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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 85

६६ शालिहोत्रम् ।
निकल आवे, फिर ढाक के पत्तों पर उस दवा को लगा कर
वहां बांध दे और तीन दिन पीछे पट्टी खोल कर उस स्थान
को पानी से धोवे और फिर उस पर मरहम को लगावे ।
किनार, सुर्खा और सोता चन्द आदि का इलाज ।
जो घोडा खानेसे मिठाई खाता है, या ठण्डी हवा खाता है ।
या हाजमा ( पाचन शक्ति ) बिगड़ जाय या वह हमेशा एक
स्थान पर बँधा रहे और फिरे नहीं तो जुखाम हो जाता है,
यह बीमारी वात और कफ से होती है और पीछे किनार
नामक रोग उत्पन्न होजाता है ।
किनार रोग के लक्षण-इसमें घोड़ा बारम्बार छींकता है और
उसकी नाक से पानी बहता है तथा खाने पीनेसे उसे अनिच्छा
हो जाती है ।
किनार की दवा-सोंठ और पीपल दोनों को बराबर २ लेकर
पीस ले और सहान्जू और सैमर दोनों के पत्तों का रस निकाल
कर उसमें मिलाले फिर सुखा दे, जब सूख जाय तब पीस कर
उसे बांस की नली में भर उसकी घोडे को नास दे अथवा उस
दवा को टाट के टुकडे या नीले कपडे और स्याही सोख्ता में
लपेट कर उसको जला कर नाक में धूनी दे अथवा कायफल
को पीस कर उसकी नास दे ।
तीसरी दवा-बारूद दो पैसे भर, सेंधा नमक एक पैसे भर
और केशर धेला भर तीनोंको दूधमें पीस कर उसकी घोडे को
सवेरे और सन्ध्या दोनों समय चार दिन तक नास दे तो घोडे
का जुकाम दूर हो जायगा ।