी बड़ा भारी दुःख
होता है ॥ १९ ॥
इतना ही नहीं, इस कर्मकाण्डमें एक इससे भी बड़ा भय यह है
कि अन्तमें मृत्यु होती है, और ऐसा कोई उपाय नहीं है जिससे वह
न हो ॥ २० ॥
त्रिपुरादेवीकी उपासनामें मैं जो कुछ करता हूँ उससे भी ऐसा ही
होता है। क्योंकि वह सब भी मानसिक व्यापार ही है, अतः मुझे तो
बच्चोंका खेल-सा जान पड़ता है ॥ २१ ॥
आपने जिस विधिसे उपासना करनेको कहा था उस प्रकार भी
की जा सकती है और अन्य प्रकार भी। [ कर्मानुष्ठानके समान ]
विधिसे भी उसका अनुष्ठान हो सकता है और [ भावकी प्रधानतासे ]
बिना विधिके भी; क्योंकि शास्त्रोंमें मतभेद है ही ॥ २२ ॥
इसके सिवा आलम्बन ( इष्टदेव ) के भेदसे भी उपासना अनेक
प्रकारकी है। इस प्रकार असत्य फलवाली होनेसे यह यज्ञोंके समान
ही क्यों नहीं है ? ॥ २३ ॥