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सर्वकोश
सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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पृष्ठ 36

सुदामा-चरित / ४१
विप्रन को प्रन है जु यही सुख संपति सों कछु काज नहीं।
कै पढ़िबो, कै तपोधन है, कन माँगत बाँभनै लाज नहीं ॥१२॥
स्त्री
कोदो सवाँ जुरतो भरि पेट, न चाहति हौं दधि दूध मिठौती ॥
सीत बितीत गयौ सिसियातहिं, हौं हठती पै तुम्हें न हठौती ।
जौ जनती न हितू हरि सों तुम्हें काहे का द्वारिका पेलि पठौती ।
या घर तें न गयो कबहुँ पिय ! टूटौ तवा अरु फूटी कठौती ॥१३॥
सुदामा
छाँड़ि सबै जक तोहि लगी बक, आठहुँ जाम यहै जक ठानी ।
जातहिं दैहैं लदाय लड़ा भरि लैहौं लदाय यहै जिय जानी ॥
पावैं कहाँ तें अटारी अटा, जिनके विधि दीन्हीं है टूटी-सी छानी ।
जो पै दरिद्र लिखो है ललाट तौ, काहू-पै मेटि न जात अजानी ॥१४॥
स्त्री
पूरन पैज करी प्रह्लाद की, खंभ सों बाँध्यो पिता जिहि बेरे ।
द्रौपदी ध्यान धर्यौ जबहीं, तबहीं पट-कोट लगे लगे चहुँ फेरे ।
ग्राह तें छूटि गयंद गयौ पिय ! है हरि को निहचै जिय मेरे ।
ऐसे दरिद्र हजार हरैं वै, कृपानिधि लोचन-कोर के हेरे ॥१५॥
सुदामा
चक्कवै चौंकि रहे चकि-से, तहाँ भूले-से भूप कितेक गनाऊँ ।
देव गंधर्व और किन्नर जच्छ-से, साँझ लौं देखे खरे जिहि ठाऊँ ॥
तैं दरबार बिलोक्यौ नहीं अब तोहि कहा कहिकै समुझाऊँ ।
रोकिए लोकन के मुखिया, तहँ हौं दुखिया किमि पैठन पाऊँ ॥१६॥
स्त्री
भूले से भूप अनेक खरे रहौ ठाढ़े रहौ तिमि चक्कवै भारी ।
देव गंधर्व और किन्नर जच्छ-से रोके जे लोकन के अधिकारी ॥