सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
॥ ज्ञानी को अंग ॥ [ २२६
आदि हु तौ नहि अंतहु है नहीं,
मधि शरीर भयौ भ्रम कूप ।
भासत है कछु और की और ई,
ज्यौ रजु मैं अहि सोपि मु रूप ॥
देखि मरीचि उठ्यी विचि विभ्रम,
जांनत नाहि उहै रवि धूपं ।
सुन्दर ज्ञान प्रकाश भयौ जब,
एक अखंडित ब्रह्म अनूप ॥१०॥
मनहर छन्द
जाही कै विवेक ज्ञान ताही कै कुशल भई,
जाही ओर जाइ वाकौं ताही ओर सुख है ।
जैसै कोऊ पाइनि पजार कौं चढाइ लेत,
ताकौ तो न काऊ कांटे खोभरे कौ दुख है ॥
भावै कोऊ निन्दा करौ भावै तौ प्रससा करौ,
वौ तौ देखै आरसी मैं आपनौ ई मुख है ।
देह कौ व्यौहार सब मिथ्या करि जांनै सोई,
सुन्दर कहत एक आतमा की रुख है ॥११॥
(१०) मरीचि-मृगतृष्णा * विचि-वीचि, जल की
तरंगें ।
(११) पैजार-जूती । खोभरा-खड्डा । रुख-लक्ष्य ।
२३० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अंतहकरन जाकै तम गुन छाइ रह्यौ,
जड़ता अज्ञान वाकै आलस भै त्रास है।
रज गुन कौ प्रभाव अंतहकरन जाकै,
विविध करम वाकै कामनां को वास है ॥
सत्त्व गुन अंतहकरन जाकै देखियत,
क्रिया करि सुध वाकै भक्ति कौ निवास है।
त्रिगुन अतीत साक्षी तुरीय स्वरूप जानि,
सुन्दर कहत वाकै ज्ञान को प्रकाश है ॥१२॥
तमोगुनी बुद्धि सु तौ तवा कै समान जैसे,
ताकै मध्य सूरज की रच हू न जोति है।
रजोगुनी बुद्धि जैसे आरसी की औंधी ओर,
ताकै मध्य सूरज कौ कछुक उद्योत है॥
सतोगुनी बुद्धि जैसे आरसी की सूधी ओर,
ताकै मध्य प्रतिबिंब सूरज की पोत है।
त्रिगुन अतीत जैसे प्रतिबिंब मिटि जात,
सुन्दर कहत एक सूरज ई होत है ॥१३॥
(१२) तुरीय-चतुर्थ अवस्था । भै भय ।
(१३) उद्योत-प्रकाश । पोत-छाया ।
॥ ज्ञानी को अग ॥ [ २३१
सबसौँ उदास होइ काढ़ि मन भिन्न करै,
ताकौ नाम कहियत परम बैराग है ।
अंतहकरन हूं की वासना निवृत्त होहि,
ताकौ मुनि कहत हैं उहै बडौ त्याग है ॥
चित्त एक ईश्वर सौं नेकहू न न्यारौ होइ,
उहै भक्ति कहियत उहै प्रेम माग है ।
आपु ब्रह्म जगत कौ एक करि जानै जब,
सुन्दर कहत वह ज्ञान भ्रम भाग है ॥१४॥
भ्रम विध्वंस
कोऊ नृप फूलनि की सेज पर सूतौ आइ,
जब लग जाग्यौ तौ लौं अति सुख मान्यौ है ।
नीद जब आई तब वाही कौ सुपन भयौ,
जाइ पर्यौ नरक कै कुंड मैं यों जान्यौ है ॥
अति दुख पावै पर निकस्यौ न क्यौ ही जाइ,
जागि जब पर्यौ तब सुपन बखान्यौ है ।
इह झूठ वह झूठ जाग्रत सुपन दोऊ,
सुन्दर कहत ज्ञानी सब भ्रम भान्यौ है ॥१५॥
(१४) माग-मार्ग । भ्रमभाग-भ्रान्ति रहित ।
२३२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
सुपनै मै राजा होइ सुपनै मैं रक होइ,
सुपनै मैं सुख दुख सति करि जानै है ।
सुपनै मैं बुद्धिहीन मूढ समझै न कछु,
सुपनै मैं पडित बहु ग्रथनि बखानै है ॥
सुपनै मैं कामी होइ इद्रनि कै बसि पर्यौ,
सुपनै मैं जती होइ अहकार आनै है ।
सुपनै ते जाग्यौ जब समुझि परी है तब,
सुन्दर कहत सब मिथ्या करि मानै है ॥१६॥
बिधि न निषेध कछु भेद न अभेद पुनि,
क्रिया सौ कग्त दीसै यौ ही नित प्रति है ।
काहू कौ निकट राखै काहू कौ तौ दूरि भाखै,
काहू सौ नेरै न दूरि ऐसी जाकी मति है ॥
राग ही न द्वेष कोऊ शोक न उछाह दोऊ,
ऐमी विधि रहै कहु रति न विरति है ।
वाहिर व्यौहार ठानै मन मैं सुपन जानै,
सुन्दर ज्ञानी की कछु अदभूत गति है ॥१७॥
(१६) जती-यति, साधु सन्यासी ।
(१७) विधि-विधान, आज्ञा । उछाह-उत्साह, उमग,
खुशी । रति-आसक्ति । विरति-वैराग्य, अरुचि ।
॥ ज्ञानी को अंग ॥ [ २३३
कामी है न जती है न सूम है न सती है न,
- राजा है न रक है न तन है न मन है।
सोवै है न जागै है न पीछे है न आगै है न,
ग्रहै है न त्यागै है न घर है न वन है॥
थिर है न डोलै है न मौन है न बोलै है न,
बधै है न खोलै है न स्वामी है न जन है।
वैसौ कोऊ होइ जब वाकी गति जानै तब,
सुन्दर कहत ज्ञानी शुद्ध ज्ञान-घन है ॥१८॥
सुनत श्रवन मुख बोलत बचन घ्रान,
सूघन फूलनि रूप देखत दृगन है।
त्वक् सपर्शन रस रसना ग्रसन कर,
ग्रहत असन अरु चलत पगन है॥
करत गवन पुनि बैठत भवन सेज,
सोवत रवन तन औढत नगन है।
जु जु कछु बिवहार जानत सकल भ्रम,
सुन्दर कहत ज्ञानी गगन-मगन है ॥१९॥
(१९) अशन-भोजन । गगनमगन-आकाशवत् शुद्ध
व्यापक ब्रह्म स्वरूप ।
२३४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
कर्म न विकर्म करै भाव न अभाव धरै,
शुभ हू अशुभ परै यातै निधरक है।
बसती न शून्य जाकै पाप ही न पुन्य ताकै,
अधिक न न्यून वाकै स्वर्ग न नरक है॥
सुख दुख सम दोऊ नीच ही न ऊच कोऊ,
ऐसी विधि रहै सोऊ मिल्यौ न फरक है।
एक ही न दोइ जानै बध मोक्ष भ्रम मानै,
सुन्दर कहत ज्ञानी ज्ञान मै गरक है ॥२०॥
अज्ञानी कौ दुख कौ समूह जग जानियत,
ज्ञानी कौ जगत सब आनन्द स्वरूप है।
नैन हीन कौ तौ घर बाहिर न सूझै कछु,
जहा जहा जाइ तहा तहा अधकूप है॥
जाकै चक्षु है प्रकाश अंधकार भयौ नाश,
वाकौ जहा रहै तहा सूरज की धूप है।
सुन्दर अज्ञानी ज्ञानी अंतरि बहुत आहि,
वाकै सदा राति वाकै दिवस अनूप है ॥२१॥
(२०) निधरक-बेधटक, निर्भय । गरक-मग्न, डूबा
हुआ ।
॥ ज्ञानी को अंग ॥ [ २३५
ज्ञानी अरु अज्ञानी की क्रिया सब एकसी ही,
अज्ञ आशा और ज्ञानी आश न निराश है ।
अज्ञ जोई जोई करै अहकार बुद्धि धरै,
ज्ञानी अहकार बिनु करत उदास है ॥
अज्ञ सुख दुख दोऊ आपु विषै मानि लेत,
ज्ञानी सुख दुख कौ न जानै मेरे पास है ।
अज्ञ कौ जगत यह सकल सताप करै,
सुन्दर ज्ञानी कै सब ब्रह्म कौ बिलास है ॥२२॥
ज्ञानी लोक संग्रह कौ करत व्यौहार बिधि,
अंतहकरन मैं सूपन की सी दौर है ।
देत उपदेश नाना भाति के वचन कहि,
सब कोऊ जानत सकल शिरमौर है ॥
हलन चलन पुनि देह सौ करत नित,
ज्ञान मैं गरक नित हिये निज ठौर है ।
सुन्दर कहत जैसे दन्त गजराज मुख,
खाइबे के और ही दिखाइबे कै और है ॥२३॥
(२३) लोक-संग्रह-लोक-शिक्षा ।
२३६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
इद्रिनि कौ ज्ञान जाकै सु तौ पशु कै समान,
देह अभिमान खान पान ही सौं लीन है ।
अंतहकरन ज्ञान कछुक बिचार जाकै,
मनुष व्यौहार शुभ कर्मनि अधीन है ॥
आतमा बिचार ज्ञान जाके निशवासरि है,
सोई साधु सकल [ही बात मैं प्रबीन है ।
एक परमातमा कौ ज्ञान अनुभव जाकै,
सुन्दर कहत वह ज्ञानी भ्रम छीन है । २४॥
जाही ठौर रवि कौ उद्योत भयौ ताही ठौर,
अंधकार भागि गयौ गृह बनवास तैं ।
न तौ कछु बन तैं उलटि आवै घर माहि,
न तौ बन चलि जाइ कनक आवास तैं ॥
जैसे पखी पाख टूटि जाही ठौर पर्यौ आइ,
ताही ठौर गिरि रह्यौ उडिबे की आश्र तें ।
सुन्दर कहत मिटि जाइ सब दौर धूप,
धोखौ न रहत कोऊ ज्ञान के प्रकाश तैं ।२५।।
(२४) निशवासर-रातदिन ।
(२५) कनक-सुवर्ण । आवास-महल ।
॥ ज्ञानी को अग ॥ [ २३७
जैसे काहू देश जाइ भाषा कहै और सी ही,
समुझ न कोऊ वासी कहै का कहतु है ।
कोऊ दिन रहि करि बोली सीखै उनही की,
फेरि समुझावै तब सबकौ लहतु है ॥
तैसे ज्ञान कहैं तै सुनत बिपरीत लागै,
आप आपुनौ ही मत सबकौ गहतु है ।
उनही के मत करि ¸न्दर कहत ज्ञान,
तबही तौ ज्ञान ठहराइ के रहतु है ॥२६॥
एक ज्ञानी कर्मनि मैं ततपर देखियत,
भक्ति कौ प्रभाव नाहिं ज्ञान मैं गरक है ।
एक ज्ञानी भकति कौ अत्यन्त प्रभाव लिये,
ज्ञान माहि निश्चै कर कर्म सौ तरक है ॥
एक ज्ञानी ज्ञानही मैं ज्ञानकौ उच्चार करै,
भक्ति अरु कर्म इनि दुहु तै फरक है ।
कर्म भक्ति ज्ञान तीनौ वेद मै बखान कहे,
सुन्दर बतायो गुरु ताहि मैं लरक है ॥२७॥
(२७) भकति-भक्ति । तरक-तर्क । लरक-तत्पर, लगा
हुआ ।
२३८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
जसै पखी पगनि सौ चलत अवनि आड,
तैसे ज्ञानी देह करि कर्मनि कग्तु है !
जैस पखी चचु करि चुगत अहार पुनि,
तैसे ज्ञानी उर मै उपासना धरतु है ॥
जैसे पखी पखनि सौ उडत गगन माहि,
तैसे ज्ञानी ज्ञान करि ब्रह्म मैं चरतु है ।
सुन्दर कहत ज्ञानी तीनौ भाति देखियत,
ऐसी विधि जानै सब सशय हरतु है ॥२८॥
इन्दव छन्द
एक क्रिया करि किर्षि निपावत
आदि रु अंत ममत्त्व वध्यौ है ।
एक क्रिया करि पाक करै जब,
भोजन लौ कछु अन्न रध्यौ है ॥
एक क्रिया मल त्यागत है,
लघुनीति करै कहु नाहिं फध्यौ है ।
त्यौ यह ज्ञानि क्रिया अरु सग्रह,
सुन्दर तीनि प्रकार सध्यौ है ॥ ६॥
(२८) अवनि-पृथ्वी, जमीन । अहार-आहार, भोजन ।
उर-हृदय, मन ।
(२६) किर्षि कृषि, खेती । निपावत-उपजाता है ।
॥ ज्ञानी को अंग ॥ [ २३६
दोइ जने मिलि चौपरि खेलत,
सारि धरै पुनि डारत पासा ।
जीतत है सु खुशी मन मैं अति,
हारत है सु भरै जु उषासा ॥
एक जनौ दुहु ओर हो खेलत,
हारि न-जीति करै जु तमासा ।
तैसे अज्ञानी कै द्वैत भयौ भ्रम,
सुन्दर ज्ञानी कै एक प्रकासा ॥३०॥
॥ सवईया छंद ॥
जीव नरेश अविद्या निद्रा,
सुख शय्या सोयौ करि हेत ।
कर्म खवास पुटपरी लाई,
तातै बहु बिधि भयौ अचेत ॥
भक्ति प्रधान जगायौ कर गहि,
आलस भर्यौ अभाई लेत ।
सुन्दर अब निद्रा बस नाही,
ज्ञान जागरण सदा सुचेत ॥३१॥
(३१) पुटपरी-नशीली चीजो की पुट दी हुई शराब ।
या पगचची ।
२४० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
ज्ञानी कर्म करै नाना विधि,
अहंकार या तन कौ खोवै ।
कर्मन कौ फल कछू न वंछै,
अंतहकरन वासना धोवै ॥
ज्यौं कोऊ खेतनि कौं जोतत,
लै करि वीज भू नि करि वोवै ।
सुन्दर कहै सुनौ दृष्टान्त हि,
नागौ न्हाइ सु कहा निचोवै ॥३२॥
॥ इति ज्ञानी को अंग सम्पूर्ण ॥
ान का अंग ॥ । २८३
ग ज्ञानं को अंग
३१॥
ष ६८
गढ़ गवत,
नहीं कुलवानो ।
नि दीमन,
से नव नारी ।
अगन्तरि,
मनवारी ।
पें यर,
ती न्यारी ॥१॥
तरि,
ंतवारी ।
च,
यारी ॥
री ।
री ॥२॥
हृदय में ।
५. सवैया, पद संग्रह एवं उपसंहार
२४२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
इन्दव छंद
कै यह देह धरौ वन पर्वत,
कै यह देह नदी मैं वहौ जू ।
कै यह देह धरौ धरती महि,
कै यह देह कृसान दहौ जू ॥
कै यह देह निरादर निंदहु,
कै यह देह सराहि कहौ जू ।
सुन्दर सशय दूरि भयौ सब,
कै यह देह चलौ कि रहौ जू ॥ ३ ॥
कै यह देह सदा सदा सुख सम्पति,
कै यह देह विपत्ति परौ जू ।
कै यह देह निरोग रहौ नित,
कै यह देह हि रोग चरौ जू ॥
कै यह देह हुताशन पैठहु,
कै यह देह हिमारै गरौ जू ।
सुन्दर सशय दूरि भयौ सब,
कै यह देह जिवौ कि मरौ जू ॥४॥
॥ इति निः सशय ज्ञान को अङ्ग सम्पूर्ण ॥
(३) कृसान-कृशानु, अग्नि। (४) हुताशन-अग्नि।
हिमारै-हिमालय ।
॥ प्रेमपरायण ज्ञान को अंग ॥ । २०३
अथ प्रेमपरायण ज्ञान को अंग
॥३१॥
सुन्दर द्रव
प्रीति की रीति नही कछु गनन,
जानि न पानि नही कुलगारो ।
प्रेम के नेम कछु नहिं दीसत,
लाज न कान नग्यो सब खारौ ।
लीन भयी हरि सों अभ्यन्तरि,
आठहू जाम रहै मनवारी ।
सुन्दर कोऊ न जानि सकै यह,
गोकुल गाव की पेंडी ही न्यारी ॥१॥
ज्ञान दियो गुरुदेव कृपा करि,
दूरि कियौ भ्रम खोलि किवारी ।
और क्रिया कहि कौन करै अब,
चित लग्यौ परब्रह्म पियारी ॥
पाव बिना चलिकै तिहि ठाहर,
पंगु भयी मन मीत हमारी ।
सुन्दर कोउ न जानि सकै यह,
गोकुल गाव की पेंडी ही न्यारी ॥२॥
(१) कुलगारो-कुलगोत्र । अभ्यन्तर-भीतर हृदय मे
पेंडो-मार्ग ।
२४४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
एक अखंडित ज्यों नभ व्यापक,
बाहिर भीतरि है इकसारौ ।
दृष्टि न मुष्टि न रूप न रेख न,
श्वेत न पीत न रक्त न कारौ ।
चक्रित होइ रहै अनुभै विन,
जौ लगि नाहि न ज्ञान उजारौ ।
सुन्दर कोउ न जानि सकै यह,
गोकुल गावको पेंडौ ही न्यारौ ॥३॥
द्वंद्व बिना बिचरै बसुधा पर,
जा घट आतम ज्ञान अपारौ ।
काम न क्रोध न लोभ न मोह न,
राग न द्वेष न म्हारी न थारौ ।
जोग न भोग न त्याग न संग्रह,
देह दशा न ढक्यो न उघारौ ।
सुन्दर कोउ न जानि सकै यह,
गोकुल गावको पेंडौ ही न्यारौ ॥४॥
(३) चक्रित-चकित । नभ-आकाश । (४) द्वन्द्व-शीत-
उष्ण, भूख-प्यास सुख-दुख, मान-अपमान, जय-पराजय
आदि । वसुधा-पृथ्वी ।
॥ प्रेमपरायण ज्ञान को अंग ॥ [२४५
लक्ष अलक्ष न दक्ष अदक्ष न,
पक्ष अपक्ष न तूल न भारो ।
झूठ न साच अवाच न वाच न,
कंचन काच न दीन उदारो ॥
जान अजान न मान अमान न,
ज्ञान गुमान न जीत न हारो ।
सुन्दर कोउ न जानि सकै यह,
गौकुल गाव की पैंढो ही न्यारी ॥५॥
५ इति प्रेमपरायण ज्ञान को अंग सम्पूर्ण ॥
(५) लक्ष-लक्ष्य । अलक्ष-अलक्ष्य । दक्ष-निपुण, चतुर,
कुशल । तूल-हल्का । अवाच-अवाच्य, अवर्णनीय । वाच-
वाच्य, वर्णनीय । दीन-गरीब । उदार-दानी ।
२४६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अथ अद्वैत ज्ञान को अंग ॥३२॥
इन्देव छंद (प्रश्नोत्तर)
हौ तुम कौन ? हू ब्रह्म अखंडित,
देह मै क्यो ? नहि देह कै नेरै ।
बोलत केसै कै ? हूं नहि बोलत,
जानिये कैसै ? अज्ञान है तेरै ॥
दूरि करो भ्रम ? निश्चै धारि,
कहौ गुरुदेव ? कहौ नित टेरै ।
हू तुम ऐसे, हि तू पुनि ऐसौ ई,
दोइ भये ? नहिं द्वैत है मेरै ॥१॥
हू कछु और कि तू कछु और कि,
है कछु और कि सो कछु औरै ।
हू अरु तू यह है कछू सौ पुनि,
बुद्धि विलास भयौ झक झौरै ॥
हू नहि तू नहिं है कछु सौ नहि,
बूझि बिना जित ही तित दौरै ।
हू पुनि तू पुनि है कछु सो पुनि,
सुन्दर व्यापि रह्यौ सब ठौरै ॥२॥
उत्तम मद्धिम और शुभाशुभ,
भेद अभेद जहा लग जो है ।
॥ अद्वैत ज्ञान को अंग ॥ [ २४७
दीसन भित्त तयो भ्रम दर्पन,
वस्तु दिषावन एकई सो है ॥
जो सुनिये गन दृष्टि परे पुनि,
वा बिन ओर नहीं अब को है ।
सुन्दर सुन्दर व्यापि रह्यो सब,
सुन्दर ही महि सुन्दर सो है ॥३।
ज्यों बन एक अनेक भये द्रुम,
नाम अनंतनि जाति हु न्यारी ।
वापि तडाग रु कूप नदी सब,
है जल एक सो देषौ निहारी ॥
पावक एक प्रकास बहू विधि,
दीप चिराफ़ मसाल हु वारी ।
सुन्दर ब्रह्म विलास अखंडित,
पंडित भेद की बुद्धि सु टारी ॥४॥
एक शरीर मैं अंग भये बहु,
एक धरा पर धाम अनेका ।
एक शिला महिं कोरि किये सब,
चित्र बनाइ घरे ठिकठेका ॥
एक समुद्र तरंग अनेकनि,
कैसे के कीजिये भिन्न विवेका ।
द्वैत कछू नहिं देखिये सुन्दर,
ब्रह्म अखंडित एक की एका ॥५॥
२४८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
ज्यों मृतिका घट नीर तरंग हि,
बादल व्योम सु व्योम जु भूता ॥
वृक्ष सु वीज है वीज सु वृक्ष है,
पूत सु वाप है वाप सु पूता ।
वस्तु विचारत एक हि सुन्दर,
ताने रु बानै तौ देखिये सूता ॥६॥
भूमि हु चेतनि आपु हु चेतनि,
तेज हु चेतनि है जु प्रचंडा ।
वायु हु चेतनि ब्योम हु चेतनि,
शब्द हु चेतनि पिंड ब्रह्माण्डा ॥
है मन चेतनि बुद्धि हु चेतनि,
चित्त हु चेतनि आहि उडंडा ।
जो कछु नाम धरै सौई चेतनि,
चेतनि सुन्दर ब्रह्म अखंडा ॥७॥
एक अखंडित ब्रह्म बिराजत,
नाम जुदौ करि विश्व कहावै ।
एक ई ग्रंथ पुरान बखानत,
एक ई दत्त बसिष्ठ सुनावै ॥
एक ई अर्जुन उद्धव सौ कहि,
कृष्ण कृपा करिकै समुझावै ।
सुन्दर द्वैत कछू मति जानहु,
एक ई ब्यापक बेद बतावै ॥८॥