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तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)

तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)

Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary

आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा

DevanagariHindipublished177 पृष्ठ

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पृष्ठ 105

अध्याय - ६
तद्विपर्ययौ नीचैर्वृत्त्यनुत्सेकौ चोत्तरस्य ॥२६॥
[ तद्विपर्ययः ] उस नीच गोत्रकर्म के आस्रव के कारणों से
विपरीत अर्थात् परप्रशंसा, आत्मनिंदा इत्यादि [ च ] तथा
[ नोचैर्वृत्त्यनुत्सेकौ ] नम्र वृत्ति होना तथा मद का अभाव -
सो [ उत्तरस्य ] दूसरे गोत्रकर्म अर्थात् उच्च गोत्रकर्म के
आस्रव का कारण हैं।
The opposites of those mentioned in the previous
sutra, and humility and modesty, cause the influx
of karmas which determine high status.
विघ्नकरणमन्तरायस्य ॥२७॥
[ विघ्नकरणम् ] दान, लाभ, भोग, उपभोग तथा वीर्य में
विघ्न करना सो [ अन्तरायस्य ] अन्तराय कर्म के आस्रव का
कारण हैं।
Laying an obstacle is the cause of the influx of
obstructive karmas.
॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥
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