सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 130 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 91

७२ शालिहोत्रम् ।
दन्य दवा-फिटकरी, सुहागा और अफीम प्रत्येक पांच माशे
नीला थोथा २ माशे, सज्जी २ दाम, और तिल पांच माशे सब-
को पीसकर तिलके तेलमें मिलाकर तेरह गोलियां बनावे और
दाने पानी के साथ चौथाई गोली खिलावै तथा हवाका परहेज
रक्खे ।
वेल, वदनाम, खिनाम और गुम नामका इलाज ।
जब महेला और घी घोडेको बहुत ज्यादह दिया जाता है
तो उसके सब शरीर पर दाने पड जाते हैं तथा हाथ, पैर, सिर
और सीने में गांठ पड जाती है । जो दाने आगे को होते हैं
जुकामके कारण होते हैं और उन्हें नर कहते हैं तथा जो पीछे
होते हैं वह गर्मीसे होते हैं और उनको मादा कहते हैं सिरकी
सूजन को कल्लुठं या वेल कहते हैं कभी सिरसे सीने तक और
और कभी पांवसे चूतड तक आंवले से गोले पड जाते हैं यह
बीमारी गर्मी से पैदा होती है और घोडे के तमाम शरीर में
हरारत होजाती है ।
दवा-कालो जीरी; अफीम और कुचला, दश २ माशे
लेकर तीनोंको पीसले और धतूरे के अर्कमें घोट कर दानों पर
लगा कर ऊपर से इन्जीर के पत्ता बांधदे तो निश्चय तीन दिन
में आराम हो ।
दूसरी दवा-दानोंको नश्तरसे चीरकर उनका मवाद निकालदे
और फिर उनमें आक या सैहुंडका दूध भरदे, जब घाव भर आवै
तब आधसेर कडवे तेल को गरम करके उसमें आधसेर नीला
थोथा मिलाकर घावके ऊपर लेप करै तो आराम हो ।