सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
सुदामा-चरित / ३७
समझा। 'महाभारत' एवं 'श्रीमद्भागवत' में उनके महान् व्यक्तित्व की जो
असंख्य मणियाँ विकीर्ण मिलती हैं, उन्हें भली प्रकार से संजोने का कार्य अभी
शेष है। इस गुरुतर कार्य के एक अंश को पूरा करने का स्तुत्य प्रयास हम
'सुदामा-चरित' में देखते हैं। कविवर नरोत्तमदास ने श्रीकृष्ण के उदात्त मैत्री-
आदर्श को अपनी इस रचना में प्रतिष्ठित किया है।
निस्सन्देह 'सुदामा-चरित' की पूर्ववर्त्ती एवं परवर्त्ती काव्य-रचनाओं में
सुदामा के दारिद्र्य-भंजन की कथा को लेकर अनेक कवियों ने लेखनी उठाई।
किन्तु इस दिशा में जो सफलता कविवर नरोत्तमदास को मिली वह अन्य किसी
कवि को नहीं। सुदामा के दारिद्र्य-वर्णन और श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री का
मर्मस्पर्शी वर्णन करने में 'सुदामा-चरित' के निर्माता अपूर्व सफलता गौरवमयी
है। उसी से यह काव्य युग-युगों तक पाठकों के हृदय-तल को स्पर्श करता रहेगा।
और श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री का सन्देश देता रहेगा।
कविवर नरोत्तमदास से पूर्व महाकवि सूरदास ने निर्धन सुदामा की कथा
को अपने 'सूरसागर' के बीस पदों में चित्रित किया है, किन्तु इस भावपूर्ण प्रसंग
को वे अधिक मार्मिकता प्रदान नहीं कर सके हैं। श्रीकृष्ण के उदात्त मैत्री-
आदर्श को प्रतिष्ठित करना उनका अभीष्ट भी प्रतीत नहीं होता है। अष्टछाप
के दूसरे प्रसिद्ध कवि नन्ददास ने भी 'सुदामा-चरित' का सृजन किया था, किन्तु
वह अनुपलब्ध है। कुछ विद्वानों के अनुसार वह उनकी 'सम्पूर्ण भाषा भागवत'
नामक अप्राप्य रचना का अंश है। नरोत्तमदास कृत 'सुदामा-चरित' अपने पूर्व-
वर्त्ती सुदामा विषयक काव्य-ग्रन्थों से निर्विवाद रूप से श्रेष्ठ रचना है।
नरोत्तमदास के परवर्त्ती अनेक कवियों ने भी इस क्षेत्र में कार्य किया,
यथा—सं० १६८३ के आसपास आलम कवि ने 'सुदामा-चरित' की रचना
रेखता में की। यह केवल ६० पद्यों का लघु काव्य है। सं० १७३१ में के लग-
भग कवि कालीराम ने 'सुदामा-चरित' का सृजन ब्रजभाषा में किया। अठा-
रहवीं शताब्दी में जिन कवियों ने सुदामा-चरित से सम्बद्ध काव्य-रचनाओं का
सृजन किया, उनमें माखन, खण्डन, वीर आदि कवियों के नाम उल्लेखनीय हैं।
उन्नीसवीं शताब्दी में इस परम्परा को विकास प्रदान करने वाले प्रमुख कवि
३८ / सुदामा-चरित
हैं—गोपाल, प्राणनाथ, बालकदास फकीर आदि। बीसवीं शताब्दी में सुदामा
विषयक रचनाओं का प्रणयन करने वाले कवियों में हलधर, महाराजदास तथा
भूधर के नाम प्रसिद्ध हैं। इस परम्परा को हिन्दी-कवियों ने ही नहीं वरन्
पंजाबी के कवियों ने भी प्रोत्साहन दिया; जिनमें साहिबदास, हृदयराम, राम-
दास मिश्र आदि कवियों का नाम उल्लेखनीय हैं। किन्तु सुदामा विषयक
काव्य-कृतियों की इस दीर्घ परम्परा में नरोत्तमदास का 'सुदामा-चरित' आज
भी वेजोड़ काव्य-रचना है। इसकी भाव-व्यंजना एवं कलासौष्ठव अत्यन्त
प्रभावोत्पादक है। इसमें प्रतिष्ठित श्रीकृष्ण की आदर्शमैत्री, कृष्ण-काव्य में
तो क्या सारे हिन्दी-साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखती है। उदात्त
मैत्री-भावना के ऐसे भव्य दृष्टान्त, विश्व-साहित्य में इने-गिने ही मिलेंगे।
वस्तुतः कविवर नरोत्तमदास विरचित 'सुदामा-चरित' एक अमर काव्य-रचना
है।
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सुदामा-चरित
(मूल पाठ)
(दोहा)
श्रीगनेस सुमिर करौं, उपजै बुद्धि प्रकास ।
सो चरित्र वरनन करी, जातैं दारिद नास ॥१॥
ज्यों गंगा-जल-पान तें, पावत पद निरवान ।
त्यों सिंधुर-मुख-वात तें, मूढ़ होत बुधिवान ॥२॥
कृस्न-मित्र कइ जन्म को, ताको वरनन कीन्ह ।
सुख संपति माया मिलै, सो उपदेश जु दीन्ह ॥३॥
बिप्र सुदामा बसत हो, सदा आपने धाम ।
भीख माँगि भोजन करैं, हिये जपत हरि-नाम ॥४॥
ताकी घरनी पतिब्रता, गहे वेद की रीति ।
सलज सुसील सुबुद्धि अति, पति-सेवा सौं प्रीति ॥५॥
कह्यौ सुदामा एक दिन, ‘कृस्न हमारे मित्र’ ।
करत रहति उपदेश तिय, ऐसो परम-विचित्र ॥६॥
स्त्री
महादानि जिनके हितू, जदु-कुल-कैरव-चंद ।
ते दारिद-संताप तें, रहैं न किमि निरद्वंद ॥७॥
कह्यौ सुदामा ‘बाम ! सुने, वृथा और सब भोग ।
सत्यभजन भगवान को, धर्म-सहित जप-जोग’ ॥८॥
४० / सुदामा-चरित
स्त्री
(कवित्त)
लोचन-कमल दुख-मोचन तिलक भाल,
स्रवननि कुंडल मुकुट धरे माथ हैं
ओढ़े पीत-बसन गरे मैं बैजयन्ती-माल,
संख चक्र गदा और पदम लिए हाथ हैं ।
कहत नरोत्तम संदीपनि गुरू के पास,
तुम ही कहत हम पढ़े एक साथ हैं ।
द्वारिका के गए हरि दारिद हरेंगे पिय,
द्वारिका के नाथ वै अनाथन के नाथ हैं ॥६॥
(सवैया)
सुदामा
सिच्छक हौं सिगरे जग को तिय, ताको कहा, अब देति है सिच्छा ।
जे तप कै परलोक सुधारत, संपति की तिन नहिं इच्छा ॥
मेरे हिते हरि के पद-पंकज, वार हजार लै देखु परिच्छा ।
औरन को धन चाहिय बावरि, बांभन को धन केवल भिच्छा ॥१०॥
स्त्री
दानी बड़े तिहुँ लोकन में, जग जीवत नाम सदा जिनको लै ।
दीनन की सुधि लेत भली विधि, सिद्धि करौ पिय मेरो मतो लै ॥
दीनदयाल के द्वार न जात सो, और के द्वार पै दीन ह्वै बोलै ।
श्रीजदुनाथ-से जाके हितू, सो तिहूं पन क्यों कन माँगत डोलै ॥११॥
सुदामा
छत्रिन के प्रन जुद्ध, जुवा, सजि वाजि, चढ़ें गजराजन ही ।
बैस को बानिज और कृषि, प्रन सूद्र को सेवन-साजन ही ॥
सुदामा-चरित / ४१
विप्रन को प्रन है जु यही सुख संपति सों कछु काज नहीं।
कै पढ़िबो, कै तपोधन है, कन माँगत बाँभनै लाज नहीं ॥१२॥
स्त्री
कोदो सवाँ जुरतो भरि पेट, न चाहति हौं दधि दूध मिठौती ॥
सीत बितीत गयौ सिसियातहिं, हौं हठती पै तुम्हें न हठौती ।
जौ जनती न हितू हरि सों तुम्हें काहे का द्वारिका पेलि पठौती ।
या घर तें न गयो कबहुँ पिय ! टूटौ तवा अरु फूटी कठौती ॥१३॥
सुदामा
छाँड़ि सबै जक तोहि लगी बक, आठहुँ जाम यहै जक ठानी ।
जातहिं दैहैं लदाय लड़ा भरि लैहौं लदाय यहै जिय जानी ॥
पावैं कहाँ तें अटारी अटा, जिनके विधि दीन्हीं है टूटी-सी छानी ।
जो पै दरिद्र लिखो है ललाट तौ, काहू-पै मेटि न जात अजानी ॥१४॥
स्त्री
पूरन पैज करी प्रह्लाद की, खंभ सों बाँध्यो पिता जिहि बेरे ।
द्रौपदी ध्यान धर्यौ जबहीं, तबहीं पट-कोट लगे लगे चहुँ फेरे ।
ग्राह तें छूटि गयंद गयौ पिय ! है हरि को निहचै जिय मेरे ।
ऐसे दरिद्र हजार हरैं वै, कृपानिधि लोचन-कोर के हेरे ॥१५॥
सुदामा
चक्कवै चौंकि रहे चकि-से, तहाँ भूले-से भूप कितेक गनाऊँ ।
देव गंधर्व और किन्नर जच्छ-से, साँझ लौं देखे खरे जिहि ठाऊँ ॥
तैं दरबार बिलोक्यौ नहीं अब तोहि कहा कहिकै समुझाऊँ ।
रोकिए लोकन के मुखिया, तहँ हौं दुखिया किमि पैठन पाऊँ ॥१६॥
स्त्री
भूले से भूप अनेक खरे रहौ ठाढ़े रहौ तिमि चक्कवै भारी ।
देव गंधर्व और किन्नर जच्छ-से रोके जे लोकन के अधिकारी ॥
४२ / सुदामा-चरित
अंतरजामी वे आपुहि जानिहैं, मानौ यहै सिख लेहु हमारी ।
द्वारिकानाथ के द्वार गए सबतें पहिले सुधि लैहैं तुम्हारी ॥१७॥
सुदामा
दीनदयाल को ऐसोई द्वार है, दीनन की सुधि लेति सदाई ।
द्रौपदी तें, गज तें, प्रह्लाद तें, जानि परा न विलंब लगाई ॥
याहि तें भावत मो-मन दीनता, जौ निबहैं निबही जस आई ।
जौ ब्रजराज सों प्रीति नहीं, केहि काज सुरेसहु की ठकुराई ॥१८॥
(कवित्त)
स्त्री
फाटे पट टूटी छानि खायौ भीख माँगि आनि,
बिना जग्य बिमुख रहत देव-पित्रई ।
वै हैं दीनबन्धु दुखी देखिकै दयालु ह्वैहैं,
दैहैं कछु भलो, सो हौं जानत अगत्रई ॥
द्वारिका लौं जात पिय ! केतौ अलसात तुम,
काहे कौ लजात, भई कौन-सी विचित्रई ।
जौ पै सब जन्म या दरिद्र ही सतायौ तौ पे,
कौन काज आइहैं कृपानिधि की मित्रई ॥१६॥
सुदामा
तैं तो कही नीकी सुनि बात हित-ही की,
यही रीति मित्रई की नित प्रीति सरसाइए ।
मित्र के तें चित्त चाहिए परस्पर,
मित्र के जो जेंइए तो आपहू जेंवाइए ॥
वै हैं महाराज जोरि बैठत समाज भूप,
तहाँ यदि रूप जाइ कहा सकुचाइए ।
सुदामा-चरित / ४३
सुख दुख करि दिन काटे ही बनैंगे, भूलि
बिपति परे पै द्वार मित्र के न जाइए ॥२०॥
स्त्री
विप्र के भगत हरि जगत-बिदित-बंधु,
लेते सब ही की सुधि ऐसे महादानि हैं।
पढ़े एक चटसार कही तुम कैयों बार,
लोचन अपार वै तुम्हें न पहिचानिहैं ?
एक दीनबन्धु, कृपासिन्धु फेरि गुरुबन्धु,
तुम-सम कौन दीन जाकौ जिय जानिहैं ?
नाम लेत चौगुनी, गए तें द्वार सौगुनी सो,
देखत सहस्र गुनी प्रीति प्रभु मानिहैं ॥२१॥
(सवैया)
सुदामा
प्रीति मैं चूक न है उनके, हरि मों मिलिहैं उठि कंठ लगायकै ।
द्वार गये कछु दैहैं पै दैहैं वे, द्वारिकानाथजू हैं सब लायकै ॥
या विधि बीति गई पन द्वै, अब तौ पहुँचौ बिरधापन आयकै ।
जीवन केतौ है जाके लिए, हरि सों अब होहुँ कनावड़ौ जायकै ॥२२॥
स्त्री
हूजे कनावड़ौ बार हजार-लौं, जौ हितू दीनदयाल-सों पाइए ।
तीनहुँ लोक के ठाकुर है, तिनके दरबार न जात लजाइए ॥
मेरी कही जिय में धरिके पिय, भूलि न और प्रसंग चलाइए ।
और के द्वार सा द्वार कहा पिय ! द्वारिकानाथ के द्वार सिधाइए ॥२३॥
४४ / सुदामा-चरित
(सवैया)
सुदामा
द्वारिका जाहु जू द्वारिका जाहु जू, आठहु जाम यहै जक तेरे ।
जौ न कहौ करिए तो बड़ो दुख, जैए कहाँ अपनी गति हेरे ॥
द्वार खरे प्रभु के छरिया तहँ भूपति जान न पावत नेरे ।
पांच सुपारी, तैं देख विचारिकै भेंट को चारि न चाउर मेरे ॥२४॥
(दोहा)
यह सुनिकै तब ब्राह्मनी, गई परोसिनि-पास ।
पाव-सेर चाउर लिए, आई सहित-हुलास ॥२५॥
सिद्धि करी गनपति सुमिरि, वाँधि दुपटिया-खूँट ।
मांगत खात चलै तहाँ, मारग बाली-बूट ॥२६॥
तीन दिवस चलि विप्र के, दूखि उठे जब पाँय ।
एक ठौर सोए कहूँ, घास-प्यार बिछाय ॥२७॥
अंतरजामी आपु हरि, जानि भगत की पीर ।
सोवत लै ठाढ़ो कियो, नदी गोमती-तीर ॥२८॥
प्रात गोमती-दरस तें, अति प्रसन्न भो चित्त ।
बिप्र तहाँ असनान करि, कीन्हों नित्त-निमित्त ॥२९॥
भाल तिलक घसिकै दियौ, गही सुमिरिनी हाथ ।
देखि दिव्य द्वारावती, भयौ अनाथ सनाथ ॥३०॥
(कवित्त)
दीठि चकचौंधि गई देखत सुबर्नमई,
एक तें सरस एक द्वारिका के भौन हैं।
पूछे बिन कोऊ कहूँ काहू सों न करै बात,
देवता-से बैठे सब साधि-साधि मौन हैं ॥
देखत सुदामैं धाय पौरजन गहे पाय,
“कृपा करि कहौ बिप्र कहाँ कीन्ह गौन हैं ?”
सुदामा-चरित / ४५
“धीरज अधीर के, हरन पर पीर के,
बताओ बलबीर के महल यहाँ कौन हैं?” ॥३१॥
(दोहा)
दीन जानि काहू पुरुष कर गहि लीन्हौं आय ।
दीनहिं द्वार खरो कियौ, दीनदयाल के जाय ॥३२॥
द्वारपाल द्विज जानिकै, कीन्हौं दंड-प्रनाम ।
“बिप्र ! कृपा करि भाषिए, सकुल आपनो नाम” ॥३३॥
सुदामा
नाम सुदामा कृस्न हम, पढ़े एकई साथ ।
कुल पाँड़े ब्रजराज सुनि सकल जानिहैं गाथ ॥ ३४ ॥
द्वारपाल चलि तहँ गयौ, जहाँ कृस्न जदराय ।
हाथ जोरि ठाढ़ो भयौ, बोल्यौ सीस नवाय ॥३५॥
(सवैया)
द्वारपाल
सीस पगा न झगा तन पै, प्रभू ! जानै को आहि ! बसै केहि ग्रामा ।
धोती फटी-सी लटी-दुपटी, अरु पाँय उपानह की नहिं सामा ॥
द्वार खरो द्विज दुर्बल एक, रह्यो चकि सों बसुधा अभिरामा ।
पूछत दीनदयाल को धाम, बतावत आपनो नाम सुदामा ॥३६॥
(कवित्त)
बोल्यौ द्वारपालक ‘सुदामा नाम पाँड़े’, सुनि
छाँड़ राज-काज ऐसे जी की गति जानै को ?
द्वारिका के नाथ हाथ जोरि धाय गहे पाँय;
भेंटे लपटाय करि ऐसे दुख-सानै को ?
नैन दोऊ जल भरि पूँछत कुसल हरि,
बिप्र बोल्यौ ‘बिपदा मैं मोहि पहिचानै को ?
४६ / सुदामा-चरित
जैसी तुम करी तैसी करै को कृपा के सिंधु !
ऐसी प्रीति दीनबंधु ! दीनन सों मानै को ?' ॥३७॥
(सवैया)
लोचन पूरि रहे जल सों, प्रभु दूरि तें देखत ही दुख मेट्यौ ।
सोच भयो सुरनायक के, कलपद्रुम के हिय मांझ खखेट्यौ ॥
कंप कुबेर-हिये सरसो, परसो पग जात सुमेरु समेट्यौ ।
रंक तें राउ भयौ तबहीं, भरि अंक रमापति भेंट्यौ ॥३८॥
(दोहा)
भेंटि भली बिधि विप्र सों, कर गहि त्रिभुवनराय ।
अंतःपुर को लै गये, यहाँ न दूजौ जाय ॥३६॥
मनिमंडित चौकी कनक, ता ऊपर बैठाय ।
पानी धर्यो परात मैं, पग धोवन कौं लाय ॥४०॥
राज-रमनि सोरह-सहस, सह-सेवकन स-मीत ।
आठो पटरानी भई, चकित चितैं यह प्रीति ॥४१॥
जिनके चरनन को सलिल, हरत जगत-संताप ।
पाँय सुदामा विप्र के, धोवत ते हरि आप ॥४२॥
(सवैया)
ऐसे बेहाल बेवाइन सों, पग कंटक-जाल लगे पुनि जोए ।
'हाय ? महादुख पायौ सखा, तुम आए इतै न कितै दिन खोए ।'
देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिकै करुनानिधि रोए ॥
पानि परात को हाथ छुयौ नहिं, नैनन के जल सों पग धोए ॥४३॥
(दोहा)
धोय पाँय पट-पीत सों, पोंछत हैं जदुराय ।
सतिभामा सों यौं कहा, 'करौ रसोई जाय' ॥
सुदामा-चरित / ४७
तंदुल तिय दीन्हें हते, आगे धरियौ जाय।
देखि राज-संपति विभव, दै नहिं सकत लजाय ॥४५॥
अंतरजामी आप हरि, जानि भगत की रीति।
सुहृद सुदामा विप्र सों, प्रगत जनाई प्रीति ॥४६॥
श्रीकृष्ण
कुछ भाभी हमकौ दियौ, सो तुम काहे न देत।
चाँपि पोटरी काँख मैं, रहे कहौ केहि हेत ॥४७॥
(सवैया)
आगे चना गुरु-मात दए ते लए तुम चाबि हमें नहिं दीने।
स्याम कह्यौ मुसुकाय सुदामा सों, 'चोरी की बानि मैं हौ जू प्रवीने॥
पोटरी काँख में चाँपि रहे तुम, खोलत नाहिं सुधा-रस-भीने।
पाछिली बानि अजौ न तजी तुम, तैसेई भाभी के तंदुल कीने ॥४८॥
(दोहा)
खोलत सकुचत गांठरी, चितवत हरि की ओर।
जीरन पट फटि छुटि परे, विखरि गये तेहि ठौर ॥४६॥
एक मुठी हरि भरि लई, लीन्हीं मुख मैं डारि।
चबत चबाउ करन लगे, चतुरानन त्रिपुरारि ॥५०॥
(सवैया)
काँपि उठी कमला मन सोचत, 'मो सों कहा हरि को मन औंको ?
रिद्धि कँरी सब सिद्धि कँपीं, नव सिद्धि कँपीं 'बम्हना यह धौं को ?
सोच भयौ सुरनायक कौ जब, दूसरि बार लियौ भरि झौँको।
मेरु डर्यो 'बकसैं जनि मोहिं' कुबेर चबावत चाउर चौंको ॥५१॥
(कवित्त)
हूल हियरा में, सब-कानन परी है टेर,
'भेंटत सुदामैं स्याम चाबि न अघात ही।'
४८ / सुदामा-चरित
कहै नरोत्तम; रिद्धि सिद्धिन मैं सोर भयौ,
ठाढ़ी थरहरैं ओर सोचै कमला तहीं ॥
नाक लोक, नाग लोक, ओक-ओक थोत-थोक,
ठाढ़े थरहरैं मुख सूखे सब गातहीं ।
हालो परो थोकन मैं, लालो परो लोकन मैं,
चालो परो चक्रन मैं चाउर चबातही ! ॥५२॥
(सवैया)
भौन भरो पकवान मिठाइन, लोग कहैं निधि हैं सुषमा के ।
सांझ सबेरे पिता अभिलाषत, दाख न चाखत सिंधु छमा के ।
बाँभन एक कोउ दुखिया सेर पावक चाउर लायौ समा के ॥
प्रीति की रीति कहा कहिए, तेहि बैठि चबात हैं कंत रमा के ॥५३॥
(दोहा)
मुठी तीसरी भरत ही, रुकुमिनि पकरी बाँह ।
'ऐसो तुम्हें कहा भई, संपति की अनचाह' ॥५४॥
कही रुकुमिनी कान में, 'यह धौं कौन मिलाप ।
करत सुदामा आप सों, होत सुदामा आप' ॥५५॥
(दोहा)
यह कौतुक लखिकै सभय, कही सेवकिनि आय ।
भई रसोई सिद्ध प्रभु ! 'भोजन करिए जाय' ॥५६॥
बिप्र-सहित असनान करि, धोती पहिरि बनाय ।
संध्या करि मध्याह्न की, चौका बैठे जाय ॥५७॥
(कवित्त)
रूपे के रुचिकर-थार पायक सहित सिता—
जीती जिन सोभा है सरदहू के चन्द की ।
सुदामा-चरित / ४६
दूसरे पहिति भात सोंधो सुरभी को घृत,
फूले-फूले फुलका प्रफुल्ल दुति मंद की ॥
पापर मुँगौरी बरा व्यंजन अनेक प्रीति—
देवता बिलोकि रहे देवकि के नन्द की ।
या विधि सुदामाजू कों आछे कै जेंवाय प्रभु,
पाछे तें पछ्यावरि परोसी आनि कंद की ॥५८॥
(दोहा)
सात दिवस यहि विधि रहे, दिन-दिन आदर-भाव।
चित चल्यौ घर चलन कौं, ताकर सुनौ बनाव ॥५६॥
(सवैया)
दाहिने बेद पढ़ै चतुरानन, सामुहे ध्यान महेस धर्यौ है ।
बाएँ दुऔ कर जोरि लिए, सब देवन साथ सुरेस खर्यौ है ॥
एतेइ बीच अनेक लिए धन, पायन आय कुबेर पर्यौ है ।
देखि बिभौ अपनो सपनो, वपुरो वह बांभन चौंकि पर्यौ है ॥६०॥
(दोहा)
देनो हुतौ सो दै चुके, बिप्र न जानी गाथ ।
चलती बेर गोपालजू, कछू न दीन्हों हाथ ॥६१॥
सुदामा
वह पुलकनि वह उठि मिलनि, वह आदर की भाँति ।
यह पठवनि गोपाल की, कछू न जानी जाति ॥६२॥
घर-घर कर ओड़त फिरे, तनक दही के काज ।
कहा भयो जौ अब भयौ, हरि को राज-समाज ॥६३॥
हौं आवत नाहीं हुतौ, वाही पठ्यौ ठेलि ।
कहिहौं धन सों जाइकै, अब धन धरौ सकेलि ॥६४॥
५० / सुदामा-चरित
बालपन के मित्र हैं, कहा देउं मैं साप ।
जैसो हरि हमको दिया, तैसो पइहैं आप ॥६५॥
नौ गुनधारि छगुन सों, तिगुना-मध्ये जाय ।
लायौँ चापल चौगुनी, आठौ गुननि गँवाय ॥६६॥
और कहा कहिए जहाँ, कंचन ही के धाम ।
निपट कठिन हरि को हियो, मोको दियो न दाम ॥६७॥
बहु-भंडार रतन-भरे, कौन हरै अब रोष ।
लाग आपने भाग को, काको दीजै दोष ॥६८॥
इमि सोचत-सोचत झखत, आया निज पुर-तीर ।
दीठि परी इकबार ही, हय गयंद की भीर ॥६६॥
हरि-दरसन तें दूरि दुख, भयौ, गयो निज देस ।
गौतम-रिषि को नाउँ लै, कीन्हो नगर प्रवेश ॥७०॥
(सवैया)
वैसई राज-समाज बने, गज-वाजि घने मन संभ्रम छायौ ।
वैसई कंचन के सब धाम हैं, द्वारिकै माहिं मनौँ फिरि आयौ ॥
भौन विलोकिबे को मन लोचत, सोचत ही सब गाँव मंझायो ।
पूछत पांडे फिरे सब सों, पर झोपरी को कहुँ खोज न पायौ ॥७१॥
सुदामा
(कुण्डलिया)
'देव नगर कै अच्छपुर, हौं भटको कित आय ?
नाम कहा यहि नगर को, सो न कहौ समुझाय ॥
सो न कहौ समुझाय, नगर-वासी तुम कैसे ?
पथिक जहाँ संभ्रमहि, तहाँ के लोग अनैसे ॥
नगर०—'लोग अनैसे नाहिं, लखौ द्विज-देव नगर कै।
कृपा करी हरि-देव, दियो है देव नगर कै ॥७२॥
२. द्वितीय भाग: द्वारका-वैभव दर्शन, श्रीकृष्ण-मिलन एवं चरण-प्रक्षालन
सुदामा-चरित / ५१
(कवित्त)
सुन्दर महल मनि-मानिक जटित अति,
सुबरन सूरज-प्रकाश मानौं दै रह्यौ।
देखत सुदामाजू को नगर के लोग धाये,
भेंटे अकुलाय जोई सोई पाँव छ्वै रह्यौ॥
बाँभनी के भूषन विविध विधि देखि कह्यौ,
जैहौं हौं निकासौ सो तमासौ जग ज्वै रह्यौ।
ऐसी दसा फिरि जब द्वारिका-दरस पायौ,
द्वारिका तें सरस सुदामा पुर ह्वै रह्यौ॥७३॥
(दोहा)
कनक-दंड कर मैं लिए, द्वारपाल है द्वार।
जाय दिखायौ सबनि लै, 'या हैं महल तुम्हार'॥७४॥
कही सुदामा 'हँसत हौ, ह्वै करि परम प्रबीन।
कुटी दिखावहु मोहि वह, जहाँ बाँभनी दीन'॥७५॥
द्वारपाल सों तिन कही, 'कहि पठवहु यह गाथ।
आए बिप्र महाबली, देख होहु सनाथ'॥७६॥
सुनत चली आनन्दयुत, सब सखियन लै संग।
नूपुर किंकिनि, दुंदभी, मनहुँ काम चतुरंग॥७७॥
कही बांभनी आयकै, यहै कंत निज-गेह।
श्रीजदुपति तिहुँलोक मैं, कीन्हों प्रगट सनेह'॥७८॥
सुदामा
हमें कंत तुम जनि कहौ, बोलो वचन सँभारि।
इहैं कुटी मेरी हती, दीन बापुरी नारि॥७९॥
स्त्री
मैं तो नारि तिहारियै, सुधि संभारिए कंत।
प्रभुता सुन्दरता दई, अद्भुत श्री भगवंत॥८०॥
५२ / सुदामा-चरित
सुदामा
(कवित्त)
टूटी-सी मड़ैया मेरी परी हुती याही ठौर,
तामैं परो दुःख काटौं कहाँ हेम धाम-री ।
जेवर-जराऊ तुम साजे प्रति अंग-अंग,
सखी सोहैं संग वह छूछी हुती छाम री ॥
तुम तौ पटंबर री ! ओढ़े हौ किनारीदार,
सारी-जरतारी, वह ओढ़े कारी कामरी ॥
मेरी वा पड़ाइन तिहारी अनुहार ही पै,
विपद-सताई वह पाई कहाँ पामरी ? ॥८१॥
ठाड़ी ह्वै पँडाइन कहत मंजु-भायन सों,
'प्यारे परौं पायन तिहारोई जु घरु है।
आए चलि हरों श्रम कीन्हों तुम भूरि दुख,
दारिद गमायो यौं हँसत गह्यो करु है ॥
रिद्धि-सिद्धि दासी करि दीन्हीं अविनासी कृस्न,
पूरन-प्रकाशी, कामधेनु कोटि बरु है !
चलौ पति भूलौ मति तुम्हैं दीन्ही जदुपति,
संपति सो लीजिए समेत सुरतरु हैं' ॥८२॥
(दोहा)
समुझायो निज कंत कों, मुदित गई लै गेह ।
अन्हवायो तुरतहिं उबटि, सुचि सुगन्ध सों देह ॥८३॥
पूज्यो अधिक सनेह सों, सिंहासन बैठाय ।
सुचि सुगन्ध अंबर रचे, बर भूषण पहिराय ॥ ४॥
सीतल जल अचवायकै पानदान धरि पान।
धर्यो आय आगे तुरत, छवि रबि-प्रभा समान ॥-५॥
सुदामा-चरित / ५३
करहिं चौर चहुँ ओर तें, रंभादिक सब नारि।
पतिब्रता अति प्रेम सों, ठाढ़ी करै बयारि ॥८६॥
स्वेत-छत्र की छाँह मैं, राजत सक्र-समान।
बाहन गज रथ तुरँग बर, अरु अनेक सुभजान ॥८७॥
कामधेनु सुरतरु सहित, दीन्हीं श्री बलबीर।
जानि परी गुरुबंधु हरि, हरि लीन्हीं सब पीर ॥८८॥
बिबिध भाँति सेवा करी, सुधा पियायो बाम।
अति बिनीत मृदु बचन कहि, 'सब पूरो मन काम' ॥८६॥
लै आयसु तिय न्हाइ कर सुचि सुगन्ध सब लाइ।
पूजी गौरि सोहाग-हित प्रीति सहित सुख पाइ ॥ '०॥
षटरस चारि प्रकार के, भोजन रचे बनाय।
कंचन-थार मँगायकै, ता मैं धर्यो रचाय ॥६१॥
चंदन चौकी डारिकै, दासी परम सुजानि।
रतन जटिल भाजन-कनक, भरि गंगाजल आनि ॥६२॥
कूजा कंचन रतनयुत, सुचि सुगन्ध जल-पूरि।
रच्छाधान समेत सो, जल-प्रकाश भर-पूरि ॥६३॥
रतन-जटित पीढ़ा-कनक, धर्यो जु बैठन काम।
मरकत-मनि चौकी धरी, कछुक दूरि छवि-धाम ॥६४॥
चौकी लई मँगायकै, पग धोवन को पाथ।
मनि-पादुका बिचित्र अति, धरि सलिल के साथ ॥६५॥
'चलिए भोजन करन कों,' कह दासी मृदु भाखि'।
उठे 'क्रुस्न' सानंद कहि, 'धन्य धन्य हरि साखि' ॥६६॥
बसन उतारे जायकै, धोवत चरन-सरोज।
चौकी पै छबि देत यौं, जनु तनु धरे मनोज ॥६७॥
पहिरि पादुका बिप्र जब, पीढ़ा बैठे जाय।
रति तें अतिछबि आगरी, पति सों हँसि मुसुकाय ॥६८॥
५४ / सुदामा-चरित
विविध भाँति भोजन धरे, व्यंजन चारि-प्रकार।
जोरि पछिओरी सकल, प्रथम कहे नहिं पार ॥६६॥
‘हरिहिं समर्पौ कंत अब’ कहा मंद हँसि बाम।
करि घंटा को नाद त्यों, हरि समर्पि लिय नाम ॥१००॥
अगिन जिमाय विधान सों, वैस्व देव करि नेम।
बलि काढ़ी जेंवन लगे करति पवन तिय प्रेम ॥१०१॥
वार-वार पूछत यहै, ‘लीजै जो रुचि होय।
कृस्न-कृपा पूरन सबै, अबै परोसौं सोय ॥१०२॥
जेइँ चुके अचवन लगे, करन गये विश्राम।
रतन-जटित पालक कनक, देनो सुरेसम दाम ॥१०३॥
ललित बिछौना विरचिकै, पाँयत कसिकै डोरि।
राखे वसन सुसेवकनि, रुचिर अतर सों बोरि ॥१०४॥
पानदान नेरे धर्यो, भरि बीरी छवि-धाम।
चरन धोय पौढ़न लगे, करन हेत विश्राम ॥१०५॥
कोउ चँवर कोउ वीजना, कोउ सेवत पद चारु।
अति विचित्र भूषन सजे, गजमोतिन के हारु ॥१०६॥
करि सिंगार पिय पै गई, पान खाति मुसकाति।
‘कहौ कथा सब आदि तें, किमि दीन्ही यह भाँति ॥१०७॥
कही कथा सब आदि तें, राह चले की पीर।
सोवत जिमि ठाढ़े किये, नदी गोमती-तीर ॥१०८॥
गए द्वार जिहिं भाँति सों, सो सब करी बखान।
‘कहि न जाय मुख लाख सों, कृस्न मिले ज्यों आन ॥१०३॥
कर गहि भीतर लै गये, जहाँ सकल रनिवास।
पग धोवन को आप ही, बैठे रमा निवास ॥११०॥
देखि चरन मेरे चल्यो, प्रभु नयनन तें नीर।
ताहीं सों धोये चरन, देखि चकित नर-नारि’ ॥१११॥
सुदामा-चरित / ५५
बहुरि कही श्रीकृस्न जिमि, तंदुल लीन्हें आप ।
भेंटे हृदय लगायकै, मेटे भ्रम संताप ॥११२॥
बहुरि कही जेवनार सब, जिमि कीन्हीं बहु भाँति ।
बरनि कहाँ लगि हों कहौं, सब व्यंजन की पांति ॥११३॥
दिन प्रति अधिक सनेह सों, सपन दिखायो मोहि ।
सो देख्यो परतच्छ ही, सपन न निसफल होहिं ॥११४॥
बरनि कथा यहि विधि सबै, कह्यो आपनो मोह ।
कृस्न कृपानिधि भगत-हित, चिदानंद संदोह ॥११५॥
(कवित्त)
साजे सब साजबाज बाजि गज राजत हैं,
विविध रुचिर रथ पालकी बहल हैं ।
रतन-जटित शुभ-सिंहासन बैठिबे को,
चौक प्रति कामधनु कल्पद्रुम लहलहैं ॥
देखि-देखि भूषन वसन दासी दासन के,
सुख पाकसासन के लागत सहल हैं ।
संपति सुदामाजू को जहाँ लौं दइ है प्रभु,
कहाँ लौं गनाऊँ जहाँ कंचन-महल हैं ॥११६॥
बाजिशाला गजसाला दीन्हें गजराज खरे,
ब्रजराज महाराज राजन-समान के ।
बानक बिबिध बने मंदिर-कनक सोहैं,
मनि जरे मन मोहैं सब देवतान के ।
हीरा, लाल ललित झरोखन मैं झलकत,
झिमझिम झूमक झूलैं हैं मुकतान के ।
जानी नहिं बिपति सुदामाजू कीं कहाँ गई,
देखिए विधान जदुपतिजू के दान के ॥११७॥
५६ / सुदामा-चरित
सुदामा
'कहूँ सपनेहूँ सुबरन के महल होते,
पौरि मनि-मंडप कलस कब धरते ?
रतन जटित बर सिंहसन बैठिवे कौं,
खरे ह्वै खवास मो पै चौंर कब ढरते ?
देखि राज-सामा निज बामा सों सुदामा कहैं
कब ये भंडार मेरे रतनन भरते ?
जो पै पतिब्रता तू न देति उपदेश तो पै,
एती कृपा मो पै द्वारिकेस कब करते ? ॥११८॥
(दोहा)
उठे पहिरि अंबर रुचिर, सिहासन पर जाय ।
बैठे प्रभुता देखिकै, सुरपति रह्यो लजाय ॥११९॥
(सवैया)
कै वह टूटी-सी छानी हती, कहूँ कंचन के सब धाम सुहावत ।
कै पग मैं पनही न हती, कहँ लैं गजराजहु ठाढ़े महावत ॥
भूमि कठोर पै रात कटे, कहँ कोमल सेज पै नींद न आवत ।
कै जुरतो नहीं कोदो सवाँ, प्रभु के परताप तें दाख न भावत ॥१२०॥
(दोहा)
धन्य धन्य जदुबंस-मनि, दीनन पै अनुकूल ।
धन्य सुदामा सहित तिय, कहि बरसहिं सुर फूल ॥१२१॥