सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ / सुदामा-चरित
जैसी तुम करी तैसी करै को कृपा के सिंधु !
ऐसी प्रीति दीनबंधु ! दीनन सों मानै को ?' ॥३७॥
(सवैया)
लोचन पूरि रहे जल सों, प्रभु दूरि तें देखत ही दुख मेट्यौ ।
सोच भयो सुरनायक के, कलपद्रुम के हिय मांझ खखेट्यौ ॥
कंप कुबेर-हिये सरसो, परसो पग जात सुमेरु समेट्यौ ।
रंक तें राउ भयौ तबहीं, भरि अंक रमापति भेंट्यौ ॥३८॥
(दोहा)
भेंटि भली बिधि विप्र सों, कर गहि त्रिभुवनराय ।
अंतःपुर को लै गये, यहाँ न दूजौ जाय ॥३६॥
मनिमंडित चौकी कनक, ता ऊपर बैठाय ।
पानी धर्यो परात मैं, पग धोवन कौं लाय ॥४०॥
राज-रमनि सोरह-सहस, सह-सेवकन स-मीत ।
आठो पटरानी भई, चकित चितैं यह प्रीति ॥४१॥
जिनके चरनन को सलिल, हरत जगत-संताप ।
पाँय सुदामा विप्र के, धोवत ते हरि आप ॥४२॥
(सवैया)
ऐसे बेहाल बेवाइन सों, पग कंटक-जाल लगे पुनि जोए ।
'हाय ? महादुख पायौ सखा, तुम आए इतै न कितै दिन खोए ।'
देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिकै करुनानिधि रोए ॥
पानि परात को हाथ छुयौ नहिं, नैनन के जल सों पग धोए ॥४३॥
(दोहा)
धोय पाँय पट-पीत सों, पोंछत हैं जदुराय ।
सतिभामा सों यौं कहा, 'करौ रसोई जाय' ॥