सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 108 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 37

४२ / सुदामा-चरित
अंतरजामी वे आपुहि जानिहैं, मानौ यहै सिख लेहु हमारी ।
द्वारिकानाथ के द्वार गए सबतें पहिले सुधि लैहैं तुम्हारी ॥१७॥
सुदामा
दीनदयाल को ऐसोई द्वार है, दीनन की सुधि लेति सदाई ।
द्रौपदी तें, गज तें, प्रह्लाद तें, जानि परा न विलंब लगाई ॥
याहि तें भावत मो-मन दीनता, जौ निबहैं निबही जस आई ।
जौ ब्रजराज सों प्रीति नहीं, केहि काज सुरेसहु की ठकुराई ॥१८॥
(कवित्त)
स्त्री
फाटे पट टूटी छानि खायौ भीख माँगि आनि,
बिना जग्य बिमुख रहत देव-पित्रई ।
वै हैं दीनबन्धु दुखी देखिकै दयालु ह्वैहैं,
दैहैं कछु भलो, सो हौं जानत अगत्रई ॥
द्वारिका लौं जात पिय ! केतौ अलसात तुम,
काहे कौ लजात, भई कौन-सी विचित्रई ।
जौ पै सब जन्म या दरिद्र ही सतायौ तौ पे,
कौन काज आइहैं कृपानिधि की मित्रई ॥१६॥
सुदामा
तैं तो कही नीकी सुनि बात हित-ही की,
यही रीति मित्रई की नित प्रीति सरसाइए ।
मित्र के तें चित्त चाहिए परस्पर,
मित्र के जो जेंइए तो आपहू जेंवाइए ॥
वै हैं महाराज जोरि बैठत समाज भूप,
तहाँ यदि रूप जाइ कहा सकुचाइए ।