सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / ५५
बहुरि कही श्रीकृस्न जिमि, तंदुल लीन्हें आप ।
भेंटे हृदय लगायकै, मेटे भ्रम संताप ॥११२॥
बहुरि कही जेवनार सब, जिमि कीन्हीं बहु भाँति ।
बरनि कहाँ लगि हों कहौं, सब व्यंजन की पांति ॥११३॥
दिन प्रति अधिक सनेह सों, सपन दिखायो मोहि ।
सो देख्यो परतच्छ ही, सपन न निसफल होहिं ॥११४॥
बरनि कथा यहि विधि सबै, कह्यो आपनो मोह ।
कृस्न कृपानिधि भगत-हित, चिदानंद संदोह ॥११५॥
(कवित्त)
साजे सब साजबाज बाजि गज राजत हैं,
विविध रुचिर रथ पालकी बहल हैं ।
रतन-जटित शुभ-सिंहासन बैठिबे को,
चौक प्रति कामधनु कल्पद्रुम लहलहैं ॥
देखि-देखि भूषन वसन दासी दासन के,
सुख पाकसासन के लागत सहल हैं ।
संपति सुदामाजू को जहाँ लौं दइ है प्रभु,
कहाँ लौं गनाऊँ जहाँ कंचन-महल हैं ॥११६॥
बाजिशाला गजसाला दीन्हें गजराज खरे,
ब्रजराज महाराज राजन-समान के ।
बानक बिबिध बने मंदिर-कनक सोहैं,
मनि जरे मन मोहैं सब देवतान के ।
हीरा, लाल ललित झरोखन मैं झलकत,
झिमझिम झूमक झूलैं हैं मुकतान के ।
जानी नहिं बिपति सुदामाजू कीं कहाँ गई,
देखिए विधान जदुपतिजू के दान के ॥११७॥