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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 241

२३२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
सुपनै मै राजा होइ सुपनै मैं रक होइ,
सुपनै मैं सुख दुख सति करि जानै है ।
सुपनै मैं बुद्धिहीन मूढ समझै न कछु,
सुपनै मैं पडित बहु ग्रथनि बखानै है ॥
सुपनै मैं कामी होइ इद्रनि कै बसि पर्यौ,
सुपनै मैं जती होइ अहकार आनै है ।
सुपनै ते जाग्यौ जब समुझि परी है तब,
सुन्दर कहत सब मिथ्या करि मानै है ॥१६॥
बिधि न निषेध कछु भेद न अभेद पुनि,
क्रिया सौ कग्त दीसै यौ ही नित प्रति है ।
काहू कौ निकट राखै काहू कौ तौ दूरि भाखै,
काहू सौ नेरै न दूरि ऐसी जाकी मति है ॥
राग ही न द्वेष कोऊ शोक न उछाह दोऊ,
ऐमी विधि रहै कहु रति न विरति है ।
वाहिर व्यौहार ठानै मन मैं सुपन जानै,
सुन्दर ज्ञानी की कछु अदभूत गति है ॥१७॥
(१६) जती-यति, साधु सन्यासी ।
(१७) विधि-विधान, आज्ञा । उछाह-उत्साह, उमग,
खुशी । रति-आसक्ति । विरति-वैराग्य, अरुचि ।