तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
[ ४६ ]
३. नव्य न्याय की तीसरी विशेषता है 'प्रकरण ग्रन्थ'। प्रकरण ग्रन्थ एक
पारिभाषिक शब्द है जिसका लक्षण इस प्रकार है—
शास्त्रैकदेशसम्बद्धं शास्त्रकार्यान्तरे स्थितम् ।
आहुः प्रकरणं नाम ग्रन्थभेदं विपश्चितः ॥
अर्थात् शास्त्र के एक अंश के प्रतिपादक और आवश्यकतानुसार अन्य शास्त्र के
उपयोगी अंश को भी प्रतिपादन करने वाले ग्रंथ भेद को प्रकरण ग्रंथ कहते हैं।
नव्य न्याय में इस प्रकार के जिन अनेक प्रकरण ग्रंथों का निर्माण हुआ है,
उनको हम चार भागों में विभक्त कर सकते हैं।
(क) न्याय के वे प्रकरण ग्रन्थ जो केवल एक प्रमाण पदार्थ का निरूपण करते
हैं। और शेष १५ पदार्थों को प्रमाण के भीतर ही अन्तर्भूत कर लेते हैं। इस प्रकार
के ग्रन्थों में श्री 'भासर्वज्ञ' [ १००० ई० ] के 'न्यायसार' का नाम उल्लेख योग्य है।
'भासर्वज्ञ' सम्भवतः काश्मीर के रहने वाले दशम शताब्दी के दार्शनिक हैं।
केवल एक प्रमाण पदार्थ के प्रतिपादन की यह शैली बौद्ध साहित्य से ली गई
है। भासर्वज्ञ ने अपने सामने की उसी प्रचलित पद्धति से ही न्याय के पदार्थों का
निरूपण कर दिया है। परन्तु उन्होंने न केवल प्राचीन न्याय पद्धति को परिवर्तित
कर दिया है अपितु अनेक सिद्धान्तों को भी परिवर्तित रूप में प्रस्तुत किया है।
उदाहरण के लिये उन्होंने प्रमाण के तीन भेद प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम किये
हैं। जब कि न्यायशास्त्रों में इनके अतिरिक्त 'उपमान' प्रमाण भी माना गया है।
प्रमाणों का यह त्रिविध विभाग न्याय सिद्धान्त की अपेक्षा सांख्य और जैन सिद्धान्त
से अधिक मिलता है क्योंकि वे तीन प्रमाण मानते हैं। लेखक ने अनुमान को
स्वार्थानुमान और परार्थानुमान इन दो भेदों में विभक्त करने में भी बौद्ध और
जैन दार्शनिकों के विभाग का अवलम्बन किया है। और उन्हीं की तरह दृष्टान्ता-
भास एवं हेत्वाभासों का वर्णन किया है। नव्य न्याय के अन्य लेखकों की भाँति
'जाति' और 'निग्रह स्थान' को उन्होंने छोड़ नहीं दिया बल्कि परार्थानुमान के
प्रकरण में उनका भी वर्णन किया है। मोक्ष के सम्बन्ध में भी उनका सिद्धान्त
प्राचीन न्याय से भिन्न है। वे मोक्ष में नित्य आनन्द की अभिव्यक्ति मानते हैं जब
भाष्यकार वात्स्यायन ने अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक उसका खण्डन किया है।
इस प्रकार नव्य पद्धति पर न्यायशास्त्र के इस प्रथम ग्रंथ की रचना दसवीं
शताब्दी में हुई और उसने अपने अनुरूप आदर पाया। उसके ऊपर १८ टीकायें
लिखी गईं जिनमें से मुख्य मुख्य यह हैं—
१. न्यायसार टीका [ विजयसिंह गुणी ]
२. न्यायसार टीका [ जयतीर्थ ]
३. न्यायसार विचार [ भट्ट राघव ]
४. न्यायतात्पर्यदीपिका [ जयसिंह सूरि ]
शेष का उल्लेख ग्रन्थों में मिलता है टीका उपलब्ध नहीं है।
[ ४७ ]
(ख) दूसरे प्रकार के 'प्रकरण ग्रन्थ' वे हैं जो मुख्यतः न्याय के ग्रन्थ होते हुए भी
वैशेषिक दर्शन के पदार्थों का भी समावेश कर लेते हैं। इस प्रकार के ग्रन्थों में
'श्रीवरदराज' को 'तार्किकरक्षा' और 'केशवमिश्र' की 'तर्कभाषा' के नाम लिए जा
सकते हैं। इन दोनों ने न्याय के षोडश पदार्थों का वर्णन किया है और दोनों ने
'वैशेषिक' के द्रव्यादि पदार्थों का अन्तर्भाव 'प्रमेय' में कर लिया है। इनमें से
वरदराज का समय लगभग ११५० और केशवमिश्र का समय लगभग १२७५ है।
(ग) तीसरे प्रकार के 'प्रकरण ग्रन्थ' वे हैं जो मुख्यतः 'वैशेषिक' के ग्रन्थ हैं
परन्तु न्यायदर्शन के 'प्रमाण' पदार्थ का पूर्णरूप से उनमें समावेश हो गया है।
इनमें से कुछ में 'प्रमाण' का अन्तर्भाव 'वैशेषिक' के 'गुणप्रकरण' में किया गया है
और कुछ में 'आत्मप्रकरण' में जो कि द्रव्य का एक भेद है। न्याय और वैशेषिक के
पदार्थों को इस प्रकार मिलाकर प्रतिपादन करने की शैली भी श्री उदयन के बाद
विशेष रूप से प्रचलित हुई। उदयन ने अपनी 'लक्षणावली' में वैशेषिक दर्शन
के सात [अभाव सहित] पदार्थों का वर्णन किया है। परन्तु उनमें न्याय के प्रमाण'
पदार्थ का निरूपण नहीं है। उससे पूर्व केवल 'प्रशस्तपादभाष्य' में 'प्रमाण' का भी
समावेश हुआ है। इस प्रकार के ग्रन्थों में १२वीं शताब्दी के 'वल्लभाचार्य' की
'न्यायलीलावती', 'अन्नंभट्ट' [ १६२३], का 'तर्कसंग्रह', विश्वनाथ न्यायपञ्चानन'
[ १६३४ ] का 'भाषापरिच्छेद', 'लौगाक्षि भास्कर' की 'तर्ककौमुदी' के नाम लिए
जा सकते हैं।
(घ) चौथे प्रकार के प्रकरण ग्रन्थ वे हैं जिनमें कुछ न्याय और कुछ वैशेषिक
के पदार्थों का निरूपण है जैसे 'शशधर' [ ११२५ ] का 'न्यायसिद्धान्तदीप' ।
इसी प्रकरण में 'सर्वदर्शनसंग्रह' के लेखक श्री 'माधवाचार्य' के नाम का भी
उल्लेख कर देना चाहिए।
तत्त्वचिन्तामणि (एक युग प्रवर्तक ग्रन्थ) —
पिछले प्रकरण में हमने जिन प्रकरण ग्रन्थों का उल्लेख किया है, वह सब
नव्यग्रन्थ होते हुए नव्यन्याय के महत्वपूर्ण ग्रन्थ नहीं हैं। नव्यन्याय के साहित्य
में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान 'गङ्गेशोपाध्याय' के 'तत्त्वचिन्तामणि' नामक ग्रन्थ
का है। इसे ही वस्तुतः नव्यन्याय का आधारभूत ग्रन्थ और 'गङ्गेशोपाध्याय को
नव्यन्याय का पिता माना जाता है। इस ग्रन्थ ने न्यायशास्त्र के इतिहास में
वस्तुतः एक नवीन युग की सृष्टि की है। अब तो संस्कृत शिक्षा पर भी कुछ आंग्ल
पद्धति का प्रभाव दिखाई देने लगा है। परन्तु अब से केवल एक पीढ़ी पूर्व तक
'तत्त्वचिन्तामणि' या उसके किसी एक खण्ड को पढ़े बिना दार्शनिक पाण्डित्य प्राप्त
करना असम्भव समझा जाता था।
इस ग्रन्थ के रचयिता श्री गङ्गेशोपाध्याय एक मैथिल विद्वान् थे जिन्होंने
सन् १२०० के लगभग इस ग्रन्थ की रचना की। अपने निर्माण काल से ही यह
ग्रन्थ मैथिल सम्प्रदाय की शिक्षा का चरम उद्देश्य बन गया। केवल इस ग्रन्थ का
[ ४८ ]
पाण्डित्य प्राप्त करने के लिए लोग अपने जीवन के १२ वर्ष प्रसन्नतापूर्वक व्यय कर
सकते थे और उसमें गौरव का अनुभव करते थे । १६वीं शताब्दी में 'वासुदेव सार्व-
भौम' ने बंगाल के प्रधान विद्यापीठ 'नवद्वीप' में इस ग्रन्थ का प्रचार किया। वासु-
देव सार्वभौम' मैथिल विद्वान् 'पक्षधर मिश्र' के शिष्य थे। उन्होंने 'नवद्वीप' जाकर
इसके पठन-पाठन को प्रचलित किया। १५०३ में 'नवद्वीप' विद्यापीठ की स्थापना
होने के बाद इस ग्रन्थ का 'रघुनाथ शिरोमणि' आदि के द्वारा सारे बंगाल में प्रचार
हो गया। इस प्रकार 'नवद्वीप' और 'मिथिला' यह दोनों 'नव्यन्याय' के प्रधान
केन्द्र रहे और आज भी इन दोनों विद्यापीठों को अपने नव्यन्याय के पाण्डित्य पर
गर्व करने का उचित अधिकार है। नवद्वीप के बाद धीरे धीरे महाराष्ट्र, मद्रास और
काश्मीर में प्रचार होते-होते सारे भारत में उसका प्रचार हो गया।
इस ग्रन्थ में कुल चार खण्ड हैं जिनमें प्रत्यक्षादि चारों प्रमाणों का विवेचन
क्रमशः एक-एक खण्ड में किया गया है। वह ग्रन्थ इस पद्धति से लिखा गया है कि
उसका हिन्दी में अनुवाद कर सकना सर्वथा असम्भव है। संसार के सारे दार्शनिक
ग्रन्थों में जितनी टीकाएँ इस ग्रन्थ की हुई हैं उतनी किसी दूसरे ग्रन्थ की नहीं।
श्री सतीशचन्द्र विद्याभूषण के लेखानुसार मूल ग्रन्थ लगभग तीन सौ पृष्ठ का है
और उस पर जो टीकाएँ लिखी गई हैं उनकी सम्मिलित पृष्ठ संख्या लगभग दस लाख
से ऊपर है। इतनी अधिक टीकाएँ विश्वसाहित्य के विरले ग्रन्थ पर ही मिल सकेंगी।
इससे इस नव्यन्याय के ग्रन्थ का महत्त्व और काठिन्य का कुछ आभास मिल सकेगा।
जैसा कि अभी कहा जा चुका है 'मिथिला' और 'नवद्वीप' यह दो स्थान नव्य-
न्याय के प्रधान केन्द्र रहे हैं। वहीं के विद्वानों ने इसके पठन-पाठन और टीका-
प्रटीका लिख कर इसे इतना महत्त्व प्रदान किया है। जिन विद्वानों ने इस प्रकार
नव्यन्याय का विस्तार किया उनकी नामावली, काल तथा ग्रन्थ आदि के विवरण
सहित हम आगे दे रहे हैं जिसमें दोनों शाखाओं के विद्वानों के नाम अलग-
अलग दिए हैं।
मैथिल शाखा
१२००–१६००
[ ४६ ]
सं० | नाम | काल | स्थान | विशेष | ग्रन्थ
१ | गङ्गेशोपाध्याय | १२०० | मिथि० | नव्य न्याय के प्रवर्तक | तत्त्वचिन्तामणि
२ | वर्द्धमानोपाध्याय | १२५० | ” | गङ्गेशोपाध्याय के शिष्य | १ तत्त्वचिन्तामणि प्रकाश
| | | | | २ न्यायनिबन्ध प्रकाश (न्या.वा.ता.परिशुद्धि की टीका)
| | | | | ३ न्यायपरिशिष्ट प्रकाश (न्या० प० की टीका)
| | | | | ४ प्रमेयनिबन्ध प्रकाश
| | | | | ५ किरणावली प्रकाश
| | | | | ६ न्यायकुसुमाञ्जलि प्रकाश
| | | | | ७ न्यायलीलावती प्रकाश
| | | | | ८ खण्डनखण्ड प्रकाश
३ | पक्षधर मिश्र [ जयदेव ] | १२७५ | ” | हरि मिश्र के शिष्य | १ तत्त्वचिन्तामणि आलोक
| | | | | २ द्रव्यपदार्थ
| | | | | ३ लीलावती विवेक
| | | | | ४ प्रसन्नराघव नाटक
| | | | | ५ चन्द्रालोक
४ | वासुदेव मिश्र | ” | ” | जयदेव मिश्र के शिष्य | १ तत्त्वचिन्तामणिटीका [ पक्षधर के समर्थन में ]
५ | रुचिदत्त मिश्र | ” | ” | ” | १ तत्त्वचिन्तामणि प्रकाश
| | | | | २ न्यायकुसुमाञ्जलि प्रकाश-मकरन्द
४ त० भू०
| सं० | नाम | काल | स्थान | विशेष | ग्रन्थ |
|---|---|---|---|---|---|
| ६ | भगीरथ [ मेघ ] ठक्कुर | १४०० | मिथि० | १ जलद [ कुसुमाञ्जलि प्रकाश वर्द्धमान की टीका ]<br>२ 'किरणावली प्रकाश प्रकाशिका' [ " ]<br>३ लीलावती प्रकाश व्याख्या [ " ]<br>४ पक्षधर मिश्र के 'आलोक' पर 'दर्पण' टीका | |
| ७ | महेश ठक्कुर | ” | ” | दरभंगा के राजवंश के<br>संस्थापक हैं। इनके शिष्य<br>रघुनन्दन दास राय नैया-<br>यिक की विद्वत्ता से प्रसन्न<br>होकर सम्राट् अकबर ने<br>दरभंगा का प्रान्त उनको<br>भेंट किया था जिसे<br>उन्होंने गुरुदक्षिणा के रूप<br>में महेश ठक्कुर को सम-<br>र्पित कर दिया और इस<br>प्रकार वे दरभंगा के राज-<br>वंश के संस्थापक बने। | |
| ८ | शङ्कर मिश्र | १४५० | ” | १ आत्मतत्त्वविवेक कल्पलता<br>२ आनन्दवर्द्धन [ खण्डनखण्डखाद्य की टीका ]<br>३ तत्त्वचिन्तामणिमयूख<br>४ त्रिसूत्रीनिबन्ध व्याख्या [ उदयन की टीका ]<br>५ भेदरत्नप्रकाश [ शाङ्कर वेदान्त का खण्डन ]<br>६ गौरीदिगम्बरप्रहसन |
[ ५० ]
</div>[ ५१ ]
७ वैशेषिकसूत्रोपस्कार
८ वादिविनोद
९ बौद्धधिकार टीका [ आत्मतत्त्वविवेक की टीका ]
१० अभेदधिकार [ शङ्कर का खण्डन ]
११ न्यायलीलावती कण्ठाभरण
१२ पण्डितविजय
१ अनुमानखण्ड टीका [ त० चि० की टीका ]
२ खण्डनखण्डोद्धार
३ न्यायसूत्रोद्धार
४ शब्दनिर्णय
९ वाचस्पति मिश्र(द्वितीय) १४५० "
१० मिसरू मिश्र १४७१ १ पदार्थचन्द्र
न्यायदीपिकाकार मिसरुक दूसरे हैं।
११ दुर्गादत्त मिश्र १५५० १ न्यायबोधिनी
१२ देवनाथ ठक्कुर १५६२ १ तत्त्वचिन्तामण्यालोक-परिशिष्ट
१३ मधुसूदन ठक्कुर १५७५ १ तत्त्वचिन्तामण्यालोक-कण्टकोद्धार
नवद्वीप शाखा
१६००-१८००
[ ५२ ]
सं० | नाम | काल | स्थान | विशेष | ग्रन्थ
१ | वासुदेव सार्वभौम | १५५० | नवद्वीप | नवद्वीप के महेश्वर विशा- |
| | | | रद के पुत्र थे । व्याकरण |
| | | | आदि पढ़ने के बाद लग- |
| | | | भग २५ वर्ष की अवस्था |
| | | | में मिथिला जाकर पक्ष- |
| | | | धर मिश्र के शिष्य बने । |
| | | | मैथिली पण्डित किसी |
| | | | बाहरी व्यक्ति को अपने |
| | | | ग्रन्थों की प्रतिलिपि नहीं |
| | | | करने देते थे । अत एव |
| | | | वासुदेव सार्वभौम ने |
| | | | समस्त तत्त्वचिन्तामणि |
| | | | और कुसुमाञ्जलि को कण्ठ |
| | | | कर लिया वहाँ से शिक्षा |
| | | | समाप्त कर काशी में |
| | | | वेदान्त का अध्ययन कर |
| | | | १६०० में वे नवद्वीप |
| | | | वापिस लौट आए । और |
२
रघुनाथ शिरोमणि
१६००
”
वहां न्यायकी शिक्षा देना
प्रारम्भ किया। इस प्रकार
वे नव्यन्याय की नवद्वी-
पशाखा के प्रवर्तक हैं।
नवद्वीप में वासुदेव
सार्वभौम से नव्यन्याय
की संपूर्ण शिक्षा प्राप्त
कर मिथिला गए और
पक्षधर मिश्र के शिष्य
बने। एक दिन पक्षधर
मिश्र ने किसी बात पर
इनका अपमान कर दिया
तो रात को छिपकर तल-
वार लेकर उनको मारने
के लिए घर पर पहुँचे।
उस समय पक्षधर मिश्र
अपनी पत्नी से रघुनाथ
की विद्वत्ता की प्रशंसा
कर रहे थे जिसे उन्होंने
बाहर से सुन लिया।
और तलवार फेंक कर
गुरु के चरणों पर गिर
पड़े और क्षमा मांगी।
वे एक आँख से काने थे।
१ तत्त्वचिन्तामणि-दीधिति
२ बौद्धधिक्कार-शिरोमणि
३ पदार्थतत्त्वनिरूपण
४ किरणावली-प्रकाश-दीधिति
५ न्यायलीलावती-प्रकाश-दीधिति
६ अवच्छेदकत्वनिरुक्ति
७ खण्डनखण्डखाद्य-दीधिति
८ आख्यातवाद
९ नञ्वाद
[ ५३ ]
[ ५४ ]
| सं० | नाम | काल | स्थान | विशेष | ग्रन्थ |
|---|---|---|---|---|---|
| ३ | हरिदास न्यायालङ्कार भट्टाचार्य | १६०० | नवद्वीप | वासुदेव सार्वभौम के शिष्य | १ न्यायकुसुमाञ्जलि-कारिकाव्याख्या |
| २ तत्त्वचिन्तामणि-प्रकाश | |||||
| ३ भाष्यालोक-टिप्पणी | |||||
| ४ | जानकीनाथ शर्मा | ” | १ न्यायसिद्धान्तमञ्जरी | ||
| ५ | कणाद तर्कवागीश | १६१० | १ मणिव्याख्या | ||
| २ भाषारत्न | |||||
| ३ अपशब्ददूषण | |||||
| ६ | रामकृष्ण भट्टाचार्य चक्रवर्ती | १६२५ | १ रघुनाथ शिरोमणि के पुत्र एवं शिष्य | १ गुणशिरोमणिप्रकाश | |
| २ न्यायदीपिका | |||||
| ७ | मथुरानाथ तर्कवागीश | ” | ” | १ तत्त्वचिन्तामणि रहस्य | |
| २ ” आलोकरहस्य | |||||
| ३ दीधितिरहस्य | |||||
| ४ सिद्धान्त रहस्य | |||||
| ५ किरणावलीप्रकाशरहस्य | |||||
| ६ न्यायलीलावतीप्रकाशरहस्य | |||||
| ७ ” ” दीधितिरहस्य | |||||
| ८ बौद्ध धिकाररहस्य | |||||
| ९ आदिक्रियाविवेक | |||||
| १० आयुर्वेदभावना | |||||
| ८ | कृष्णदास सार्वभौम भट्टाचार्य | ” | १ तत्त्वचिन्तामणि-दीधितिप्रसारिणी | ||
| २ अनुमानालोक-प्रसारिणी |
मयूख ३ न्यायादर्श या न्यायसारावली ४ शब्दशक्तिप्रकाशिका ५ तर्कामृत ६ पदार्थतत्त्वनिर्णय ७ न्यायलीलावतीदीधितिव्याख्याThese are at y ≈ 560 to 730! And then:१ त० चि० दीधितिपरीक्षा २ किरणावलीप्रकाशविवृतिपरीक्षा ३ पदार्थखण्डनव्याख्या ४ भावविलास [ राजस्तुति का काव्य ] ५ भ्रमरदूत`
These are at y ≈ 740 to 880!
YES! YES! YES!
Row 9 is at the TOP!
Row 10 is BELOW Row 9!
Row 11 is BELOW Row 10!
Row 12 is BELOW Row 11!
And in each row:
The row runs from LEFT to RIGHT:
Left: ९
Next: गुणानन्द विद्यावागीश
Next: १६२५
Next: The works!
And at the very top:
Above Row 9 (or in the margin above):
There is [ ५५ ]!
WAIT! Look at [ ५५ ]:
Is it at the top or right?
It's at x ≈ 450, y ≈ 95!
Wait, y ≈ 95 is ABOVE Row 9!
[ ५६ ]
| सं० | नाम | काल | स्थान | विशेष | ग्रन्थ |
|---|---|---|---|---|---|
| १३ | जयराम न्यायपञ्चानन | १७०० | ६ वृन्दावनविनोद काव्य<br>१ त० चि० दी० गूढार्थविद्योतन<br>२ त० चि० आलोकविवेक<br>३ न्यायसिद्धान्तमाला<br>४ शब्दार्थमाला<br>५ गुणदीधितिविवृत्ति<br>६ न्यायकुसुमाञ्जलिकािरकाव्याख्या<br>७ पदार्थमणिमाला<br>८ काव्यप्रकाश तिलक | ||
| १४ | गौरीकान्त सार्वभौम | १७२५ | १ भावार्थदीपिका [ तर्कभाषा की टीका ]<br>२ सद्युक्तिमुक्तावली<br>३ आनन्दलहरीवटी<br>४ विद्वन्मुखमण्डन विटीका | ||
| १५ | भवानन्द सिद्धान्तवागीश | १६२५ | १ त० चि० दी० प्रकाशिका<br>२ प्रत्यक्षालोकसारमञ्जरी<br>३ तत्त्वचिन्तामणिटीका<br>४ कारकविवेचन | ||
| १६ | हरिराम तर्कवागीश | ” | १ त० चि० टीका विचार |
[ ५७ ]
१७ विश्वनाथसिद्धान्तपञ्चानन १६३४ १ अलङ्कारपरिष्कार
२ नञ्वादटीका
३ न्यायसूत्रवृत्ति
४ सुबर्थतत्त्वालोक या कारकचक्र
५ पदार्थतत्त्वालोक
६ न्यायतन्त्रबोधिनी
७ भाषापरिच्छेद
८ पिङ्गलप्रकाश
९ सुबोधिनी [ शब्दशक्ति प्र० की टीका ]
१८ रामभद्र सिद्धान्त वागीश १६६० १ न्यायसंक्षेप
१९ गोविन्द न्यायवागीश १६५० २ पदार्थखण्डनव्याख्या
३ समासवाद
२० रघुदेव न्यायालंकार " १ त० चि० गूढार्थदीपिका
२ नतीननिर्माण
३ दीधितिटीका
४ न्या० कुसु० कारिकाव्याख्या
५ द्रव्यसारसंग्रह
६ पदार्थखण्डनव्याख्या
२१ गदाधर भट्टाचार्य " १ त० चि० दीधितिप्रकाशिका
२ " व्याख्या
३ " आलोकटीका
४ मुक्तावलीटीका
५ रत्नकोषवादरहस्य
६ अनुमानचिन्तामणिदीधितिटीका
[ ५८ ]
| सं० | नाम | काल | स्थान | विशेष | ग्रन्थ |
|---|---|---|---|---|---|
| ७ आख्यातवाद | |||||
| ८ कारकवाद | |||||
| ९ नञ्वाद | |||||
| १० प्रामाण्यवाददीधितिटीका | |||||
| ११ शब्दप्रामाण्यवादरहस्य | |||||
| १२ बुद्धिवाद | |||||
| १३ मुक्तिवाद | |||||
| १४ विधिवाद | |||||
| १५ विषयतावाद | |||||
| १६ व्युत्पत्तिवाद | |||||
| १७ शक्तिवाद | |||||
| १८ स्मृतिसंस्कारवाद | |||||
| २२ | नृसिंह पञ्चानन | १६७५ | १ न्यायसिद्धान्तमञ्जरीभूषा | ||
| २३ | रामदेव चिरञ्जीव | १७०० | १ विद्वदामोदतरङ्गिणी | ||
| २ काव्यबिलास | |||||
| ३ माधवचम्पू | |||||
| ४ वृत्तरत्नावली | |||||
| २४ | रामरुद्र तर्कवागीश | ” | १ त० चि० दीधिति टीका | ||
| २ व्याप्तिवादव्याख्या | |||||
| ३ कारकनिर्णयटीका | |||||
| ४ दिनकरीप्रकाशतरङ्गिणी |
[ ५६ ]
२५ श्रीकृष्ण न्यायालङ्कार १६५० ५ तत्त्वसंग्रहदीपिका-टिप्पणी
६ सिद्धान्तमुक्तावली-टीका
२६ जयराम तर्कालङ्कार १७०० १ भावदीपिका [ न्यायसिद्धान्तमञ्जरी की टीका ]
१ शक्तिवाद-टीका
१ वादपरिच्छेद
२ व्याख्याव्यूह
३ चित्तरूप
४ अधिकरणचन्द्रिका
२७ रुद्रराम १७५० ५ वैशेषिकशास्त्रीय-पदार्थनिरूपण
२८ कृष्णकान्त विद्यावागीश १७८० १ न्यायरत्नावली
२ दायभाग टीका
३ गोपाळलीलामृत
४ चैतन्यचन्द्रामृत
५ कामिनीकामकौतुक
६ उपमानचिन्तामणि-टीका
७ शब्दशक्तिप्रकाशिका-टीका
२९ राजचूडामणि मखी १६३० १ तत्त्वचिन्तामणिदर्पण
३० धमेरा आध्वरीण १६५० १ ,, प्रकाश-टीका
३१ गोपीनाथ मौनी " १ शब्दालोक
तर्कभाषाकार केशवमिश्र
बौद्ध, ब्राह्मण तथा जैन तीनों सम्प्रदायों के अपने अपने मत के अनुसार
'तर्कभाषा' इस एक ही नाम से अलग-अलग ग्रन्थ हैं। इनमें से बौद्ध 'तर्कभाषा'
के लेखक मोक्षाकर गुप्त [११००] हैं। यह मोक्षाकर की 'तर्कभाषा' तीनों में
सबसे प्राचीन है। इसमें बौद्धन्याय के सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है।
ऊपर हमने न्याय साहित्य का जो विवरण दिया है उसमें 'तर्कभाषा' नामक
तीन ग्रन्थों का उल्लेख किया गया है। दूसरी जैन 'तर्कभाषा' के लेखक
जैन विद्वान् श्री यशोविजय [१६८८ ई०] हैं। इसमें जैनन्याय के सिद्धान्तों
का विवेचन किया गया है। और तीसरी 'तर्कभाषा' के लेखक श्री केशवमिश्र
[१२७५ ई०] हैं। इसमें ब्राह्मणों के न्यायसिद्धान्तों का मुख्य रूप से और उसके
साथ ही वैशेषिक सिद्धान्तों का संक्षेप रूप से सम्मिलित विवेचन किया
गया है। केशवमिश्र की यह 'तर्कभाषा' बौद्ध विद्वान् मोक्षाकर गुप्त की
'तर्कभाषा' के १७५ वर्ष बाद और यशोविजय की जैन 'तर्कभाषा' से लगभग
चार सौ वर्ष पूर्व लिखी गई थी। यह प्रस्तुत हिन्दी व्याख्या उसी केशव-
मिश्र विरचित 'तर्कभाषा' की हिन्दी व्याख्या है। केशवमिश्र की यह 'तर्कभाषा'
न्याय के उन प्रकरण ग्रन्थों में से है जिन में मुख्य रूप से न्याय के सिद्धान्तों
का प्रतिपादन करते हुए आनुषङ्गिक रूप से वैशेषिक दर्शन के सिद्धान्तों का भी
समावेश कर लिया गया है।
खेद की बात है कि अन्य ग्रन्थकारों के समान 'तर्कभाषा' के लेखक केशवमिश्र
ने भी स्वयं अपना परिचय देने का कोई प्रयत्न नहीं किया है। इसलिए उनका
देश-काल आदि सब ही कुछ अन्धकार में है। उनका जो कुछ थोड़ा सा परिचय
प्राप्त होता है वह उनके शिष्य 'गोवर्धन मिश्र' के द्वारा हमको प्राप्त होता है।
'गोवर्धन मिश्र' ने अपने गुरु श्री केशवमिश्र की इस 'तर्कभाषा' पर 'तर्कभाषा-
प्रकाश' नामक एक टीका लिखी है। इस टीका के प्रारम्भ में एक श्लोक
लिखा है जिस से यह विदित होता है कि 'तर्कभाषा' के निर्माता केशवमिश्र
टीकाकार 'गोवर्धनमिश्र' के गुरु हैं। वह श्लोक जो इस गुरुशिष्य-सम्बन्ध को
बतलाता है इस प्रकार है—
विजयश्रीतनूजन्मा गोवर्धन इति श्रुतः।
तर्कानुभाषां तनुते विविच्य गुरुनिर्मिताम् ॥
इस में 'गोवर्धनमिश्र' ने अपना परिचय देते हुए 'तर्कभाषा' को अपने गुरु
की बनाई हुई बतलाया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि 'केशवमिश्र' 'गोवर्धन
मिश्र के गुरु थे। इसके आगे 'गोवर्धन मिश्र' ने एक श्लोक और लिखा है जिसमें
[ ६१ ]
उन्होंने अपने गुरु श्री केशवमिश्र का परिचय देने का प्रयत्न किया है। वह
श्लोक निम्न प्रकार है—
श्रीविश्वनाथानुज-पद्मनाभानुजो गरीयान् बलभद्रजन्मा ।
तनोति तर्कानधिगत्य सर्वान् श्रीपद्मनाभाद्विदुषो विनोदम् ॥
'गोवर्धन मिश्र' ने इस श्लोक में 'केशवमिश्र' का जो परिचय दिया है
उसके अनुसार उनके पिता का नाम 'बलभद्र' था। उनके दो बड़े भाई क्रमशः
'विश्वनाथ' तथा 'पद्मनाभ' नाम के थे। 'केशवमिश्र' ने अपने बड़े भाई
'पद्मनाभ' से तर्कशास्त्र का अध्ययन कर के 'स्वान्तःसुखाय' इस 'तर्कभाषा'
की रचना की है।
केशवमिश्र के बड़े भाई 'पद्मनाभमिश्र' स्वयं एक बड़े अच्छे नैयायिक
विद्वान् थे। उन्होंने वैशेषिक दर्शन के 'प्रशस्तपाद भाष्य' पर श्री उदयनाचार्य
विरचित 'किरणावली' नामक टीका पर 'किरणावलीप्रकाश' नामक व्याख्या
ग्रन्थ, तथा 'कणादरहस्यमुक्ताहार' नामक एक अन्य ग्रन्थ की रचना की है।
'किरणावली' पर नव्यन्याय के प्रवर्तक 'गंगेशोपाध्याय' के शिष्य 'श्री
वर्धमानोपाध्याय' [ १२५० ई० ] ने भी 'किरणावली-प्रकाश' नाम से ही एक
टीका लिखी है। परन्तु 'पद्मनाभ मिश्र' अपने 'किरणावली-प्रकाश' में 'वर्धमान'
के 'किरणावली-प्रकाश' की अपेक्षा कुछ विशेषता बतलाते हैं। उन्होंने लिखा
है कि 'वर्धमान' ने जिन अर्थों का स्पर्श भी नहीं किया है इस प्रकार के बिल्कुल
नवीन और अपने गुरु द्वारा उपदिष्ट अर्थों का हम अपने इस 'किरणावली-
प्रकाश' में वर्णन कर रहे हैं। उनका श्लोक इस प्रकार है—
उपदिष्टा गुरुचरणैरस्पृष्टा वर्धमानेन ।
किरणावल्यामर्थास्तन्यन्ते पद्मनाभेन ॥
अर्थात् अपने गुरु जी द्वारा बतलाये गए ऐसे अर्थों का जिनको कि 'किरणा-
वली-प्रकाश' नामक टीका के लेखक 'वर्धमानोपाध्याय' ने अपने ग्रन्थ में छुआ भी
नहीं है उनको हम अर्थात् इस नवीन 'किरणावली-प्रकाश' के लेखक 'पद्मनाभ
मिश्र' अपने इस ग्रन्थ में लिख रहे हैं।
इस श्लोक से प्रतीत होता है कि 'पद्मनाभमिश्र' जो कि केशवमिश्र के बड़े
भाई हैं वर्धमानोपाध्याय [ १२५० ई० ] के लगभग समकालीन किन्तु कुछ बाद
के हैं। इसलिए 'पद्मनाभमिश्र' और उनके छोटे भाई केशवमिश्र दोनों का समय
१२७५ ई० के लगभग निश्चित किया गया है।
'वर्धमानोपाध्याय' नव्यन्याय की 'मैथिल शाखा' के पण्डित थे इसलिए
'पद्मनाभ मिश्र' तथा 'केशव मिश्र' को भी प्रायः मैथिल ही माना जाता है। इस
प्रकार तर्कभाषाकार केशवमिश्र १२७५ ई० के लगभग मिथिला में उत्पन्न हुए थे।
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उनके पिता का नाम 'बलभद्र मिश्र' और दो बड़े भाइयों के नाम क्रमशः
'विश्वनाथ मिश्र' तथा 'पद्मनाभ मिश्र' थे। इनके शिष्य 'गोवर्धनमिश्र' थे जिन्होंने
इनकी 'तर्कभाषा' पर 'तर्कभाषाप्रकाश' नामक व्याख्या लिखी है। इतना ही
इनका परिचय इनके शिष्य 'गोवर्धन मिश्र' के द्वारा प्राप्त होता है।
तर्कभाषा की प्राचीन टीकाएँ—
केशव मिश्र की 'तर्कभाषा' में बहुत संक्षेप में और बहुत सुन्दर रूप से न्याय
के पदार्थों का प्रतिपादन किया गया है इसलिए इस पुस्तक ने विद्वानों में
अच्छा आदर पाया है। इसी कारण इस ग्रन्थ के ऊपर थोड़े से समय में ही
प्रायः चौदह टीका लिखी गई हैं। उनके नाम निम्न प्रकार हैं—
१ श्री गोवर्धनमिश्र कृत [ १३०० ] तर्कभाषा-प्रकाशिका ।
२ श्री गोपीनाथ कृत उज्ज्वला टीका।
३ श्री रोमबिल्व वेंकटबुद्ध कृत तर्कभाषा-भाव टीका ।
४ श्री रामलिंग कृत न्यायसंग्रह टीका ।
५ श्री माधवदेव कृत सारमञ्जरी ।
६ श्री भास्कर भट्ट कृत परिभाषादर्पण ।
७ श्री बालचन्द्र कृत तर्कभाषाप्रकाशिका ।
८ श्री चिन्नभट्ट कृत [ १३९० ] तर्कभाषाप्रकाशिका ।
९ श्री गणेशदीक्षित कृत तत्त्वप्रबोधिनी ।
१० श्री कौण्डिन्यदीक्षित कृत तर्कभाषाप्रकाशिका ।
११ श्री केशवभट्ट कृत तर्कदीपिका ।
१२ श्री गौरीकण्ठ सार्वभौम कृत तर्कभाषा-प्रकाशिका ।
१३ श्री नागेशभट्ट कृत [ १७१० ] युक्तिमुक्तावली टीका ।
१४ श्री विश्वकर्मा कृत न्यायप्रदीप ।
'तर्कभाषा' जैसी छोटी सी पुस्तक पर इतनी अधिक टीकाओं का लिखा
जाना उसकी लोकप्रियता और प्रौढ़ता का प्रमाण है। यह छोटा सा ग्रन्थ
भारतीय दर्शन का प्रवेश-द्वार है इसलिए सभी कलाकारों ने उसे अपनी-
अपनी व्याख्याओं द्वारा अलंकृत करने का यत्न किया है। जिस प्रकार विगत
७०० वर्षों से यह ग्रन्थ विद्वानों में आदर प्राप्त करता आ रहा है उसी प्रकार
आशा है इस नवयुग में भी इस नवीन व्याख्या से विभूषित यह ग्रन्थ विशेष
रूप से प्रचार और विद्वज्जनों द्वारा आदर प्राप्त करेगा ।
दीपावली २०१० विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि
तर्कभाषा
‘तर्करहस्यदीपिका’ विभूषिता
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श्रीकेशवमिश्रप्रणीता
तर्कभाषा
उपोद्घातः
अथ श्रीमदाचार्यविश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणिविरचिता
‘तर्करहस्यदीपिकाख्या’ हिन्दीव्याख्या ।
यस्य भूमिः प्रमान्तरिक्षमुतोदरम् ।
दिवं यश्चक्रे मूर्धानं, तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः ॥
नमो विश्वात्मभूताय पूताय परमात्मने ।
सच्चिदानन्दरूपाय तर्कतत्त्वावभासिने ॥
समुद्गता पूता निगमनगतस्तर्कसरिता,
तता या तन्त्रे तैः सुगतजिनविप्रैस्त्रिपथगा ।
तदस्या धाराणां परिचयकृते सम्यगधुना,
वयं व्याख्याव्याजात्तरिमभिनवां सन्तनुमहे ॥
अनुबन्धचतुष्टय—
मनुष्य एक मननशील प्राणी है । वह सदा विचारपूर्वक कार्य करता है,
‘मत्वा कर्माणि सीव्यति’² इसी से मनुष्य कहलाता है । अतएव मनुष्य उसी
कर्म में प्रवृत्त होता है जिसमें उसे ‘इष्टसाधनता’ और ‘कृतिसाध्यता’ का ज्ञान
हो । ‘इदं मदिष्टसाधनम्’ यह कार्य मेरा इष्टसाधन है, इससे मेरे प्रयोजन की
सिद्धि होगी, और ‘इदं मत्कृतिसाध्यम्’ यह कार्य मेरे प्रयत्न से साध्य है, मैं इस
कार्य को कर सकता हूँ ऐसा जान कर ही मनुष्य किसी काम में प्रवृत्त होता है ।
इस ज्ञान में ‘इदं’ पद से १ ‘विषय’, ‘मत्’ पद से २ ‘अधिकारी’, ‘इष्ट’ पद से
३ ‘प्रयोजन’ और ‘साधनम्’ या ‘साध्यम्’ पद से ४ ‘सम्बन्ध’ इन चारों का ज्ञान
आ जाता है । इसलिए ‘विषय’ ‘अधिकारी’, ‘सम्बन्ध’ और ‘प्रयोजन’ इन
१ अथर्ववेद १०,७,३२। २ निरुक्त ३,१,७।