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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 98

शालिहोत्र । ७५
अधिक हो तो इस दवा को लगाया करे, कभी घबडावे नहीं
और घावपर पानी न पडने दे. यह दवा वेल हड्डी; दकावल;
मोतेडा और पुस्तड़े हड्डी में भी लाभदायक है।
हड्डे का इलाज-नीलाथोथा, उरद का चून, अण्डी के बीजों
की मिंगी और सेंधा नमक प्रत्येक चार चार तोले लेकर सब
दवाओं को कूट पीसकर उरदके घाटेमें सानकर टिकिया बनाले
और उसे एक ओर से लोहे के तवे पर सेंक कर दूसरी ओर
से हड्डे पर रखकर बांध दे और तीन दिन पट्टी को खुलने न
दे फिर तीसरे दिन पट्टीको खोलकर उसी तरह टिकिया बना
कर बांधदे, और सूजन बाकी रहे तो फिर इसी प्रकार टिकिया
बनाकर बांधे तथा जो घाव फूटने लगे तो घीसे धोकर उसका
लेपकरे। अरमनके फूल और डालीको आगमें जलाकर राख करले
फिर उस राखको पानीमें डालकर सात गोली अनुमान माफिक
बनाले और नीबूके रसमें भिगोकर, गोली प्रातःकाल खिलावे ।
सेंक- अंजीर के बीजों का गूदा, भिलाये, काले तिल, कूट,
मोम, ऊँट की हड्डी इन सबको पीसकर सिंदूर और सेंधा नमक
मिला कर दो पोटली बनाले और कडवे तेलको आगपर चढा
कर गरम करे फिर उसमें दोनों पोटलियों को डालकर एक २
पोटली से सुहाता २ दोनों समय सेंक करे ।
मोतेडे की चिकित्सा ।
पहिली दवा-अमरवेल चार पैसेभर लेकर कूटले और गुड़
में मिलाकर दाना खाने के पीछे खिलावे, कुछ दिन तक यही
उपाय करे। तो यह दवा लाभदायक होगी ।
दूसरी दवा-हींग भुनी हुई तीन पाव, और हल्दी डेढ सेर,