सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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(सवैया)
सुदामा
द्वारिका जाहु जू द्वारिका जाहु जू, आठहु जाम यहै जक तेरे ।
जौ न कहौ करिए तो बड़ो दुख, जैए कहाँ अपनी गति हेरे ॥
द्वार खरे प्रभु के छरिया तहँ भूपति जान न पावत नेरे ।
पांच सुपारी, तैं देख विचारिकै भेंट को चारि न चाउर मेरे ॥२४॥
(दोहा)
यह सुनिकै तब ब्राह्मनी, गई परोसिनि-पास ।
पाव-सेर चाउर लिए, आई सहित-हुलास ॥२५॥
सिद्धि करी गनपति सुमिरि, वाँधि दुपटिया-खूँट ।
मांगत खात चलै तहाँ, मारग बाली-बूट ॥२६॥
तीन दिवस चलि विप्र के, दूखि उठे जब पाँय ।
एक ठौर सोए कहूँ, घास-प्यार बिछाय ॥२७॥
अंतरजामी आपु हरि, जानि भगत की पीर ।
सोवत लै ठाढ़ो कियो, नदी गोमती-तीर ॥२८॥
प्रात गोमती-दरस तें, अति प्रसन्न भो चित्त ।
बिप्र तहाँ असनान करि, कीन्हों नित्त-निमित्त ॥२९॥
भाल तिलक घसिकै दियौ, गही सुमिरिनी हाथ ।
देखि दिव्य द्वारावती, भयौ अनाथ सनाथ ॥३०॥
(कवित्त)
दीठि चकचौंधि गई देखत सुबर्नमई,
एक तें सरस एक द्वारिका के भौन हैं।
पूछे बिन कोऊ कहूँ काहू सों न करै बात,
देवता-से बैठे सब साधि-साधि मौन हैं ॥
देखत सुदामैं धाय पौरजन गहे पाय,
“कृपा करि कहौ बिप्र कहाँ कीन्ह गौन हैं ?”