सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / ४३
सुख दुख करि दिन काटे ही बनैंगे, भूलि
बिपति परे पै द्वार मित्र के न जाइए ॥२०॥
स्त्री
विप्र के भगत हरि जगत-बिदित-बंधु,
लेते सब ही की सुधि ऐसे महादानि हैं।
पढ़े एक चटसार कही तुम कैयों बार,
लोचन अपार वै तुम्हें न पहिचानिहैं ?
एक दीनबन्धु, कृपासिन्धु फेरि गुरुबन्धु,
तुम-सम कौन दीन जाकौ जिय जानिहैं ?
नाम लेत चौगुनी, गए तें द्वार सौगुनी सो,
देखत सहस्र गुनी प्रीति प्रभु मानिहैं ॥२१॥
(सवैया)
सुदामा
प्रीति मैं चूक न है उनके, हरि मों मिलिहैं उठि कंठ लगायकै ।
द्वार गये कछु दैहैं पै दैहैं वे, द्वारिकानाथजू हैं सब लायकै ॥
या विधि बीति गई पन द्वै, अब तौ पहुँचौ बिरधापन आयकै ।
जीवन केतौ है जाके लिए, हरि सों अब होहुँ कनावड़ौ जायकै ॥२२॥
स्त्री
हूजे कनावड़ौ बार हजार-लौं, जौ हितू दीनदयाल-सों पाइए ।
तीनहुँ लोक के ठाकुर है, तिनके दरबार न जात लजाइए ॥
मेरी कही जिय में धरिके पिय, भूलि न और प्रसंग चलाइए ।
और के द्वार सा द्वार कहा पिय ! द्वारिकानाथ के द्वार सिधाइए ॥२३॥