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तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)

तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)

Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary

आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा

DevanagariHindipublished177 पृष्ठ

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पृष्ठ 103

अध्याय - ६
दर्शनविशुद्धिर्विनयसम्पन्नता शीलव्रतेष्वनतीचारो-
ऽभीक्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगौ शक्तितस्त्यागतपसी
साधुसमाधिर्वैयावृत्त्यकरणमर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचन-
भक्तिरावश्यकापरिहाणिर्मार्गप्रभावना
प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य ॥२४॥
[ दर्शनविशुद्धिः ] 1- दर्शनविशुद्धि, [ विनयसम्पन्नता ]
2- विनयसम्पन्नता, [ शीलव्रतेष्वनतीचारः ] 3- शील और
व्रतों में अनतिचार अर्थात् अतिचार का न होना,
[ अभीक्ष्णज्ञानोपयोगः ] 4- निरन्तर ज्ञानोपयोग, [ संवेगः ]
5- संवेग अर्थात् संसार से भयभीत होना,
[ शक्तितस्त्यागतपसी ] 6-7- शक्ति के अनुसार त्याग तथा
तप करना, [ साधुसमाधिः ] 8- साधुसमाधि,
[ वैयावृत्त्यकरणम् ] 9- वैयावृत्त्य करना,
[ अर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचनभक्तिः ] 10-13- अर्हत्-
आचार्य-बहुश्रुत (उपाध्याय) और प्रवचन (शास्त्र) के प्रति
भक्ति करना, [ आवश्यकापरिहाणिः ] 14- आवश्यक में
हानि न करना, [ मार्गप्रभावना ] 15- मार्ग प्रभावना और
[ प्रवचनवत्सलत्वम् ] 16- प्रवचन-वात्सल्य [ इति
तीर्थकरत्वस्य ] ये सोलह भावना तीर्थंकर-नामकर्म के आस्रव
का कारण हैं।
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