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सर्वकोश
सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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पृष्ठ 42

सुदामा-चरित / ४७
तंदुल तिय दीन्हें हते, आगे धरियौ जाय।
देखि राज-संपति विभव, दै नहिं सकत लजाय ॥४५॥
अंतरजामी आप हरि, जानि भगत की रीति।
सुहृद सुदामा विप्र सों, प्रगत जनाई प्रीति ॥४६॥
श्रीकृष्ण
कुछ भाभी हमकौ दियौ, सो तुम काहे न देत।
चाँपि पोटरी काँख मैं, रहे कहौ केहि हेत ॥४७॥
(सवैया)
आगे चना गुरु-मात दए ते लए तुम चाबि हमें नहिं दीने।
स्याम कह्यौ मुसुकाय सुदामा सों, 'चोरी की बानि मैं हौ जू प्रवीने॥
पोटरी काँख में चाँपि रहे तुम, खोलत नाहिं सुधा-रस-भीने।
पाछिली बानि अजौ न तजी तुम, तैसेई भाभी के तंदुल कीने ॥४८॥
(दोहा)
खोलत सकुचत गांठरी, चितवत हरि की ओर।
जीरन पट फटि छुटि परे, विखरि गये तेहि ठौर ॥४६॥
एक मुठी हरि भरि लई, लीन्हीं मुख मैं डारि।
चबत चबाउ करन लगे, चतुरानन त्रिपुरारि ॥५०॥
(सवैया)
काँपि उठी कमला मन सोचत, 'मो सों कहा हरि को मन औंको ?
रिद्धि कँरी सब सिद्धि कँपीं, नव सिद्धि कँपीं 'बम्हना यह धौं को ?
सोच भयौ सुरनायक कौ जब, दूसरि बार लियौ भरि झौँको।
मेरु डर्यो 'बकसैं जनि मोहिं' कुबेर चबावत चाउर चौंको ॥५१॥
(कवित्त)
हूल हियरा में, सब-कानन परी है टेर,
'भेंटत सुदामैं स्याम चाबि न अघात ही।'