शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
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लपेट कर आग में दवादे जब सिक जाय तब उसको निकाल
कर सोंठ के चून में तीन दिन तक खिलावे । अफीम अनुमान
से लेनी चाहिये ।
जीकुलनफसका इलाज-जीकुलनफस रोग पित्त के विकार से
उत्पन्न होती है, इसमें घोडे की आंख लाल हो जाती है और
शरीर गरम हो जाता है तथा वह कठिनता से श्वास लेता है
और बारम्बार पसीना आते हैं और शरीर की नसें ऊपर
आती हैं ।
इसकी दवा-हर्रा आठ तोले, आंवले आठ तोले, शक्कर पाव-
भर और चावल पावभर, सबको पीसकर हलवा बनाकर घोडे
को खिलावे ।
दूसरी दवा-अरण्ड की जड का छिलका, इन्द्रायन, गुजराती
वोल, काली मिरच, लाल मिरच, अजवायन, सेंधा नमक, नीला-
थोता, बन्दाल, अजमोध, दारु हल्दी, कुलीजन, फुलेल और
लोंग प्रत्येक आध २ पाव लेवे और ५ सेरथूहर के दूध में जौ
के आटे का खमीर कर उसको कंडों की आग पर जलाले,
जब ठंडा होजाय तब पीसले और उन दवाओं को भी इसमें
मिला कर पीसले, और फिर चार पैसेभर दवाको शराबमें भि-
गोकर नाल में भर घोडे को पिलावे और जो गर्मी अधिक
मालूम हो तो चार पैसे भर आंवले और बढाले । खाने को
चना और मोठ का दाना तथा सूखी घास देवे ।
शेरदुमी का इलाज-यह ऐसा रोग है कि इसमें घोडा सवारी
करने के वक्त शीसने लगता है और श्वास खींचता है ।