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सर्वकोश
सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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पृष्ठ 45

५० / सुदामा-चरित
बालपन के मित्र हैं, कहा देउं मैं साप ।
जैसो हरि हमको दिया, तैसो पइहैं आप ॥६५॥
नौ गुनधारि छगुन सों, तिगुना-मध्ये जाय ।
लायौँ चापल चौगुनी, आठौ गुननि गँवाय ॥६६॥
और कहा कहिए जहाँ, कंचन ही के धाम ।
निपट कठिन हरि को हियो, मोको दियो न दाम ॥६७॥
बहु-भंडार रतन-भरे, कौन हरै अब रोष ।
लाग आपने भाग को, काको दीजै दोष ॥६८॥
इमि सोचत-सोचत झखत, आया निज पुर-तीर ।
दीठि परी इकबार ही, हय गयंद की भीर ॥६६॥
हरि-दरसन तें दूरि दुख, भयौ, गयो निज देस ।
गौतम-रिषि को नाउँ लै, कीन्हो नगर प्रवेश ॥७०॥
(सवैया)
वैसई राज-समाज बने, गज-वाजि घने मन संभ्रम छायौ ।
वैसई कंचन के सब धाम हैं, द्वारिकै माहिं मनौँ फिरि आयौ ॥
भौन विलोकिबे को मन लोचत, सोचत ही सब गाँव मंझायो ।
पूछत पांडे फिरे सब सों, पर झोपरी को कहुँ खोज न पायौ ॥७१॥
सुदामा
(कुण्डलिया)
'देव नगर कै अच्छपुर, हौं भटको कित आय ?
नाम कहा यहि नगर को, सो न कहौ समुझाय ॥
सो न कहौ समुझाय, नगर-वासी तुम कैसे ?
पथिक जहाँ संभ्रमहि, तहाँ के लोग अनैसे ॥
नगर०—'लोग अनैसे नाहिं, लखौ द्विज-देव नगर कै।
कृपा करी हरि-देव, दियो है देव नगर कै ॥७२॥