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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

७८ शालिहोत्रम् ।
के मूत्रमें सानले फिर इसे मिट्टी के बर्तन में पकाकर दर्द के
स्थान पर लेप करै और घोडेको धूप में रक्खे, इसी प्रकार तीन
दिन तक करै तो आराम हो ।
दूसरी विधि-बकायम; नीम और मुण्डी की ताजी पत्ती मं-
गवाके कोल्हूकी मिट्टी तथा थोडी सज्जी लेकर सबको मिला-
कर पीसले और पकाकर छोप करे और घोडेको धूपमें टह-
लाबै जब तक कि दवा सूख न जाय, इसी प्रकार तीन दिन
तक करै ।
तीसरी विधि-अफीम और गेरू दोनों को बराबर लेकर
पीसले और कडवे तेलमें मिलाकर खूब घोटले. फिर इस दवा
को सुम्मसे जांघतक लगावै. प्रातःकाल और संध्या दोनों समय
तीन दिन तक इस दवाको लगावै तो दर्द बिल्कुल बन्द होजाता
है परन्तु इस बातका ध्यान रक्खै कि जिस जगह गेरू लगजाता
है । उस जगह फिर कोई दवा असर नहीं करती इस लिये इस
दवाको उस समय लगावै जब कि और सब दवा कर चुके
होवै ।
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