शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८९ शालिहोत्र ।
फल बीज निकाला हुआ, इन तीनों को बराबर लेकर उनका
लेप करे और अजवायन तथा लहसन चार २ दाम, सेंधानमक
और पीपल तीन तीन दाम सबको कूटकर चूर्ण बनाकर चार
पैसेभर गुलकन्द में मिलाकर सात दिन तक प्रातःकाल खिलावे
जब तीन दिन होजायँ तब लेपकी दवाइयों को नीबू के रस में
पीस कर लेप करे ।
तीसरी दवा-सूजन के मुख को छुरी (नश्तर से) चीरकर
उसमें यह दवा भरेः-नीलाथोथा, साबुन, नौसादर और शिंगरफ
चारों को बराबर लेकर खूब महीन पीसले और तिलके तेल
में पकाकर एक बर्तन में रखले और नित्यप्रति घाव के मुख में
भरदे जब तक अच्छा न हो तबतक यही उपाय करे ।
गिल्टी गांठ और बतौरी की औषधि ।
पहिलो दवा-नौसादर आधी छटांक, सिरका आध पाव और
स्प्रिटि, कपूर आधी छटांक मिलाकर कपडे में तर कर बांधे ।
दूसरी दवा-गुलाई यकस्ट्राक, दो ड्राम, सिरका डेढ छटांक
और स्प्रिट आधपाव तीनों को मिलाकर लगावे ।
तीसरी दवा-नौसादर पैसाभर, मिउरीइटिक ऐसिड दो ड्राम
और जल पावभर मिलाकर लगावे ।
चौथी दवा-नौसादर आधपाव और मिरका १८ छटांक मि-
लाकर लगावे । यह चार नुसखे बड़े २ अँग्रेज अश्वचिकित्सकों
के लिखे हुए हैं ।
फीलपा का इलाज-इसमें पांव हाथी के पांव की तरह फूल
जाता है और चकतियां बांधकर जगह जगह घाव होजाते हैं ।