सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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सुदामा
'कहूँ सपनेहूँ सुबरन के महल होते,
पौरि मनि-मंडप कलस कब धरते ?
रतन जटित बर सिंहसन बैठिवे कौं,
खरे ह्वै खवास मो पै चौंर कब ढरते ?
देखि राज-सामा निज बामा सों सुदामा कहैं
कब ये भंडार मेरे रतनन भरते ?
जो पै पतिब्रता तू न देति उपदेश तो पै,
एती कृपा मो पै द्वारिकेस कब करते ? ॥११८॥
(दोहा)
उठे पहिरि अंबर रुचिर, सिहासन पर जाय ।
बैठे प्रभुता देखिकै, सुरपति रह्यो लजाय ॥११९॥
(सवैया)
कै वह टूटी-सी छानी हती, कहूँ कंचन के सब धाम सुहावत ।
कै पग मैं पनही न हती, कहँ लैं गजराजहु ठाढ़े महावत ॥
भूमि कठोर पै रात कटे, कहँ कोमल सेज पै नींद न आवत ।
कै जुरतो नहीं कोदो सवाँ, प्रभु के परताप तें दाख न भावत ॥१२०॥
(दोहा)
धन्य धन्य जदुबंस-मनि, दीनन पै अनुकूल ।
धन्य सुदामा सहित तिय, कहि बरसहिं सुर फूल ॥१२१॥