शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
शालिहोत्रम् । ६१
कर अग्निपर चढाकर औटाले, फिर उसको घोडे के शरीर पर
मालिश करै इस रोगमें घोडेको हवासे बचावे तथा पानाकेलिये
यह दबादेः पावभर पीपलको पीसकर सेरभर गायके दूधमें मिला
कर तीन दिनतक प्रातःकाल घोडेको पिलावै ।
फालिजका इलाज–तिलका तेल गर्दन पर मले और तेलके
सूखने पर अरंडके पत्ते गो।के गोबरमें पीसकर मले (अन्य उपाय)
कुचलाके सतकी एक रत्तीमें ४० गोलियां बनाकर एक एक
गोली दोनों समय दे और लिनिमॅट रोमानियाका मर्दन करे ।
अन्य उपाय–लहसनके वीज, अमलतास, सोंठ इनको समान
भागले दो सेर पानी में औटावै जब आधा पानी रहजाय तब
छानकर सात दिन तक पिलावै ।
मस्सेका उपाय–जब घोडेके मुखपर कोई मस्सा हो तो काग-
जकी मोटी वत्ती बनाकर उसकी धूनी से जलादे ।
दूसरा उपाय–तबकिया हरताल और चूना दोनों बराबर
पीसकर लेप करै ।
तीसरा उपाय–गंधक और उससे चौथाई केशर सिरकेमें पीस
कर बराबर लगाता रहे ।
बसका इलाज–जिस घोडे के मुखपर उजले दाग होजाते हैं
उसे बरस कहते हैं । इस पर यह काम करना चाहिये कि बैंगन
के टुकडे करके पानी में मलले और उस पानी को दिनमें दस
बारह बार थोडा २ लगावे ।
मुख बंधकी दवा-जिस घोडे के दांत बंध जाते हैं और मुख से
लार टपकने लगजाती है उसका यह उपाय है कि तिलका तेल
६४ शालिहोत्रम् ।
उसके सिरपर लगावै और गौका गोबर वा अंजीरका हरा पत्ता
इनको पीसकर गुनगुना करके लेप करें ।
गलसुराकी दवा-यह सूजन कानकी जड से हलक तक होती
है । इसको पुरानी ईंटसे सेकना चाहिये ।
दूसरा इलाज-इन्द्रायनका भुना हुआ फल जौके आटेमें मल-
कर सात दिनतक खिलावै ।
तीसरा इलाज-अदरख पावभर, कालीमिरच आधसेर'पानएक
सौ (१००) कालेसर पावभर उनको कूट छानकर सात दिनतक
सायंकालके समय खिलावै ।
खुशकेका इलाज-इसमें गलेके दोनों ओर दो गोले होते हैं,
इस रोगके होनेसे जाडेमें सूत्रबन्द हो जाता है और गर्मी में
खाना पीना छोड देता है ।
पहिली दवा-पान, पीपल, अदरख, कालीमिरच, सेंधानमक
इन सबको बराबर लेकर चनेके चूनमें मिलाकर सात दिन तक
खिलावै ।
दूसरी दवा-बिनौलोंकी पोटली बनाकर सेकें और थोडे से
बिनौले मनुष्यके सूत्रमें पीसकर बांध दे तौ तीन दिनमें आराम
होजाता है ।
खुवकका इलाज-हलक के जोड में एक छालासा होता है इसे
जह्रवाद भी कहते हैं । इसका इलाज वैसाही होता है जैसा
गलसुराका होता है जो उससे आराम न हो तौ शिंगरफ की
गोली बहुत अच्छी होती हैं और जो बीमारी यहां तक बढजाय
कि मुख न खुल सकै तौ गौका गोबर और सांभरनमक मनुष्य
शालहोत्र। ६५
के मूत्र में पीसकर दोनों समय लगावे ऊपर से कपडा बांधदें।
इससे पक कर फूट जायगा। फिर सफेद जीरा, हल्दी एक २
दाम, नेहूं तीन दाम, नमक पांच दाम इनको पीस कर घाव में
भरकर कपडा बांध दे । फिर तीन दिनतक केवल नमक पीसकर
भरता रहे और नीचे लिखी मरहम लगावे । तिली का तेल
डेढ़ पाव, भिलावा छटांक भर तेल में जला कर लगावे, जब
उसकी ऊंचाई जाती रहे तब काली मिरच, नोलायोथा और
साबुन इनको तेल में पकाकर लगावे ।
अन्य दवा-सोंठ मिरच, पीपल, कुटकी, वायविडङ्ग, चिरा-
यता, सफेद जीरा, चीते की छाल, काकड़ासींगी, काला जीरा
इन सबको कूट छान कर इसमें आधपाव, सत्तू के साथ खिला-
ता रहे ।
ब्राह्मनी कोलास का इलाज ।
यह रोग दुम म या चोटी में होता है, इसमें रुधिर विकार
के कारण बाल जड़ से गिर जाते हैं और दर्द होता है ।
इसकी दवा-ढाक के पके हुए पीले पत्ते २० नग ले तथा
हरताल और सङ्खिया दोनों को बराबर लेकर पानी डाल कर
दोपहर तक खरल में घोटे, फिर उसको उन आक के पत्रों पर
लपेट ले और सेर भर तिल के तेल में उन पत्तों को डालकर
अग्नि पर चढावे जब पत्ते जल जांय तब उतार ले और नीला-
थोता, आंवलाहल्दी और आशखार तीनों बराबर उसमें डाल
कर नीम की लकड़ी से खूब घोटले फिर जिस जगह पर
ब्राह्मनी कोलास है उसको उपले से इतनी खुजलाओ कि रुधिर
६६ शालिहोत्रम् ।
निकल आवे, फिर ढाक के पत्तों पर उस दवा को लगा कर
वहां बांध दे और तीन दिन पीछे पट्टी खोल कर उस स्थान
को पानी से धोवे और फिर उस पर मरहम को लगावे ।
किनार, सुर्खा और सोता चन्द आदि का इलाज ।
जो घोडा खानेसे मिठाई खाता है, या ठण्डी हवा खाता है ।
या हाजमा ( पाचन शक्ति ) बिगड़ जाय या वह हमेशा एक
स्थान पर बँधा रहे और फिरे नहीं तो जुखाम हो जाता है,
यह बीमारी वात और कफ से होती है और पीछे किनार
नामक रोग उत्पन्न होजाता है ।
किनार रोग के लक्षण-इसमें घोड़ा बारम्बार छींकता है और
उसकी नाक से पानी बहता है तथा खाने पीनेसे उसे अनिच्छा
हो जाती है ।
किनार की दवा-सोंठ और पीपल दोनों को बराबर २ लेकर
पीस ले और सहान्जू और सैमर दोनों के पत्तों का रस निकाल
कर उसमें मिलाले फिर सुखा दे, जब सूख जाय तब पीस कर
उसे बांस की नली में भर उसकी घोडे को नास दे अथवा उस
दवा को टाट के टुकडे या नीले कपडे और स्याही सोख्ता में
लपेट कर उसको जला कर नाक में धूनी दे अथवा कायफल
को पीस कर उसकी नास दे ।
तीसरी दवा-बारूद दो पैसे भर, सेंधा नमक एक पैसे भर
और केशर धेला भर तीनोंको दूधमें पीस कर उसकी घोडे को
सवेरे और सन्ध्या दोनों समय चार दिन तक नास दे तो घोडे
का जुकाम दूर हो जायगा ।
शालहोत्र । ६७
चौथी दवा-चार तोले कडुवा तेल लेकर उसको आग पर
गरम करले और उसमें चार तोले शहद तथा चार माशे पिसा
हुआ कायफल मिलाकर घोडे के नथनों में डाले तो निश्चय
आराम हो ।
सुर्फाका इलाज-यह बीमारी भी सर्दीसे होतीहै, इसमें घोड़ा
खांस खांसकर दिक होजाता है, जुकाम और सुर्फा दोनोंके लक्षण
समान हैं, सुर्फेमें जमाहुआ कफ पतला हो २ कर निकलता है।
इसकी दवा-उत्तम शहद आधसेर, बकरी का दूध आधसेर
और सोंठ, चेतरा नौ दिरम तीनोंको मिलाकर घोडेको पिलावे ।
दूसरी दवा-वङ्ग छः माशेको अदरखकी गांठमें रखकर आग
में भुल भुलाकर घोडे को खिलावे तो इससे खांस वन्द हो
जाती है । यह दवा तीन दिन दे ।
तीसरी दवा-सेरभर अजवायन को मनुष्य के पेशाब में भि-
गोकर कई दिन तक रक्खी रहने दे । फिर उसे साफ करके
कूट ले और दो दो पैसे भर नित्य दाना खाने के बाद घोडे
को खिलावे इसी प्रकार तीन दिन तक करे ।
चौथी दवा-सहजने की छाल छटांकभर ( हाल की काटी
हुई को ) बारीक पीस कर तीन दिन तक खिलावे ।
पांचवी दवा-ढाई पत्ता झाऊ का ( पत्ते पके हुए ) घोडे को
खिलावे तो खांस दूर हो जाती है ।
छठी दवा-पानी पिला कर पीछे घोडे को मिठाई खिलावे
किन्तु तीन दिन तक इसी प्रकार करे तो खांस दूर हो
जाता है ।
सातवी दवा-अदरख में अफीम भर कर ऊपरसे गेहूंका आटा
६८ शालिहोत्र ।
लपेट कर आग में दवादे जब सिक जाय तब उसको निकाल
कर सोंठ के चून में तीन दिन तक खिलावे । अफीम अनुमान
से लेनी चाहिये ।
जीकुलनफसका इलाज-जीकुलनफस रोग पित्त के विकार से
उत्पन्न होती है, इसमें घोडे की आंख लाल हो जाती है और
शरीर गरम हो जाता है तथा वह कठिनता से श्वास लेता है
और बारम्बार पसीना आते हैं और शरीर की नसें ऊपर
आती हैं ।
इसकी दवा-हर्रा आठ तोले, आंवले आठ तोले, शक्कर पाव-
भर और चावल पावभर, सबको पीसकर हलवा बनाकर घोडे
को खिलावे ।
दूसरी दवा-अरण्ड की जड का छिलका, इन्द्रायन, गुजराती
वोल, काली मिरच, लाल मिरच, अजवायन, सेंधा नमक, नीला-
थोता, बन्दाल, अजमोध, दारु हल्दी, कुलीजन, फुलेल और
लोंग प्रत्येक आध २ पाव लेवे और ५ सेरथूहर के दूध में जौ
के आटे का खमीर कर उसको कंडों की आग पर जलाले,
जब ठंडा होजाय तब पीसले और उन दवाओं को भी इसमें
मिला कर पीसले, और फिर चार पैसेभर दवाको शराबमें भि-
गोकर नाल में भर घोडे को पिलावे और जो गर्मी अधिक
मालूम हो तो चार पैसे भर आंवले और बढाले । खाने को
चना और मोठ का दाना तथा सूखी घास देवे ।
शेरदुमी का इलाज-यह ऐसा रोग है कि इसमें घोडा सवारी
करने के वक्त शीसने लगता है और श्वास खींचता है ।
शालिहोत्रम् । ६६
इसकी दवा-काली मिरच और सोंफ प्रत्येक छटांक भर सोंठ
आधी छटांक, मिश्री सवा छटांक इन सबको कूट छानकर दस
दिन तक खिलावै ।
दूसरी दवा-काली मिरच सात तोले, सोंफ दस तोले, आंवला
छः तोले, कंजा छः तोले, मिश्री दस तोले इन सबको कूट
पीसकर दस दिन तक दोनों समय दे ।
तीसरी दवा-मुलहटो, बीदाना प्रत्येक छः तोले, किशमिस १
तोले सफेद जीरा सात तोले, काली मिरच, पीपल प्रत्येक सात
तोले, अदरख दो तोले सोंफ, मनुका और बबूलका गोंद प्रत्येक
दस तोले, इनमेंसे गोंदको पानीमें भिगोदे और ऊपर लिखी हुई
सब दवाओंको कूटकर गोंदके पानीमें गोलियां बना लेवे, एक २
गोली दोनों समय दे ।
चौथी दवा-प्याज दो सेर, कतीरा आध सेर दोनोंको पीसकर
मिलाले और आठ दिन तक दे ।
पांचवी दवा-धानकी भुसी पहरभर पेशाबमें भिगोकर दानेके
पीछे खानेको दे । और जे। श्वास बराबर चढ़ता हो तो सोंफ
धनियां, महदी के बीज, बायविडंग, आंवला, कतीरा इन सब
को आध आध पाव लेकर कूटले और जौके आटे में मिला
प्रातःकाल देवै ।
हिचकीका इलाज-जो बादी से हिचकियां आती हों तो मोंमि
याईकी एक गोली प्रातःकाल के समय दे । दूसरी दवा है कि
मोरपंख की राख शहद में मिलाकर देवै ।
सीने वंदका इलाज-जब घोडे के कंधे पर सुजन हो जाती है
तौ उसे सीनावन्द कहते हैं, यह रोग अजीर्ण से होता है। इसमें
७८ शालिहोत्रम् ।
महेला खाने को देना अच्छा होता है और सवारी भी लेना
अच्छा होता है ।
पहिली दवा-अरंड की कोंपल' खारी नमक इनको पाव
भर कूटकर खिलावै । और पीनेको गरम पानी दे, ठंडा पानी
न पिलावै ।
दूसरी दवा-आककी जडकी छाल खूब धुलाई हुई टके भर,
गूगल टके भर, पाव भर गुडमें मिलाकर खिलावै ।
तीसरी दवा-आंवाहल्दी टकेभर, सज्जी टकेभर, गूगल दो
टके भर अफीम पैसे भर सबको पानी में घोलकर उस पानी में
जौंका आटा गूंदकर टिकिया बना लेवै इस टिकिया में ऊपर
की सब दवा भर भूभलमें दबा कर सेंकले, सिकने पर दवाओं
को निकाल कूट पीसकर छः मात्रा करले और खिला दे ।
चौथी दवा-इसपंद; अजवायन, गूगल; असगंध' ये सब समान
भाग मालकांगनी, लहसन पावभर, फिटकरी, सुहागा छटांक २
भर इन सबको कूट पीस सेर भर गुडमें १५ गोलियां बना कर
दोनों समय एक एक गोली देवै और लोहेका तपाहुआ पानी
पिलावै ।
पांचवीं दवा-नीला थोथा एक तोला, वडी हरड पाव भर
दोनों को सिरके में महीन पीसकर ४० गोलियां बनावै और
एक २ गोली सवेरे और संध्याको खिलावै ।
छठी दवा-हींग, भिलावा, कालीमिरच, वडी पीपल, कूट जीरा
सुहागा, गूगल, गुजराती बोल और हल्दी सबको कूट छानकर
छटांक भर रोज सात दिन तक खिलावै ।
शालिहोत्रम् । ७१
सातवीं दवा—एलुआ, गूगुल, अफीम सुहागा, वायविडंग सब
को पांच २ माशे लेकर फंकी बनाकर तीन दिन तक घोडे को
खिलावे और गरम पानी पिलावे ।
आठवीं दवा—सुहागा; अजवायन खुरासानी, फिटकरी, गूगुल,
बेद इन्जीरकी कली इन सबको दो दो तोले लेकर एक खुराक
करै इस तरह तीन दिन तक दे और घोडे को गश्तदे तथा
नदीका पानी पिलावै ।
नवीं दवा—भैंसागूगल, मालकांगनी, हल्दी, तिवरसा गुड इन
सबको पाव २ भर लेकर दाना खाने से पहिले खिलावै ।
जौ गीरा, वादगीरा, आवगीरा और सीनागीरका इलाज ।
जो घोडा वक्त बे वक्त दाना और पानी खाता पीता है तथा
उसके हाजमा (पाचन शक्ति) पर ध्यान दिये बिना कच्चा
पक्का भोजन उसको खानेको दे दिया जाता है इसको जौगीरा
नामक बीमारी हो जाती है, वह सब बीमारी बुरी होती है ।
सीनागीर, आवगीर और जौगीरा इन सबका एकही
उपाय है।
दवा—घोडेको थोड़ी देरतक पानीमें तैरावे, या उसके दांतों की
जडमें नश्तर लगादे, या गधेकी चर्बीको एक बर्तन में पिघला
कर सिरसे पांवतक मले अथवा सुअरके पित्तेको पानीमें घोल-
कर पिलावै ।
अन्य दवा—आंबाहल्दी, सात पैसे भर, कच्चा सुहागा टकेभर,
गूगल टकाभर, फिटकरी पैसे भर, इस्पन्द एक पैसा भर और
साबुन चार पैसाभर सबकी तीन गोली बनाले और प्रातःकाल
एक गोली निहारमुख खिलावै ।
७२ शालिहोत्रम् ।
दन्य दवा-फिटकरी, सुहागा और अफीम प्रत्येक पांच माशे
नीला थोथा २ माशे, सज्जी २ दाम, और तिल पांच माशे सब-
को पीसकर तिलके तेलमें मिलाकर तेरह गोलियां बनावे और
दाने पानी के साथ चौथाई गोली खिलावै तथा हवाका परहेज
रक्खे ।
वेल, वदनाम, खिनाम और गुम नामका इलाज ।
जब महेला और घी घोडेको बहुत ज्यादह दिया जाता है
तो उसके सब शरीर पर दाने पड जाते हैं तथा हाथ, पैर, सिर
और सीने में गांठ पड जाती है । जो दाने आगे को होते हैं
जुकामके कारण होते हैं और उन्हें नर कहते हैं तथा जो पीछे
होते हैं वह गर्मीसे होते हैं और उनको मादा कहते हैं सिरकी
सूजन को कल्लुठं या वेल कहते हैं कभी सिरसे सीने तक और
और कभी पांवसे चूतड तक आंवले से गोले पड जाते हैं यह
बीमारी गर्मी से पैदा होती है और घोडे के तमाम शरीर में
हरारत होजाती है ।
दवा-कालो जीरी; अफीम और कुचला, दश २ माशे
लेकर तीनोंको पीसले और धतूरे के अर्कमें घोट कर दानों पर
लगा कर ऊपर से इन्जीर के पत्ता बांधदे तो निश्चय तीन दिन
में आराम हो ।
दूसरी दवा-दानोंको नश्तरसे चीरकर उनका मवाद निकालदे
और फिर उनमें आक या सैहुंडका दूध भरदे, जब घाव भर आवै
तब आधसेर कडवे तेल को गरम करके उसमें आधसेर नीला
थोथा मिलाकर घावके ऊपर लेप करै तो आराम हो ।
शालिहोत्रम् । ७३
तीसरी दवा-सौ मेंडक और सौ मछलियोंको मंगाकर छील-
कर सुखादे, जब सूख जाय तब उनको बारीक पीसकर कपडे में
छानकर पावभर चनाके सत्तूमें मिलाकर ४० दिन तक घोडेको
खिलावे और गश्तदे ।
चौथी दवा-सहजनेकी छाल पावभर और लाल मिरच आ-
धपाव दोनोंको कूटकर और छानकर हुहेखामें मिलाकर दानेके
साथ दोनों वक्त खिलावे और जबतक अच्छा न हो यही दवा
देता रहे और अगर घोडेको दाग दे तो यह बीमारी बढती
नहीं है ।
पांचवीं दवा-चोबचीनी एक सेर, गंधक आधसेर, पारा पाव
भर और सुर्मा आध पाव लेकर पहिले गंधकको आगपर गरम
करके उसमें सुर्मा और पारा मिलादे; फिर नीचे उतारकर उसमें
चोबचीनी कूटकर मिलादे और खूब बारीक पीसले फिर उम्दा
शहद मिलाकर डेढ २ तोले का गोली बना ले और दोनों
समय एक २ गोली खिलावै । यह गोली किरमक रोगको दूर
करती है ।
किरमकका इलाज-यह बीमारी गर्मीमे होती है, इसमें सिरसे
गर्दन तक दानेसे पडजाते हैं इस रोगके चिन्ह यह हैं कि घोडा
बेहोश हो जाता है, बहुत बेकली होती है, मुख सूख जाता
है पसीने बहुत आते हैं, हरघडी घोडा कांपता है और उसको
नींद नहीं आती है, यद्यपि यह बीमारी बुरी हैं परन्तु उसका
नीचे लिखा उपाय करे ।
जो दाने गर्दन में पडे हों उनमें से दो दाने चीर कर देखे,
७४ शालिहोत्रम् ।
यदि दोनों की रंगत पिस्ता के समान हो तो बुरी है इस में
कोई उपाय लाभ दायक नहीं होता हरी रंगत के सिवाय सब
रंगत के दानों का वही उपाय करे जो वदनामक इलाज में
लिखा है ।
अन्य उपाय-लोंगों को पीसकर थोडी सी दांदों में चोबकर
धरदे और कुछ पानीमें घोलकर (अनुमान माफिक) पिलावै,
इसी तरह थोडे दिनतक करता रहे तो आराम होजायगा ।
दूसरी प्रकारकी किरमक-यह बीमारी गर्मीसे भी उत्पन्न होती
है, परंतु साध्य होती है इसमें छोटे २ दाने तमाम शरीर में पड
जाते हैं और घोडा बहुत दुर्बल हो जाता है । यह दाने अपने
आप फूटकर इनमें से रुधिर बहने लगता है और यदि इन
दानों के मुखको चीरा जाय तो उनमें सूतसा निकलता है, इसमें
सीनेकी फस्द खोलना लाभदायक हैं ।
पहिली दवा-खिरनीके पत्ता, तितखीके पत्ता, दोनोंको पानीमें
औटावै और जब पानी ठण्डा होजाय तब उससे घोडेके शरीर
को धोवै ।
दूसरी दवा-आंवला, हर्रा, और कच्चे चावल तीनोंको आध२
सेर लेकर कूट छानकर सात खुराक बनाले और आधसेर तेल
में एक खुराक मिलाकर नित्य खिलावे, इसी प्रकार सात दिन
तक करें ।
तीसरी दवा-त्रिफला; सेरभर, कालीमिरच सेरभर बकायनका
सूखा फल आधसेर नीमकी छाल सूखो आधसेर, सबको कूट
छानकर शहद में मिलाकर ८० गोली बनाले और संध्या और
शालहोत्र।
सबेरे एक २ गोली नित्य खिलावै इसी प्रकार चालीस दिन
तक करै ।
जो लेप करना हो तो खुजली के प्रकरण में लिखा हुआ
लेप लगावै ।
हाथ और पांवके रोगोंका वर्णन ।
जो पांव कुलम अथवा जंघामें सूजन हो तो सेंधानमक चार
पैसेभर और मुसब्बर गोला एक पैसेभर दोनोंको मिलाकर लेप
करदे और मजबूत पट्टी बांध दे अथवा तालुकी फस्द खोले ।
पट्ठा पकडनेका उपाय-हाथकी नलीमें एक पट्ठा होता है जि-
सके चढजाने से बहुत दर्द होता है और उसके पास एक रग
होती है जो कडी और ऊंची नीची जमीन पर चलने से ऊपर
जाती है इसका उपाय करै ।
दवा-एक हांडा में पानी भरकर उसमें एक मुट्ठी भर खारी
नमक और दस ढाकके पत्ते डालकर आगपर रख दे और जब
आधा पानी रहजाय तब आग पर से उतार ले और गरम २
पत्तों को एकके ऊपर एक रखकर नलीपर मजबूत पट्टी से बांध
दे और पट्टी उस गरम पानी से तर रक्खै परन्तु इस बातका
ध्यान रक्खै कि सुमपर गरम पानी न पडने पावै क्योंकि यह
हानिकारक है इस लिये सुमको एक चमडेकी थैली में रखकर
बांध दे, यह उपाय तीन दिन तक करै तो आराम हो ।
छोप करने की रीति-जिस घोडेका पट्ठा भडकता हो, और
सूज गया हो उसका छोप करना लाभकारक है, सर्पकी बांबीकी
मिट्टी और भेडकी मेंगनी दोनोंको समान भाग लेकर मनुष्य
७८ शालिहोत्रम् ।
के मूत्रमें सानले फिर इसे मिट्टी के बर्तन में पकाकर दर्द के
स्थान पर लेप करै और घोडेको धूप में रक्खे, इसी प्रकार तीन
दिन तक करै तो आराम हो ।
दूसरी विधि-बकायम; नीम और मुण्डी की ताजी पत्ती मं-
गवाके कोल्हूकी मिट्टी तथा थोडी सज्जी लेकर सबको मिला-
कर पीसले और पकाकर छोप करे और घोडेको धूपमें टह-
लाबै जब तक कि दवा सूख न जाय, इसी प्रकार तीन दिन
तक करै ।
तीसरी विधि-अफीम और गेरू दोनों को बराबर लेकर
पीसले और कडवे तेलमें मिलाकर खूब घोटले. फिर इस दवा
को सुम्मसे जांघतक लगावै. प्रातःकाल और संध्या दोनों समय
तीन दिन तक इस दवाको लगावै तो दर्द बिल्कुल बन्द होजाता
है परन्तु इस बातका ध्यान रक्खै कि जिस जगह गेरू लगजाता
है । उस जगह फिर कोई दवा असर नहीं करती इस लिये इस
दवाको उस समय लगावै जब कि और सब दवा कर चुके
होवै ।
[
तृतीय अध्याय: अश्व-रोग चिकित्सा, आहार-विधान एवं उपसंहार
शालिहोत्रम् । ७७
दूसरा उपाय-एक तोलाभर मिश्री को कूटकर नित्य उस हड्डी
पर बांधे तो आराम हो ।
तीसरी दवा-बकरी का गुर्दा मंगाकर उसे आग में मुलमुजा
ले और थोडा सा नमक मिलाकर उस हड्डी पर बांध दे ।
चौथी दवा-बकरी के गुर्दे में थूहर की डाली मिलाकर आग
पर भून ले और उस पर साबुन लगाकर सात दिन तक बांधे,
फिर उस जगह को तेल से चिकनी करके उस जगह के चमडे
को काट दे।, और उसमें सेंहुड का दूध भर देवे तथा धतूरे के
पते औटा कर उस पर बांध दे और पट्टी को उसी पानी से तर
रक्खे इसी प्रकार सात दिनतक रहने दे, पट्टीको अपनी जगह
से न हटने दे; घोडे को उसके मुँह या पांवसे पट्टी न खोलने दे
जो घाव से मवाद बह कर आवे तो उसे पोंछ दे, लेकिन पट्टी
को न हटावे । सात दिन पीछे पट्टीको खोले तो हड्डी बिल्कुल
नष्ट होजायगी ।
पांचवी दवा-अण्डी की मिंगी और काले तिल दोनों को
बराबर लेकर कूट ले और टिकिया बना कर गरम करके बांधे
और तीन दिन बाद पट्टी खोले ।
बजर हड्डीका वर्णन-यह हड्डी जंघा या घुटनोंकी गांठपर उत्पन्न
होती है, इसमें दर्द होता है ।
इसकी दवा-सज्जी, काली मिरच, पीपल सोंठ, हीराकसीस,
सांभर नमक, कडवी तूंबी और सेंधा नमक सबको समान भाग
लेकर कूटकर छान ले, फिर आक के दूधमें सान के उसी प्रकार
बांधे जैसे कि बौर हड्डी के वयान में लिखा गया है।
७८ शालिहोत्र ।
जानुंआ रोगका निदान-जो घुटनेपर कोई हड्डी उभरे (ऊँची)
हो जाती है उसको जानुंआ कहते हैं, इसी हड्डी का मुंह बन्द
होता है, और कंगूरेदार होती है ।
इसका इलाज-इस स्थान पर पछने लगवावे अथवा नील,
हरताल, नीलाथोथा, शिंगरफ, चमेली का तेल, वच्छनाग इन
सबको बराबर लेकर कुरण्ड के पत्थर पर पीसले और उसकी
मालिश करे तथा आग से सेके, जब तक आराम न हो इसी
प्रकार करे, यह क्रिया सवेरे और सन्ध्या दोनों समय करनी
चाहिये । इस रोग में उस स्थान पर दाग देना भी बहुत
लाभदायक है ।
अथवा-उस स्थान के बालों को उस्तरा से साफ करके वहां
पर थूहर की कांटेदार डाली को काट साफ कर आग में भुन-
भुनाकर दोनों समय बांधे इसी प्रकार तीन दिन तक करे परन्तु
उस स्थान को खुला न रहने दे ।
अन्य दवा-जमालगोटा की मिंगी आधपाव लेकर उन्हें नींबू
के रस में घोट २ कर चालीस बार सुखाले, फिर उसको नींबू
के रस में खरल करके तदन्तर उस स्थान के बाल साफ कर पछ-
ने लगावे तथा उस दवा में पांच चार बूँद नींबू के रस को डाल
कर धूपमें रखदे और जब उसमें कुछ गर्मी आजाय तब उस
स्थान पर लेप करे और ऊपर से एरण्ड के पचास पत्ते बांध दे
पट्टी को दृढ बांधे जिससे कि वह तीन दिन तक न खुले । जब
तीन दिन होजांय तो उस पट्टीको खोल डाले और पीली मिट्टी
को घोलकर उस जगह लेप करे, किन्तु जब तक घोडेके आराम
न हो तब तक उसे अस्तबल से न खोले; जो घोडे को सूजन
शालिहोत्र । ७५
अधिक हो तो इस दवा को लगाया करे, कभी घबडावे नहीं
और घावपर पानी न पडने दे. यह दवा वेल हड्डी; दकावल;
मोतेडा और पुस्तड़े हड्डी में भी लाभदायक है।
हड्डे का इलाज-नीलाथोथा, उरद का चून, अण्डी के बीजों
की मिंगी और सेंधा नमक प्रत्येक चार चार तोले लेकर सब
दवाओं को कूट पीसकर उरदके घाटेमें सानकर टिकिया बनाले
और उसे एक ओर से लोहे के तवे पर सेंक कर दूसरी ओर
से हड्डे पर रखकर बांध दे और तीन दिन पट्टी को खुलने न
दे फिर तीसरे दिन पट्टीको खोलकर उसी तरह टिकिया बना
कर बांधदे, और सूजन बाकी रहे तो फिर इसी प्रकार टिकिया
बनाकर बांधे तथा जो घाव फूटने लगे तो घीसे धोकर उसका
लेपकरे। अरमनके फूल और डालीको आगमें जलाकर राख करले
फिर उस राखको पानीमें डालकर सात गोली अनुमान माफिक
बनाले और नीबूके रसमें भिगोकर, गोली प्रातःकाल खिलावे ।
सेंक- अंजीर के बीजों का गूदा, भिलाये, काले तिल, कूट,
मोम, ऊँट की हड्डी इन सबको पीसकर सिंदूर और सेंधा नमक
मिला कर दो पोटली बनाले और कडवे तेलको आगपर चढा
कर गरम करे फिर उसमें दोनों पोटलियों को डालकर एक २
पोटली से सुहाता २ दोनों समय सेंक करे ।
मोतेडे की चिकित्सा ।
पहिली दवा-अमरवेल चार पैसेभर लेकर कूटले और गुड़
में मिलाकर दाना खाने के पीछे खिलावे, कुछ दिन तक यही
उपाय करे। तो यह दवा लाभदायक होगी ।
दूसरी दवा-हींग भुनी हुई तीन पाव, और हल्दी डेढ सेर,
८० शालिहोत्रम् ।
णशखार सेंधा नमक और काला नमक, प्रत्येक आध आध पाव
इन सबको चक्की में खूब महीन पीस कर इक्कीस खुराक बनावे
आधपाव गुड़ में एक खुराक मिलाकर नित्य खिलावे ।
तीसरी दवा-करंजकी गूदा, कुटकी, पीपलामूल, काली मिरच
कायफल, पीपल, काली जीरी घोडावच और भुना हुआ सुहा-
गा सबको आध २ सेर लेकर कूट ले और उसमें से पाव भर
नित्य पानी पीने से पहिले खिलावे ।
मोवेडे और एड्डे पर सेक-कूट चार तोले अफीम आठ तोले
दोनों को धतूरे के अर्क में मिलाकर लेप करे और कण्डों से
सेके, इसी प्रकार इक्कीस दिन तक करे तो निश्चय है कि सब
मवाद सुम की राह से बाहर निकल जायगा ।
दूसरा सेक-थूहर की कांटेदार डाली पांच अंगुल लेकर उस-
के कांटे और सब्जी को साफ करदे और उसे भीतर पोली
करदे उसमें सुहागा और अजवायन कूटकर भर दे और कपड-
मिट्टी कर आग में डाले जब पकजाय तब निकाल कर कूटकर
मोंठके आटे में मिलाकर दोनों समय खिलावे और सेक भी
करे । दवा अनुमान से खिलावे ।
पुश्तक और चकावल का इलाज ।
पुश्तक और चकावल रोगों में ऊँटकी हड्डी को गरम करके
उससे सेक करे परन्तु इससे सेक करनेसे उस जगह बाल नहीं
आते हैं सो विचार करे ।
दूसरी दवा-जहां पुश्तक और चकावल हो उस जगह के
बालोंको मुडवा कर पछने लगावे और जब रुधिर बहुत निकल
जाय तब आक की ताजी जड लेकर छीलले और उसे मनुष्यके
शालिहोत्रम् । ८१
मूत्र में पीसकर आगपर पकाकर उस जगह लेप करे और ऊपर
से पट्टी बांध दे, जो पांव फूल जाय तो भुनी हुई फिटकरी
और मक्खन दोनों मिलाकर लेप करे और उसके पांव में एक
शीशे का कड़ा डालदे ।
बैजा और काना का इलाज ।
यह दोनों एक ही रोग हैं इसमें चूना और मक्खन मिला-
कर मालिश करे और कण्डे की आग में सेके, फिर अरण्ड के
पत्ते रखकर बांध दे ।
दूसरी दवा-साबुन, भिलावा, नीलाथोथा, आंवा हल्दी और
एलसार इन सबको बराबर लेकर पीसले और पानीमें घोटकर
लेप करे ।
तीसरी दवा-हल्दी, मिरच और नीम के पत्ते एक एक पैसा
भर लेकर पावभर तिल के तेलमें चढ़ाकर जलाले, फिर उनको
उसी तेल में घोटकर थोड़ा मोम मिलाके मरहम बनाले । यह
मरहम घाव और नासूर के वास्ते भी फायेदमन्द है ।
रसौली की चिकित्सा-जब तक रस बन्द नहीं होता है, तब
तक रसौली नहीं होती, यह पांव में या बगल में होती है, एक
गांठ सी सूजन के साथ पड जाती है ।
पहिली दवा-काली जीरी, मुसव्वर, कुचला और निर्विसी
चारों को बराबर लेकर मनुष्य के पेशाबमें पीसकर गरम करके
लेप करे और ऊपर से अरण्ड के पत्ते बांधे तो तीन दिन में
गांठ बैठ जायगी।
दूसरी दवा-जब रसौली पकजाय तब उसको नश्तर से चीर
कर मवाद निकाल दे और जवाखार, सज्जी और खिजूर का
८९ शालिहोत्र ।
फल बीज निकाला हुआ, इन तीनों को बराबर लेकर उनका
लेप करे और अजवायन तथा लहसन चार २ दाम, सेंधानमक
और पीपल तीन तीन दाम सबको कूटकर चूर्ण बनाकर चार
पैसेभर गुलकन्द में मिलाकर सात दिन तक प्रातःकाल खिलावे
जब तीन दिन होजायँ तब लेपकी दवाइयों को नीबू के रस में
पीस कर लेप करे ।
तीसरी दवा-सूजन के मुख को छुरी (नश्तर से) चीरकर
उसमें यह दवा भरेः-नीलाथोथा, साबुन, नौसादर और शिंगरफ
चारों को बराबर लेकर खूब महीन पीसले और तिलके तेल
में पकाकर एक बर्तन में रखले और नित्यप्रति घाव के मुख में
भरदे जब तक अच्छा न हो तबतक यही उपाय करे ।
गिल्टी गांठ और बतौरी की औषधि ।
पहिलो दवा-नौसादर आधी छटांक, सिरका आध पाव और
स्प्रिटि, कपूर आधी छटांक मिलाकर कपडे में तर कर बांधे ।
दूसरी दवा-गुलाई यकस्ट्राक, दो ड्राम, सिरका डेढ छटांक
और स्प्रिट आधपाव तीनों को मिलाकर लगावे ।
तीसरी दवा-नौसादर पैसाभर, मिउरीइटिक ऐसिड दो ड्राम
और जल पावभर मिलाकर लगावे ।
चौथी दवा-नौसादर आधपाव और मिरका १८ छटांक मि-
लाकर लगावे । यह चार नुसखे बड़े २ अँग्रेज अश्वचिकित्सकों
के लिखे हुए हैं ।
फीलपा का इलाज-इसमें पांव हाथी के पांव की तरह फूल
जाता है और चकतियां बांधकर जगह जगह घाव होजाते हैं ।