तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)
Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary
आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा
अध्याय ५: अजीव काया व षड्द्रव्य लक्षण
अध्याय - ५
तद्भावाव्ययं नित्यम् ॥३१॥
[ तद्भावाव्ययं ] तद्भाव से जो अव्यय है – नाश नहीं होता
सो [ नित्यम् ] नित्य है।
Permanence is indestructibility of the essential
nature (quality) of the substance¹.
अर्पितानर्पितसिद्धेः ॥३२॥
[ अर्पितानर्पितसिद्धेः ] प्रधानता और गौणता से पदार्थों की
सिद्धि होती है।
(The contradictory characteristics are established)
from different points of view.
स्निग्धरूक्षत्वाद्वन्धः ॥३३॥
[ स्निग्धरूक्षत्वात् ] चिकने और रूखे के कारण [ बन्धः ]
दो, तीन इत्यादि परमाणुओं का बन्ध होता है।
Combination of atoms takes place by virtue of
greasy (sticky) and dry (rough) properties
associated with them.
¹ Permanence is the existence of the past nature in the present.
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अध्याय - ५
न जघन्यगुणानाम् ॥३४॥
[ जघन्यगुणानाम् ] जघन्य गुण सहित परमाणुओं का [ न ]
बन्ध नहीं होता।
(There is) no combination between the lowest
degrees of the two properties.
गुणसाम्ये सदृशानाम् ॥३५॥
[ गुणसाम्ये ] गुणों की समानता हो तब [ सदृशानाम् ] समान
जाति वाले परमाणु के साथ बन्ध नहीं होता। जैसे कि - दो
गुण वाले स्निग्ध परमाणु का दूसरे दो गुण वाले स्निग्ध
परमाणु के साथ बन्ध नहीं होता अथवा जैसे स्निग्ध परमाणु
का उतने ही गुण वाले रूक्ष परमाणु के साथ बन्ध नहीं
होता। न - (बन्ध नहीं होता) यह शब्द इस सूत्र में नहीं
कहा परन्तु ऊपर के सूत्र में कहा गया ‘न’ शब्द इस सूत्र में
भी लागू होता है।
(There is no combination) between equal degrees of
the same property.
द्व्यधिकादिगुणानां तु ॥३६॥
[ द्व्यधिकादिगुणानां तु ] दो अधिक गुण हों इस तरह के
गुण वाले के साथ ही बन्ध होता है।
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अध्याय - ५
बन्धेऽधिकौ पारिणामिकौ च ॥३७॥
[ च ] और [ बन्धे ] बन्धरूप अवस्था में [ अधिकौ ] अधिक
गुण वाले के परमाणुओं जितने गुण रूप में [ पारिणामिकौ ]
(कम गुण वाले परमाणुओं का) परिणमन होता है। (यह
कथन निमित्त का है।)
गुणपर्ययवत् द्रव्यम् ॥३८॥
[ गुणपर्ययवत् ] गुण-पर्याय वाला [ द्रव्यम् ] द्रव्य है।
कालश्च ॥३९॥
[ कालः ] काल [ च ] भी द्रव्य है।
अध्याय - ५
सोऽनन्तसमयः ॥४०॥
[ सः ] वह काल द्रव्य [ अनन्त समयः ] अनन्त समय वाला
है। काल की पर्याय यह समय है। यद्यपि वर्तमानकाल एक
समयमात्र ही है तथापि भूत-भविष्य की अपेक्षा से उसके
अनन्त समय हैं।
It (conventional time) consists of infinite instants.
द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः ॥४१॥
[ द्रव्याश्रया ] जो द्रव्य के आश्रय से हों और [ निर्गुणा ]
स्वयं दूसरे गुणों से रहित हों [ गुणाः ] वे गुण हैं।
Those, which have substance as their substratum
and which are not themselves the substratum of
other attributes, are qualities.
तद्भावः परिणामः ॥४२॥
[ तद्भावः ] जो द्रव्य का स्वभाव (निजभाव, निजतत्त्व) है
[ परिणामः ] सो परिणाम है।
The condition (change) of a substance is a mode.
॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे पञ्चमोऽध्यायः ॥
✱ ✱ ✱
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अध्याय - ६
अथ षष्ठोऽध्यायः
Influx of Karma
कायवाङ्मनःकर्म योगः ॥१॥
[ कायवाङ्मनः कर्म ] शरीर, वचन और मन के अवलम्बन
से आत्मा के प्रदेशों का संकल्प होना सो [ योगः ] योग है।
The action of the body, the organ of speech and the
mind is called yoga (activity).
स आस्रवः ॥२॥
[ सः ] वह योग [ आस्रवः ] आस्रव है।
It (this threefold activity) is influx (āsrava).
शुभः पुण्यस्याशुभः पापस्य ॥३॥
[ शुभः ] शुभ योग [ पुण्यस्य ] पुण्य कर्म के आस्रव में
कारण है और [ अशुभः ] अशुभ योग [ पापस्य ] पाप कर्म
के आस्रव में कारण है।
Virtuous activity is the cause of merit (puṇya) and
wicked activity is the cause of demerit (pāpa).
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अध्याय - ६
सकषायाकषाययोः साम्परायिकेर्यापथयोः ॥४॥
[ सकषायस्य साम्परायिकस्य ] कषायसहित जीव के संसार
के कारणरूप कर्म का आस्रव होता है और [ अकषायस्य
ईर्यापथस्य ] कषायरहित जीव के स्थितिरहित कर्म का
आस्रव होता है।
(There are two kinds of influx, namely) that of
persons with passions, which extends
transmigration, and that of persons free from
passions, which prevents or shortens it.
इन्द्रियकषायाव्रतक्रियाः पञ्चचतुःपञ्चपञ्चविंशतिसंख्याः
पूर्वस्य भेदाः ॥५॥
[ इन्द्रियाणि पञ्च ] स्पर्शन आदि पाँच इन्द्रियाँ, [ कषायाः
चतुः ] क्रोधादि चार कषाय, [ अव्रतानि पञ्च ] हिंसा इत्यादि
पाँच अव्रत और [ क्रियाः पञ्चविंशति ] सम्यक्त्व आदि
पच्चीस प्रकार की क्रियायें [ संख्याः भेदाः ] इस प्रकार कुल
39 भेद [ पूर्वस्य ] पहले (साम्परायिक) आस्रव के हैं,
अर्थात् इन सर्व भेदों के द्वारा साम्परायिक आस्रव होता है।
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अध्याय - ६
The subdivisions of the former are the five senses,
the four passions, non-observance of the five vows
and twenty-five activities.¹
तीव्रमन्दज्ञाताज्ञातभावाधिकरणवीर्यविशेषेभ्यस्तद्विशेषः
॥६॥
[ तीव्रमन्दज्ञाताज्ञातभावाधिकरण-वीर्य-विशेषेभ्यः ]
तीव्रभाव, मन्दभाव, ज्ञातभाव, अज्ञातभाव, अधिकरणविशेष
और वीर्यविशेष से [ तद्विशेषः ] आस्रव में विशेषता-
हीनाधिकता होती है।
Influx is differentiated on the basis of intensity or
feebleness of thought-activity, intentional or
unintentional nature of action, the substratum and
its peculiar potency.
अधिकरणं जीवाजीवाः ॥७॥
[ अधिकरणं ] अधिकरण [ जीवाजीवाः ] जीवद्रव्य और
अजीवद्रव्य ऐसे दो भेदरूप है; इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि
आत्मा में जो कर्मास्रव होता है उसमें दो प्रकार का निमित्त
होता है; एक जीव निमित्त और दूसरा अजीव निमित्त।
¹ A literal meaning of the text would read as follows: ‘The
subdivisions of the former are senses, the passions, the non-
observance of the vows and the activities, which are of five, four,
five and twenty-five kinds respectively.’
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अध्याय - ६
The living and the non-living constitute the
substrata.
आद्यं संरम्भसमारम्भारम्भयोगकृतकारितानुमतकषाय-
विशेषैस्त्रिस्त्रिस्त्रिश्चतुश्चैकशः ॥८॥
[ आद्यं ] पहला अर्थात् जीव अधिकरण-आस्रव
[ संरम्भसमारम्भारम्भयोग, कृतकारितानुमतकषायविशेषैः
च ] संरम्भ-समारम्भ-आरम्भ, मन-वचन-कायरूप तीन योग,
कृत-कारित-अनुमोदना तथा क्रोधादि चार कषायों की
विशेषता से [ त्रिः त्रिः त्रिः चतुः ] 3 × 3 × 3 × 4
[ एकशः ] 108 भेदरूप है।
The substratum of the living is of 108 kinds.²
निर्वर्तनानिक्षेपसंयोगनिसर्गा द्विचतुर्द्वित्रिभेदाः परम् ॥९॥
[ परम् ] दूसरा अजीवाधिकरण आस्रव [ निर्वर्तना द्वि ] दो
प्रकार की निर्वर्तना, [ निक्षेप चतुः ] चार प्रकार के निक्षेप
[ संयोग द्वि ] दो प्रकार के संयोग और [ निसर्गा त्रिभेदाः ]
तीन प्रकार के निसर्ग ऐसे कुल 11 भेदरूप है।
² Literal version. The substratum of the living is planning to
commit violence, preparation for it, and commencement of it, by
activity, doing, causing it done, and approval of it, and issuing from
the passions, which are three, three, three, and four respectively.
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अध्याय - ६
Production, placing, combining and urging are the
substratum of the non-living.
तत्प्रदोषनिह्नवमात्सर्यान्तरायासादनोपघाता
ज्ञानदर्शनावरणयोः ॥१०॥
[ तत्प्रदोष निह्नव मात्सर्यान्तरायासादनोपघाताः ] ज्ञान और
दर्शन के सम्बन्ध में करने में आये हुये प्रदोष, निह्नव,
मात्सर्य, अन्तराय, आसादन और उपघात ये
[ ज्ञानदर्शनावरणयोः ] ज्ञानावरण तथा दर्शनावरण कर्मास्रव
के कारण हैं।
Spite against knowledge, concealment of
knowledge, non-imparting of knowledge out of
envy, causing impediment to acquisition of
knowledge, disregard of knowledge, and
disparagement of true knowledge, lead to the influx
of karmas which obscure knowledge and
perception.
दुःखशोकतापाक्रन्दनवधपरिवेदनान्यात्मपरोभय-
स्थानान्यसद्वेद्यस्य ॥११॥
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अध्याय - ६
[ आत्मपरोभयस्थानानि ] अपने में, पर में और दोनों के
विषय में स्थित [ दुःखशोकतापाक्रन्दनवधपरिदेवनानि ]
दुःख, शोक, ताप, आक्रन्दन, वध और परिदेवन ये
[ असद्वेद्यस्य ] असातावेदनीय कर्म के आस्रव के कारण हैं।
Suffering, sorrow, agony, moaning, injury, and
lamentation, in oneself, in others, or in both, lead
to the influx of karmas which cause unpleasant
feeling.
भूतव्रत्यनुकम्पादानसरागसंयमादियोगः क्षान्तिः
शौचमिति सद्वेद्यस्य ॥१२॥
[ भूतव्रत्यनुकम्पा ] प्राणियों के प्रति और व्रतधारियों के प्रति
अनुकम्पा-दया, [ दानसरागसंयमादियोगः ] दान, सराग
संयमादि के योग, [ क्षान्तिः शौचमिति ] क्षमा और शौच,
अर्हन्त भक्ति इत्यादि [ सद्वेद्यस्य ] सातावेदनीय कर्म के
आस्रव के कारण हैं।
Compassion towards living beings in general and
the devout in particular, charity, asceticism with
attachment etc. (i.e. restraint-cum-non-restraint,
involuntary dissociation of karmas without effort,
austerities not based on right knowledge),
contemplation, equanimity, freedom from greed –
these lead to the influx of karmas that cause
pleasant feeling.
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अध्याय - ६
केवलिश्रुतसंघधर्मदेवावर्णवादो दर्शनमोहस्य ॥१३॥
[ केवलिश्रुतसंघधर्मदेवावर्णवादः ] केवली, श्रुत, संघ, धर्म
और देव का अवर्णवाद करना सो [ दर्शनमोहस्य ]
दर्शनमोहनीय कर्म के आस्रव का कारण है।
Attributing faults to the omniscient, the scriptures,
the congregation of ascetics, the true religion, and
the celestial beings, leads to the influx of faith-
deluding karmas.
कषायोदयात्तीव्रपरिणामश्चारित्रमोहस्य ॥१४॥
[ कषायोदयात् ] कषाय के उदय से [ तीव्रपरिणामः ] तीव्र
परिणाम होना सो [ चारित्रमोहस्य ] चारित्र मोहनीय के
आस्रव का कारण है।
Intense feelings induced by the rise of the passions
cause the influx of the conduct-deluding karmas.
बह्वारम्भपरिग्रहत्वं नारकस्यायुषः ॥१५॥
[ बह्वारम्भपरिग्रहत्वं ] बहुत आरम्भ और बहुत परिग्रह होना
सो [ नारकस्यायुषः ] नरकायु के आस्रव का कारण है।
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अध्याय - ६
Excessive infliction of pain, and attachment cause
the influx of karma which leads to life in the
infernal regions.
माया तैर्यग्योनस्य ॥१६॥
[ माया ] माया-छलकपट [ तैर्यग्योनस्य ] तिर्यंचायु के आस्रव
का कारण है।
Deceitfulness causes the influx of life-karma
leading to the animal and vegetable world.
अल्पारम्भपरिग्रहत्वं मानुषस्य ॥१७॥
[ अल्पारम्भपरिग्रहत्वं ] थोड़ा आरम्भ और थोड़ा परिग्रहपन
[ मानुषस्य ] मनुष्य-आयु के आस्रव का कारण हैं।
Slight injury and slight attachment cause the
influx of life-karma that leads to human life.
स्वभावमार्दवं च ॥१८॥
[ स्वभावमार्दवं ] स्वभाव से ही सरल परिणाम होना [ च ]
भी मनुष्यायु के आस्रव का कारण है।
Natural mildness also (leads to the same influx).
87
अध्याय - ६
निःशीलव्रतत्वं च सर्वेषाम् ॥१९॥
[ निःशीलव्रतत्वं च ] शील और व्रत का जो अभाव है वह
भी [ सर्वेषाम् ] सभी प्रकार की आयु के आस्रव का कारण
है।
Non-observance of the supplementary vows, vows,
etc. causes the influx of life-karmas leading to birth
among all the four kinds of beings (conditions of
existence).
सरागसंयमसंयमासंयमाकामनिर्जराबालतपांसि
दैवस्य ॥२०॥
[ सरागसंयमसंयमासंयमाकामनिर्जराबालतपांसि ] सरागसंयम,
संयमासंयम, अकामनिर्जरा और बालतप [ दैवस्य ] ये देवायु
के आस्रव के कारण हैं।
Restraint with attachment, restraint-cum-non-
restraint, involuntary dissociation of karmas, and
austerities accompanied by perverted faith, cause
the influx of life-karma leading to celestial birth.
सम्यक्त्वं च ॥२१॥
88
अध्याय - ६
[ सम्यक्त्वं च ] सम्यग्दर्शन भी देवायु के आस्रव का कारण
है अर्थात् सम्यग्दर्शन के साथ रहा हुआ जो राग है वह भी
देवायु के आस्रव का कारण है।
Right belief also (is the cause of influx of life-karma
leading to celestial birth).
योगवक्रता विसंवादनं चाशुभस्य नाम्नः ॥२२॥
[ योगवक्रता ] योग में कुटिलता [ विसंवादनं च ] और
विसंवादन अर्थात् अन्यथा प्रवर्तन [ अशुभस्य नाम्नः ] अशुभ
नामकर्म के आस्रव का कारण हैं।
Crooked activities and deception cause the influx of
inauspicious physique-making karmas.
तद्विपरीतं शुभस्य ॥२३॥
[ तद्विपरीतं ] उससे अर्थात् अशुभ नामकर्म के आस्रव के जो
कारण कहे उनसे विपरीत भाव [ शुभस्य ] शुभ नामकर्म के
आस्रव का कारण हैं।
The opposites of these (namely straightforward
activity, and honesty or candour) cause the influx of
auspicious physique-making karmas.
89
अध्याय - ६
दर्शनविशुद्धिर्विनयसम्पन्नता शीलव्रतेष्वनतीचारो-
ऽभीक्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगौ शक्तितस्त्यागतपसी
साधुसमाधिर्वैयावृत्त्यकरणमर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचन-
भक्तिरावश्यकापरिहाणिर्मार्गप्रभावना
प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य ॥२४॥
[ दर्शनविशुद्धिः ] 1- दर्शनविशुद्धि, [ विनयसम्पन्नता ]
2- विनयसम्पन्नता, [ शीलव्रतेष्वनतीचारः ] 3- शील और
व्रतों में अनतिचार अर्थात् अतिचार का न होना,
[ अभीक्ष्णज्ञानोपयोगः ] 4- निरन्तर ज्ञानोपयोग, [ संवेगः ]
5- संवेग अर्थात् संसार से भयभीत होना,
[ शक्तितस्त्यागतपसी ] 6-7- शक्ति के अनुसार त्याग तथा
तप करना, [ साधुसमाधिः ] 8- साधुसमाधि,
[ वैयावृत्त्यकरणम् ] 9- वैयावृत्त्य करना,
[ अर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचनभक्तिः ] 10-13- अर्हत्-
आचार्य-बहुश्रुत (उपाध्याय) और प्रवचन (शास्त्र) के प्रति
भक्ति करना, [ आवश्यकापरिहाणिः ] 14- आवश्यक में
हानि न करना, [ मार्गप्रभावना ] 15- मार्ग प्रभावना और
[ प्रवचनवत्सलत्वम् ] 16- प्रवचन-वात्सल्य [ इति
तीर्थकरत्वस्य ] ये सोलह भावना तीर्थंकर-नामकर्म के आस्रव
का कारण हैं।
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अध्याय - ६
The influx of Tīrthaṁkara name-karma is caused
by these sixteen observances, namely, purity of
right faith, reverence, observance of vows and
supplementary vows without transgressions,
ceaseless pursuit of knowledge, perpetual fear of
the cycle of existence, giving gifts (charity),
practising austerities according to one’s capacity,
removal of obstacles that threaten the equanimity
of ascetics, serving the meritorious by warding off
evil or suffering, devotion to omniscient lords, chief
preceptors, preceptors, and the scriptures, practice
of the six essential daily duties, propagation of the
teachings of the omniscient, and fervent affection
for one’s brethren following the same path.
परात्मनिन्दाप्रशंसे सदसद्गुणोच्छादनोद्भावने च
नीचैर्गोत्रस्य ॥२५॥
[ परात्मनिंदाप्रशंसे ] दूसरे की निंदा और अपनी प्रशंसा करना
[ सदसद्गुणोच्छादनोद्भावने च ] तथा प्रगट गुणों को छिपाना
और अप्रगट गुणों को प्रसिद्ध करना सो [ नीचैर्गोत्रस्य ] नीच
गोत्रकर्म के आस्रव का कारण हैं।
Censuring others and praising oneself, concealing
good qualities present in others and proclaiming
noble qualities absent in oneself, cause the influx of
karmas which lead to low status.
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अध्याय - ६
तद्विपर्ययौ नीचैर्वृत्त्यनुत्सेकौ चोत्तरस्य ॥२६॥
[ तद्विपर्ययः ] उस नीच गोत्रकर्म के आस्रव के कारणों से
विपरीत अर्थात् परप्रशंसा, आत्मनिंदा इत्यादि [ च ] तथा
[ नोचैर्वृत्त्यनुत्सेकौ ] नम्र वृत्ति होना तथा मद का अभाव -
सो [ उत्तरस्य ] दूसरे गोत्रकर्म अर्थात् उच्च गोत्रकर्म के
आस्रव का कारण हैं।
The opposites of those mentioned in the previous
sutra, and humility and modesty, cause the influx
of karmas which determine high status.
विघ्नकरणमन्तरायस्य ॥२७॥
[ विघ्नकरणम् ] दान, लाभ, भोग, उपभोग तथा वीर्य में
विघ्न करना सो [ अन्तरायस्य ] अन्तराय कर्म के आस्रव का
कारण हैं।
Laying an obstacle is the cause of the influx of
obstructive karmas.
॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥
92
अध्याय - ७
अथ सप्तमोऽध्यायः
The Five Vows
हिंसाऽनृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम् ॥१॥
[ हिंसाऽनृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिः ] हिंसा, झूठ, चोरी,
मैथुन और परिग्रह अर्थात् पदार्थों के प्रति ममत्वरूप परिणमन
- इन पाँच पापों से (बुद्धिपूर्वक) निवृत्त होना सो [ व्रतम् ]
व्रत है।
Desisting from injury, falsehood, stealing,
unchastity, and attachment, is the (fivefold) vow.
देशसर्वतोऽणुमहती ॥२॥
व्रत के दो भेद हैं - [ देशतः अणुः ] उपरोक्त हिंसादि पापों
का एकदेश त्याग करना सो अणुव्रत और [ सर्वतः महती ]
सर्वदेश त्याग करना सो महाव्रत है।
(The vow is of two kinds), small and great, from its
being partial and complete.
तत्स्थैर्यार्थं भावनाः पञ्च पञ्च ॥३॥
[ तत्स्थैर्यार्थं ] उन व्रतों की स्थिरता के लिये [ भावनाः पञ्च
पञ्च ] प्रत्येक व्रत की पाँच-पाँच भावनायें हैं।
किसी वस्तु का बार बार विचार करना सो भावना है।
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अध्याय - ७
For the sake of strengthening the vows, there are
five observances¹ for each of these.
वाङ्मनोगुप्तीर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकितपान-
भोजनानि पञ्च ॥४॥
[ वाङ्मनोगुप्तीर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकितपानभोजनानि ]
वचनगुप्ति- वचन को रोकना, मनगुप्ति- मन की प्रवृत्ति को
रोकना, ईर्या समिति- चार हाथ जमीन देखकर चलना,
आदाननिक्षेपण समिति- जीवरहित भूमि देखकर सावधानी से
किसी वस्तु को उठाना धरना और आलोकितपानभोजन-
देखकर-शोधकर, भोजन-पानी ग्रहण करना [ पञ्च ] ये पाँच
अहिंसा व्रत की भावनायें हैं।
Control of speech, control of thought, regulation of
movement, care in taking and placing things or
objects, and examining food or drink, are five.
क्रोधलोभभीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानान्यनुवीचिभाषणं
च पञ्च ॥५॥
¹ Bhāvanā is generally rendered as contemplation or meditation.
But from what follows ‘observance’ may be taken as a better
rendering.
94
अध्याय - ७
[ क्रोधलोभभीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानानि ] क्रोधप्रत्याख्यान,
लोभप्रत्याख्यान, भीरुत्वप्रत्याख्यान, हास्यप्रत्याख्यान अर्थात्
क्रोध का त्याग करना, लोभ का त्याग करना, भय का त्याग
करना, हास्य का त्याग करना [ अनुवीचिभाषणं च ] और
शास्त्र की आज्ञानुसार निर्दोष वचन बोलना [ पञ्च ] ये पाँच
सत्यव्रत की भावनायें हैं।
Giving up anger, greed, cowardice or fearfulness,
and jest, and speaking harmless words are five.
शून्यागारविमोचितावासपरोपरोधाकरणभैक्ष्यशुद्धि-
सधर्माविसंवादाः पञ्च ॥६॥
[ शून्यागारविमोचितावासपरोपरोधाकरणभैक्ष्यशुद्धि-
सधर्माविसंवादाः ] शून्यागारवास- पर्वतों की गुफा, वृक्ष की
पोल इत्यादि निर्जन स्थानों में रहना, विमोचितावास- दूसरों के
द्वारा छोड़े गये स्थान में निवास करना, किसी स्थान पर रहते
हुये दूसरों को न हटाना तथा यदि कोई अपने स्थान में आवे
तो उसे न रोकना, शास्त्रानुसार भिक्षा की शुद्धि रखना और
साधर्मियों के साथ यह मेरा है-यह तेरा है ऐसा क्लेश न
करना [ पञ्च ] ये पाँच अचौर्यव्रत की भावनायें हैं।
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