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सर्वकोश
सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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पृष्ठ 35

४० / सुदामा-चरित
स्त्री
(कवित्त)
लोचन-कमल दुख-मोचन तिलक भाल,
स्रवननि कुंडल मुकुट धरे माथ हैं
ओढ़े पीत-बसन गरे मैं बैजयन्ती-माल,
संख चक्र गदा और पदम लिए हाथ हैं ।
कहत नरोत्तम संदीपनि गुरू के पास,
तुम ही कहत हम पढ़े एक साथ हैं ।
द्वारिका के गए हरि दारिद हरेंगे पिय,
द्वारिका के नाथ वै अनाथन के नाथ हैं ॥६॥
(सवैया)
सुदामा
सिच्छक हौं सिगरे जग को तिय, ताको कहा, अब देति है सिच्छा ।
जे तप कै परलोक सुधारत, संपति की तिन नहिं इच्छा ॥
मेरे हिते हरि के पद-पंकज, वार हजार लै देखु परिच्छा ।
औरन को धन चाहिय बावरि, बांभन को धन केवल भिच्छा ॥१०॥
स्त्री
दानी बड़े तिहुँ लोकन में, जग जीवत नाम सदा जिनको लै ।
दीनन की सुधि लेत भली विधि, सिद्धि करौ पिय मेरो मतो लै ॥
दीनदयाल के द्वार न जात सो, और के द्वार पै दीन ह्वै बोलै ।
श्रीजदुनाथ-से जाके हितू, सो तिहूं पन क्यों कन माँगत डोलै ॥११॥
सुदामा
छत्रिन के प्रन जुद्ध, जुवा, सजि वाजि, चढ़ें गजराजन ही ।
बैस को बानिज और कृषि, प्रन सूद्र को सेवन-साजन ही ॥