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सर्वकोश
सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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५२ / सुदामा-चरित
सुदामा
(कवित्त)
टूटी-सी मड़ैया मेरी परी हुती याही ठौर,
तामैं परो दुःख काटौं कहाँ हेम धाम-री ।
जेवर-जराऊ तुम साजे प्रति अंग-अंग,
सखी सोहैं संग वह छूछी हुती छाम री ॥
तुम तौ पटंबर री ! ओढ़े हौ किनारीदार,
सारी-जरतारी, वह ओढ़े कारी कामरी ॥
मेरी वा पड़ाइन तिहारी अनुहार ही पै,
विपद-सताई वह पाई कहाँ पामरी ? ॥८१॥
ठाड़ी ह्वै पँडाइन कहत मंजु-भायन सों,
'प्यारे परौं पायन तिहारोई जु घरु है।
आए चलि हरों श्रम कीन्हों तुम भूरि दुख,
दारिद गमायो यौं हँसत गह्यो करु है ॥
रिद्धि-सिद्धि दासी करि दीन्हीं अविनासी कृस्न,
पूरन-प्रकाशी, कामधेनु कोटि बरु है !
चलौ पति भूलौ मति तुम्हैं दीन्ही जदुपति,
संपति सो लीजिए समेत सुरतरु हैं' ॥८२॥
(दोहा)
समुझायो निज कंत कों, मुदित गई लै गेह ।
अन्हवायो तुरतहिं उबटि, सुचि सुगन्ध सों देह ॥८३॥
पूज्यो अधिक सनेह सों, सिंहासन बैठाय ।
सुचि सुगन्ध अंबर रचे, बर भूषण पहिराय ॥ ४॥
सीतल जल अचवायकै पानदान धरि पान।
धर्यो आय आगे तुरत, छवि रबि-प्रभा समान ॥-५॥