तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)
Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा
प्रारंभिक प्राक्कथन एवं मण्डालय जेल की पृष्ठभूमि
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तरुणके स्वप्न
मूल लेखक—
राष्ट्रपति
श्री सुभाषचन्द्र वसु
हिन्दी रूपान्तरकार
श्री गिरीशचन्द्र जोशी
प्रकाशक—
हिन्दी पुस्तक एजेन्सी
२०३, हरिसन रोड
कलकत्ता
प्रथम संस्करण ] फरवरी, १९३८ [ मूल्य १॥)
- प्रकाशक -
बैजनाथ केडिया
प्रोप्राइटर
हिन्दी पुस्तक एजेन्सी
२०३ हरिसन रोड, कलकत्ता
शाखाएं-
ज्ञानवापी, काशी ।
गणपतरोड, लाहौर ।
दरीबाकलां, दिल्ली ।
बांकीपुर, पटना ।
- मुद्रक -
कृष्णगोपाल केडिया
= वणिक प्रेस =
१, सरकार लेन, कलकत्ता
निवेदन
बंगला सम्वत् १३३० से अबतक मेरे जो लेख और
पत्र प्रकाशित हुए थे, उन्हींमें से कुछका संग्रह कर “तरुण-
के स्वप्न” प्रकाशित हुआ । समय न होनेके कारण सब
पत्रों और लेखोंका अभी प्रकाशन संभव नहीं हुआ । यह
पुस्तक जनप्रिय होनेसे भविष्यमे अन्यान्य पत्र तथा
रचना और व्याख्यान एक साथ प्रकाशित करनेकी
वासना है।
१० पौष, १३३५ } विनीत—
कलकत्ता । } श्रीसुभाषचन्द्र वसु
दो बात
एक बात तो यह है कि राष्ट्रपतिके लेख और पत्रों-
का यह रूपान्तर अत्यन्त शीघ्रता और यथा संभव सत-
र्कतासे किया गया है, आशा है पाठकों, पाठिकाओंको
पर्याप्त शिक्षा तथा ज्ञान प्राप्त होगा ।
दूसरी बात यह है कि इसमें यदि कोई त्रुटि रह गयी
हो तो उसकेलिये लेखक नहीं मैं जिम्मेदार समझा जाऊं,
गोकि मेरा विश्वास है कि पाठक तथा पाठिकाएं इसका
समुचित आदर कर, लेखककी अन्य रचनाएं हिन्दीमें
रखनेकेलिये मुझे उत्साहित करेंगी । बस !
गिरीशचन्द्र जोशी
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तरुणका स्वप्न
एक उद्देश्यकी सिद्धिकेलिये, एक सन्देशके प्रचारके-
लिये हमने पृथ्वीपर जन्म ग्रहण किया है। सूर्य यदि
संसारको आलोकसे जगमगानेकेलिये उदित होता है,
गन्ध वितरणकेलिये यदि उपवनमे फूल खिलते हैं, अमृत-
मय जलदानकेलिये यदि नदी समुद्रकी ओर दौड़ी जाती
है, तो हम भी यौवनका पूर्णानन्द और उल्लास
लेकर एक सत्यकी प्रतिष्ठाकेलिये संसारमे आये हैं।
हमे उस गूढ़ उद्देश्यका आविष्कार करना होगा जिससे
हमारा व्यर्थ जीवन सार्थक बने, ध्यान, चिन्ता और
१
तरुणके स्वप्न
कर्ममय जीवनकी अभिज्ञता द्वारा हमें उसका आविष्कार
करना ही होगा।
हम यौवनकी बाढमें लीन होते जा रहे हैं, संसारको
आनन्दका आस्वाद देनेकेलिये, क्यो'कि हम आनन्द-
स्वरूप हैं। आनन्दके मूर्त्तिमान प्रतीककी तरह हम संसार-
में विचरण करेंगे। अपने आनन्दमें हम हंसेंगे, साथ ही
दुनियाको भी दिवानी बना देंगे। हम जिस तरफ
घूम पड़ेंगे, निरानन्दका अन्धकार लजाकर भाग जायगा।
हमारे जीवनदायी स्पर्शके प्रभावसे रोग, शोक, ताप भाग
खड़े होंगे।
इस दुःखपूर्ण, वेदना-जर्जर नरलोकको हम आनन्द-
सागरसे ओतप्रोत कर देंगे।
हम आशा, उत्साह, त्याग, ओज लेकर आये हैं।
हम सृष्टि करने आये हैं, क्योंकि सृष्टिमें ही आनन्द है।
बुद्धि, तन-मन-प्राण देकर हम सृष्टि करेंगे। हमारे अन्दर
जो कुछ सत्य है, सुन्दर है, शिव है, उसे अपने सृष्ट
पदार्थमें पूर्णरूपसे झलका देंगे।। आत्मदानमें जो आन-
न्द है, उस आनन्दसे हम विभोर होंगे। उस आनन्दका
आस्वाद पाकर पृथ्वी भी धन्य होगी।
२
लेकिन इससे ही हमारे दानका, कर्मका अन्त न
होगा। क्योंकि :—
जोतो देवो प्रान वोहे जावे प्रान
फुरावे ना आर प्रान ;
एतो कोथा आछे एतो गान आछे
एतो प्रान आछे मोर ;
एतो सूख आछे एतो साध आछे
प्रान होए आछे भोर
अनन्त आशा, असीम उत्साह, अपरिमेय तेज और
अदम्य साहस लेकर हम आये हैं, तभी तो हमारा जीवन-
श्रोत कभी रुंध नहीं सकता। अविश्वास और निराशा-
के पर्वत सामने अड़ जायं, सम्पूर्ण मानव जातिकी शक्ति
प्रतिकूल होकर आक्रमण करे, तब भी हमारी आनन्दमयी
गति चिरकाल तक अक्षुण्ण रहेगी।
हमारा एक विशेष धर्म है, हम उसी धर्मका अनु-
सरण करते हैं। जो नवीन है, जो सरस है, जिसका स्वाद
दुनियाने आजतक नहीं चखा, हम उसीके उपासक हैं।
हम पुरातनमें नवीन का, जड़में चेतनका, प्रौढ़में यौवनका,
बन्धनमें असीमका उद्भाव करते हैं। हम इतिहाससे प्राप्त
पुरानी अभिज्ञताको हर समय, हर हालतमें माननेको
३
तरुणके स्वप्न
तैयार नहीं हैं। हम अनन्त पथके यात्री हैं, मगर अपरि-
चित पथसे ही हमें प्रेम है, अज्ञात भविष्य ही हमारे लिये
प्रियतर है। हम चाहते हैं; "the right to make
blunders", हम भूल करनेका अधिकार चाहते हैं और
इसी लिये हमारे स्वभावके प्रति सबकी सहानुभूति नहीं
है, बहुतों की नजरमें हम संसारत्यक्त और भाग्यहीन हैं।
इसीसे हमें आनन्द है; यहीं हम गर्वीले हैं। क्योंकि
यौवन हमेशा हर जगह संसारसे अलग और लक्ष्मीसे
विलग है। हम अतृप्त आकांक्षाकी उन्मादनासे दौड़ते हैं,
समझदारोंके उपदेश सुननेकी हमें फुर्सत भी नहीं है।
भूल करें, भ्रममें पड़ें, गिर पड़े, तो भी हम उत्साहसे वंचित
न होंगे, पीछे कदम न रखेंगे। हमारी ताण्डव लीलाका
अन्त नहीं है क्योंकि हमारी गति अविराम है, वह कभी
नहीं थमती।
हम देश देशमें स्वतंत्रताके इतिहासकी रचना करते
रहते हैं। हम शान्तिका जल छिड़कने यहां नहीं आये हैं,
विवाद छेड़ने, संग्रामका संवाद देने, प्रलयकी सूचना देने,
हम आये हैं, आते हैं। जहां बन्धन है, जहां अहम्मन्यता है,
कुसंस्कार और संकीर्णता है, वहीं हम खड्गहस्त
उपस्थित हैं। हमारा एकमात्र काम है, मुक्तिपथको
४
तरुणके स्वप्न
सर्वदा कांटोंसे रहित रखना ताकि मुक्तिसेना बिना बाधा
जाती आती रहे।
हमारे लिये मनुष्यजीवन एक अखण्ड सत्य है।
फिलहाल हम जो स्वाधीनता चाहते हैं, उस स्वाधीनता-
के बिना जीवन धारण करना एक विडम्बना है। जिसकी
प्राप्तिके लिये हमने युग, युगमें हंसते हंसते अपना खून
दिया है, वह सर्वतोमुखी है। जीवनके हर एक क्षेत्रमें,
हर तरफ मुक्तिवाणीका प्रचार करने हम आये हैं। चाहे
समाजनीति हो, अर्थनीति हो, राष्ट्रनीति हो या धर्म-
नीति हो, जीवनके प्रत्येक भागमें हम सत्यके प्रकाशमें
आनन्दका उच्छ्वास देखना चाहते हैं, हम उदारताके
मौलिक सिद्धान्तोंकी स्थापना चाहते हैं।
अनादिकालसे हम मुक्तिका सन्देश सुना रहे हैं,
स्वतन्त्रताका गान गा रहे हैं। बचपनसे ही मुक्तिकी
आकांक्षा हमारी रग रगमें बहने लगती है। पैदा होते ही
हम जो रो उठते हैं, हमारा वह रोना पार्थिव बन्धनोंके
प्रति विद्रोह प्रदर्शित करनेके लिये है। बचपनमें रोना ही
हमारा बल रहता है, किन्तु यौवनके द्वारपर पहुंचते ही हमें
भुजाओं और बुद्धिकी सहायता मिलती है। इन भुजाओं
और बुद्धिकी सहायतासे हमने क्या, नहीं किया ? कित-
५
तरुणके स्वप्न
सिया, असीरिया, बोबिलोनिया, मिस्र, ग्रीस, रोम, टर्की,
इंग्लैण्ड, रूस, जर्मनी, चीन, जापान, हिन्दुस्तान—चाहे
जिस देशका इतिहास पढ़कर देखो, देखोगे कि हर देशके
इतिहासके प्रत्येक पृष्ठपर हमारी कीर्ति ज्वलन्त अक्षरोंमें
लिखी हुई है। हमारी सहायतासे सम्राट् सिंहासनपर
बैठे और हमारे संकेतसे सभय सिंहासन छोड़कर भाग
खड़े हुए। जिस तरह हमने एक तरफ प्रेमके आंसुओंसे
ताजमहल निर्माण किया है, उसी तरह दूसरी तरफ अपने
हृदयके रक्तसे पृथ्वीको रंजित किया है। हमारी संयुक्त
शक्ति लेकर समाज, राष्ट्र, साहित्य, कला, विज्ञान, युग-
युगमें, देश देशमें उन्नत हुआ है। फिर हमने जब कराल
मूर्ति धारण कर ताण्डवनृत्य आरंभ किया है, उसके एक-
एक पद विक्षेपसे कितने समाज, कितने साम्राज्य, धूलमें
मिल गये हैं।
इतने दिन बाद हमने अपनी शक्ति पहचानी है, अपना
धर्म जाना है। अब कौन हमारा शासन कर सकता है?
कौन हमारा शोषण कर सकता है? नव जागरणके युगमें
सबसे बड़ी बात, सबसे बड़ी आशा, तरुणोंका आत्म-
प्रतिष्ठा-लाभ है। इसीसे तो जीवनके हर क्षेत्रमें यौवन-
का रक्तिम आभास दिखलायी पड़ेगा। यह तरुणोंका
६
तरुणके स्वप्न
आन्दोलन जितना सर्वतोमुखी है, उतना ही विश्वव्यापी
है। आज पृथ्वीके सब देशोंमें—विशेषकर जहां बुढ़ापेकी
ठण्डी छाया दिखलायी पड़ती है, वहां, तरुण समाज सर
ऊँचा कर सदर्प खड़ा हुआ है। ये किस दिव्यालोकसे
पृथ्वीको उद्भासित करेंगे, कौन कह सकता है ?
हे युवा हृदयो ! उठो ! वह देखो ऊषाकी किरणें
छिटक रही हैं।
२ रा ज्येष्ठ १३३० (बंगला)
७
तरुणके स्वप्न
साथ साथ नवीन भारत गढ़ना होगा। साहित्य, विज्ञान,
संगीत, शिल्प-कला, शौर्य-वीर्य, क्रीड़ा-कुशलता, दया-
दाक्षिण्य इन सबकी सहायतासे नवीन भारत बनाना
होगा। राष्ट्रीय जीवनकी सर्वतोमुखी उन्नति करनेकी
शक्ति और राष्ट्रीय शिक्षाका समन्वय करनेकी प्रवृत्ति
सिर्फ बंगालीमें ही है।
मेरा विश्वास है कि बंगालीका अपना एक वैशिष्ट्य
है। शिक्षा, दीक्षा, स्वभाव, चरित्र सबमें इस वैचित्र्यकी
झलक रहती है। बंगालके प्राकृतिक दृश्यमें भी वैशिष्ट्य
लक्षित होता है। यहांकी मिट्टी, जल, आकाश, शस्यश्या-
मला धरती, ताल वृक्ष आवेष्टित पुष्करिणीमें क्या अपना
वैशिष्ट्य नहीं है ? और प्रकृतिकी यह विशेषता क्या बंगाली-
के चरित्रको वैशिष्ट्य नहीं देती ? ऐसी नरम मिट्टीमें
जन्म लेनेके कारण ही बंगालीके प्राण इतने सरस हैं।
प्राकृतिक सौंदर्यके बीच लालित पालित होनेके कारण ही
वह सुन्दरका उपासक है। सुजला, सुफला, शस्यश्यामला,
जन्मभूमिका अन्न जल सेवन करके ही बंगाली काव्य और
साहित्यमें ऐसा अपूर्व सर्जन कौशल दिखला सका है।
पिछले दो तीन वर्षोंमें जागरणकी जो बाढ़ आयी थी
उसमें इस समय उतार दिखलाई पड़ता है, किन्तु चढ़ावमे
१०
देशकी पुकार
अब अधिक विलम्ब नहीं है। बंगालके राष्ट्रीय स्रोतमें
फिर भीषण चढ़ाव आनेवाला है। उस बाढ़के स्पर्शसे
बंगालके प्राण फिर जग पड़ेंगे। बंगाली सर्वस्वको टेकपर
रखकर फिर स्वाधीनताकेलिये पागल हो उठेंगे। देश
फिर स्वाधीनताके लिये बद्धपरिकर होगा।
इस नव जागरणका स्वरूप क्या होगा यह कौन कह
सकता है ? इस नव यज्ञका पुरोहित कौन होगा, यह भी
कौन बतला सकता है ? जो भाग्यवान पुरुष इस यज्ञका
पौरोहित्य ग्रहण करेंगे वे इस समय कहां रमे हुए हैं, यह
भी कौन कह सकता है। इस आन्दोलनका नेतृत्व महात्मा-
जी ग्रहण करेंगे या अन्य कोई मनीषी उनके आसन पर
बैठेंगे भी यह हम नहीं जानते।
किन्तु इन सब प्रश्नोंके उत्तरके लिये बैठे रहनेसे नहीं
होगा। उस नवजागरणके लिये अभीसे हम सबको प्रस्तुत
होना होगा। ध्यान, धारणा, चिन्ता, कर्म, त्याग, योग
इन सबमें रत रहते हुए हमें साधनाके लिये प्रस्तुत होना
होगा।
बंग-जननी फिर तरुण संन्यासियोंका दल चाहती है।
भाइयो ! कौन कौन आत्म-बलिकेलिये प्रस्तुत है।
आओ ! मासे अभी तुम्हें सिर्फ दुःख, कष्ट, अनाहार,
११
सौ बातकी एक बात
मनुष्य जीवनमें बचपन, यौवन, प्रौढ़त्व और वार्द्धक्य
है, उसी प्रकार राष्ट्रीय जीवनमें भी यही सिलसिला
दिखलाई पड़ता है। मनुष्य मरता है और मृत्युसे निकल
कर नवजीवन लाभ करता है। किन्तु व्यक्ति और राष्ट्रमें
फर्क सिर्फ इतना है कि सब राष्ट्र मृत्युके बाद फिर जी
नहीं उठते। जिस राष्ट्रके अस्तित्वकी कोई सार्थकता नहीं
रह जाती, जिस राष्ट्रके प्राणोंमें कोई तत्व नहीं रह
जाता, वह जाति दुनियासे लोप हो जाती है। अथवा
कीड़ों पतंगोंकी तरह किसी प्रकार जीती रहती है किन्तु
१४
सौ बातकी एक बात
इतिहासमें नामोल्लेखके सिवा उसका निदर्शन कहीं नहीं
रहता।
भारतकी कई बार मृत्यु हुई और उसने फिर फिर
नवजीवन लाभ किया, इसका कारण यही है कि भारतके
अस्तित्वकी सार्थकता थी और आज भी है। भारतका
एक सन्देश है जो उसे विश्व परिषदको सुनाना है,
भारतकी शिक्षा ( culture ) में ऐसा कुछ है जो विश्व-
मानवके लिये अत्यन्त प्रयोजनीय है, जिसका ग्रहण किये
बिना विश्व-परिषदका उत्कर्ष नहीं हो सकता। सिर्फ
यही नहीं ; विज्ञान, कला, साहित्य, व्यवसाय, वाणिज्य,
सभी क्षेत्रोंमें हमारा राष्ट्र दुनियाको कुछ देगा, कुछ
सिखायगा। इसीलिये भारतीय मनीषियोंने अन्धकारपूर्ण
युगोंमें भी स्थिर भावसे भारतका ज्ञान दीप जलाये
रखा था। हम उन्हींकी सन्तान हैं,हम क्या अपना राष्ट्रीय
कर्त्तव्य पूरा किये बिना ही मर जायगे ?
मनुष्य देह पञ्च भूतोंमें मिल जानेपर भी आत्मा कभी
नहीं मरती, इसी प्रकार राष्ट्रकी मृत्यु होनेपर भी उसकी
शिक्षा-दीक्षा-सभ्यता रूपी आत्मा अमर है। राष्ट्रकी
सर्जन शक्ति जब लुप्त हो जाय तब समझना होगा कि राष्ट्र
मौतके घाट आ लगा है। आहार, निद्रा, सन्तानोत्पादन
१५
तरुणके स्वप्न
ही उस समय उसका दैनिक कर्तव्य हो जाता है और
पुराने जमानेसे चलती आयी परिपाटीकी लकीरको
पीटना ही उसकी नीति हो जाती है। इस अवस्थामें पड़-
कर भी कोई-कोई राष्ट्र फिर जी उठता है—यदि उसके
अस्तित्वकी सार्थकता रहती है। जिस समय अन्धकार-
मय युग आकर राष्ट्रको घेर लेता है, उस समय भी वह
किसी न किसी तरह अपनी शिक्षा दीक्षा और सभ्यताको
बचाये रखता है और अन्य राष्ट्रमें मिलकर अस्तित्व हीन
नहीं हो जाता। इसके बाद भाग्य या भगवानके इंगित
पर फिर नव जागरण होता है, अन्धकार धीरे-धीरे नष्ट
हो जाता है, सुप्त जाति फिर आंखें मलकर उठकर खड़ी
होती है, फिर उसकी सर्जन शक्ति जाग्रत हो जाती है।
सहस्त्र दलकमलकी तरह राष्ट्रके प्राण फिर खिल जाते हैं
तथा वह नवीन रूपसे, नवीन भावोंसे, नवीन नवीन दिशा-
ओंमें आत्मप्रकाश लाभ करता है। इस प्रकारके अनेक जन्म
और मृत्युके बीचमेसे भारतीय जाति होती चली आयी
है। क्योंकि भारतीय जातिका एक mission है, भार-
तीय सभ्यताका एक उद्देश्य है, जो आज भी सफल नहीं
हुआ है।
भारतके इस mission में जिसका विश्वास है,
१६
सौ बातकी एक बात
वही भारतीय जीवित है। भारतके पैंतिस करोड़ प्राणी
जीवितकी तरह जीवित हैं यह सच नहीं है। जो युवक
यह समझते हैं, अनुभव करते हैं वे ही जीवित हैं।
जन्मभूमिसे दूर जेलकी कोठरीमें महिने पर महिने काट
रहा था,उस समय बार-बार मेरे मनमें यह प्रश्न उठता था;—
“किसके लिये, किस उद्दीपनासे उद्दीप्त हो कारावासके
बोझसे न दबकर हम और भी शक्तिमान हो रहे हैं?”
इस प्रश्नका आत्मा जो उत्तर देती, वह यह था;—“भारत-
का एक mission है, एक गौरवमय भविष्य है, उस
भावी भारतके उत्तराधिकारी हमी हैं। नवीन भारतके
इतिहासकी रचना हमीने की है और करेंगे। इसी
विश्वासके बलपर हम सब दुःख, यातना सहते हैं, वास्त-
विकताको आदर्शके आघातसे चूर-चूर कर डालते हैं।
इसी अटल अचल विश्वासके कारण ही भारतीय युवकों-
की शक्ति मृत्युञ्जयी है।”
यही “श्रद्धा,” ऐसा आत्म विश्वास जिसमें है, वही
व्यक्ति सर्जक है, वही व्यक्ति देश-सेवाका प्रकृत अधि-
कारी है संसारमें जितने भी महान कार्य हैं वे सब मनु-
ष्य हृदयके आत्मविश्वास और सर्जन शक्तिपर अवल-
म्बित हैं।
२ १७
तरुणके स्वप्न
जिसका अपने राष्ट्रमें विश्वास नहीं है, अपनी आत्मा
में विश्वास नहीं है, वह किस वस्तुकी सृष्टि कर सकता
है ? भारतीयमें अनेक दोष हैं, किन्तु एक गुण है जिससे
उसके सब दोष दब जाते हैं, जिसके कारण वह दुनियामें
आदमी गिना जाता है। उसमें आत्म विश्वास है, भाव
प्रवणता है, कल्पनाशक्ति है, इसीलिये वह वर्तमान जीवनकी
सभी वास्तविक त्रुटियों, अक्षमताओं, असफलताओंको अग्राह्य
कर महान् आदर्शकी कल्पना कर सकता है। उसी आदर्श
के ध्यानमे मगन हो सकता है, जो असाध्य है उसके
'साधनकी चेष्टा कर सकता है। इसी कल्पना शक्ति और
आत्मविश्वासके कारण भारतने कितनेही साधकोंको जन्म
दिया है और देगा। इसी कारण दुख, कष्ट और
अत्याचारसे उसका मेरुदण्ड कभी नहीं टूटेगा। जो
जाति आदर्शवादी है वह अपने आदर्शके लिये यंत्रणा और
क्लेशको सानन्द सह सकती है।
बहुतसे समझते हैं suffering में सिर्फ कष्ट ही है,
पर यह सच नहीं है। Suffering मे जिस प्रकार कष्ट है
उसी प्रकार अपार आनन्द भी है। किन्तु जो इस आनन्द-
को महसूस नहीं कर सकता, उसके लिये कष्ट ही कष्ट
है। वह दुःख और कष्टसे अभिभूत हो जाता है। किन्तु
१८
सौ बातकी एक बात
जिसने दुःख और कष्टमें भो एक अनिर्वचनीय आनन्दका
आस्वाद पाया है, उसके लिये suffering गौरवकी चीज
है। वह कष्ट और यातनासे मुमूर्षु न होकर और भी
शक्तिमान् और महान हो उठता है। अब सवाल होता है,
'यह आनन्दका स्रोत कहां है ?' मैं समझतो हूं इस आनन्द
की उत्पत्ति आदर्शके प्रति अनुरागसे होती है। जो व्यक्ति
किसी महान् आदर्शको निस्वार्थ भावसे चाहनेके कारण
दुःख और यन्त्रणा पाता है, उसके लिये वह दुःख और
यन्त्रणा अर्थहीन—बेमतलब नही होती। उसके लिये तो
दुःख आनन्दके रूपमें रूपान्तरित होता है। वही आनन्द
अमृतकी तरह उसकी रग रगमें शक्तिका संचार करता
है। वही जीवनका वास्तविक अर्थ समझ सकता है,
आदर्शके चरणोंमें सर्वस्व समर्पण कर सकता है, वही
जीवन-रसका आस्वाद पा सकता है।
पिछले अप्रैलमें इनसिन जेलमें एक रसियन उपन्यास
पढ़ते पढ़ते ठीक इसी भावकी उपलब्धि हुई। उपन्यास
लेखकने रसियन जातिको लक्षकर अपने नायक द्वारा
कहा है;—There is still much suffering in store
for the people, much of their blood will yet
flow, squeezed out by the hands of greed
(