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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 238

॥ ज्ञानी को अंग ॥ [ २२६
आदि हु तौ नहि अंतहु है नहीं,
मधि शरीर भयौ भ्रम कूप ।
भासत है कछु और की और ई,
ज्यौ रजु मैं अहि सोपि मु रूप ॥
देखि मरीचि उठ्यी विचि विभ्रम,
जांनत नाहि उहै रवि धूपं ।
सुन्दर ज्ञान प्रकाश भयौ जब,
एक अखंडित ब्रह्म अनूप ॥१०॥
मनहर छन्द
जाही कै विवेक ज्ञान ताही कै कुशल भई,
जाही ओर जाइ वाकौं ताही ओर सुख है ।
जैसै कोऊ पाइनि पजार कौं चढाइ लेत,
ताकौ तो न काऊ कांटे खोभरे कौ दुख है ॥
भावै कोऊ निन्दा करौ भावै तौ प्रससा करौ,
वौ तौ देखै आरसी मैं आपनौ ई मुख है ।
देह कौ व्यौहार सब मिथ्या करि जांनै सोई,
सुन्दर कहत एक आतमा की रुख है ॥११॥
(१०) मरीचि-मृगतृष्णा * विचि-वीचि, जल की
तरंगें ।
(११) पैजार-जूती । खोभरा-खड्डा । रुख-लक्ष्य ।