सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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॥ ज्ञानी को अंग ॥ [ २३५
ज्ञानी अरु अज्ञानी की क्रिया सब एकसी ही,
अज्ञ आशा और ज्ञानी आश न निराश है ।
अज्ञ जोई जोई करै अहकार बुद्धि धरै,
ज्ञानी अहकार बिनु करत उदास है ॥
अज्ञ सुख दुख दोऊ आपु विषै मानि लेत,
ज्ञानी सुख दुख कौ न जानै मेरे पास है ।
अज्ञ कौ जगत यह सकल सताप करै,
सुन्दर ज्ञानी कै सब ब्रह्म कौ बिलास है ॥२२॥
ज्ञानी लोक संग्रह कौ करत व्यौहार बिधि,
अंतहकरन मैं सूपन की सी दौर है ।
देत उपदेश नाना भाति के वचन कहि,
सब कोऊ जानत सकल शिरमौर है ॥
हलन चलन पुनि देह सौ करत नित,
ज्ञान मैं गरक नित हिये निज ठौर है ।
सुन्दर कहत जैसे दन्त गजराज मुख,
खाइबे के और ही दिखाइबे कै और है ॥२३॥
(२३) लोक-संग्रह-लोक-शिक्षा ।