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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 248

॥ ज्ञानी को अंग ॥ [ २३६
दोइ जने मिलि चौपरि खेलत,
सारि धरै पुनि डारत पासा ।
जीतत है सु खुशी मन मैं अति,
हारत है सु भरै जु उषासा ॥
एक जनौ दुहु ओर हो खेलत,
हारि न-जीति करै जु तमासा ।
तैसे अज्ञानी कै द्वैत भयौ भ्रम,
सुन्दर ज्ञानी कै एक प्रकासा ॥३०॥
॥ सवईया छंद ॥
जीव नरेश अविद्या निद्रा,
सुख शय्या सोयौ करि हेत ।
कर्म खवास पुटपरी लाई,
तातै बहु बिधि भयौ अचेत ॥
भक्ति प्रधान जगायौ कर गहि,
आलस भर्यौ अभाई लेत ।
सुन्दर अब निद्रा बस नाही,
ज्ञान जागरण सदा सुचेत ॥३१॥
(३१) पुटपरी-नशीली चीजो की पुट दी हुई शराब ।
या पगचची ।