सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / ४५
“धीरज अधीर के, हरन पर पीर के,
बताओ बलबीर के महल यहाँ कौन हैं?” ॥३१॥
(दोहा)
दीन जानि काहू पुरुष कर गहि लीन्हौं आय ।
दीनहिं द्वार खरो कियौ, दीनदयाल के जाय ॥३२॥
द्वारपाल द्विज जानिकै, कीन्हौं दंड-प्रनाम ।
“बिप्र ! कृपा करि भाषिए, सकुल आपनो नाम” ॥३३॥
सुदामा
नाम सुदामा कृस्न हम, पढ़े एकई साथ ।
कुल पाँड़े ब्रजराज सुनि सकल जानिहैं गाथ ॥ ३४ ॥
द्वारपाल चलि तहँ गयौ, जहाँ कृस्न जदराय ।
हाथ जोरि ठाढ़ो भयौ, बोल्यौ सीस नवाय ॥३५॥
(सवैया)
द्वारपाल
सीस पगा न झगा तन पै, प्रभू ! जानै को आहि ! बसै केहि ग्रामा ।
धोती फटी-सी लटी-दुपटी, अरु पाँय उपानह की नहिं सामा ॥
द्वार खरो द्विज दुर्बल एक, रह्यो चकि सों बसुधा अभिरामा ।
पूछत दीनदयाल को धाम, बतावत आपनो नाम सुदामा ॥३६॥
(कवित्त)
बोल्यौ द्वारपालक ‘सुदामा नाम पाँड़े’, सुनि
छाँड़ राज-काज ऐसे जी की गति जानै को ?
द्वारिका के नाथ हाथ जोरि धाय गहे पाँय;
भेंटे लपटाय करि ऐसे दुख-सानै को ?
नैन दोऊ जल भरि पूँछत कुसल हरि,
बिप्र बोल्यौ ‘बिपदा मैं मोहि पहिचानै को ?