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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 245

२३६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
इद्रिनि कौ ज्ञान जाकै सु तौ पशु कै समान,
देह अभिमान खान पान ही सौं लीन है ।
अंतहकरन ज्ञान कछुक बिचार जाकै,
मनुष व्यौहार शुभ कर्मनि अधीन है ॥
आतमा बिचार ज्ञान जाके निशवासरि है,
सोई साधु सकल [ही बात मैं प्रबीन है ।
एक परमातमा कौ ज्ञान अनुभव जाकै,
सुन्दर कहत वह ज्ञानी भ्रम छीन है । २४॥
जाही ठौर रवि कौ उद्योत भयौ ताही ठौर,
अंधकार भागि गयौ गृह बनवास तैं ।
न तौ कछु बन तैं उलटि आवै घर माहि,
न तौ बन चलि जाइ कनक आवास तैं ॥
जैसे पखी पाख टूटि जाही ठौर पर्यौ आइ,
ताही ठौर गिरि रह्यौ उडिबे की आश्र तें ।
सुन्दर कहत मिटि जाइ सब दौर धूप,
धोखौ न रहत कोऊ ज्ञान के प्रकाश तैं ।२५।।
(२४) निशवासर-रातदिन ।
(२५) कनक-सुवर्ण । आवास-महल ।