सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
( ७३ )
है, क्योंकि अग्नि और लोहे ने अपनी पहली अवस्था को छोड़
दिया है, तो भी एक ही परिणामी होना चाहिये ; क्योंकि दोनों
परिणामी होने से गौरव होता है, और जो दोनों ही को परिणामी
माना जाय तो स्फटिकमणि में लाल या पीले रंग की परछाईं
पड़ने से जो उसमें लाली वा पीलापन आता है वो भी वास्तविक
मानना पड़ेगा, लेकिन वैसा माना नहीं जाता ?
प्र०—सृष्टि का मुख्य निमित्तकारण क्या है ?
उ०—रागविरागयोर्योगः सृष्टिः ॥ ९ ॥
अर्थ—जिसमें राग और विराग इन दोनों का योग ( मेल )
हो, उसे सृष्टि कहते हैं । इन दोनों का योग होना ही सृष्टि करने
का निमित्त-कारण है ।
प्र०—सृष्टि प्रक्रिया ( होना ) किस तरह होती है ?
उ०—महदादिक्रमेण पञ्चभूतानाम् ॥ १० ॥
अर्थ—महत्तत्वादिकों से आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी,
यह पंचभूत पैदा हुये । यद्यपि प्रकृति का सृष्टित्व अपनी मुक्ति के
वास्ते हो क्योंकि वह प्रकृति नित्य है ; किन्तु महदादिकों का अपने-
अपने विकार का सृष्टत्व अपनी मुक्ति के वास्ते नहीं हो सकता,
क्योंकि वह अनित्य है । अतएव महदादिकों का सृष्टत्व पराये
वास्ते है । और भी प्रमाण है ।
आत्मार्थत्वात् सृष्टेर्नैषामात्मार्थआरम्भः ॥११॥
अर्थ—इन महदादिकों का कारणत्व पुरुष के मोक्ष के वास्ते
है, किन्तु अपने वास्ते नहीं है ; क्योंकि महदादि विनाशी हैं
अर्थात् नाशवाले हैं ।
प्र०—यदि महदादिकों का कारणत्व ( बनाने वालापन ) पराये
वास्ते है, तो प्रकृति के वास्ते होना चाहिये । पुरुष के वास्ते क्यों है ?
( ७४ )
उ०—महदादिक प्रकृति के ही कार्य हैं, इस कारण 'पर'
शब्द से पुरुष का ही ग्रहण होगा ।
प्र०—दिशा और काल की सृष्टि किस प्रकार से हुई ?
उ०—दिक्कालावाकाशादिभ्यः ॥ १२ ॥
अर्थ—दिशा और काल यह दोनों आकाश से उत्पन्न हुये,
इस कारण यह दोनों आकाश के समान नित्य हैं, अर्थात्
आकाश में जो व्यापकता है, वह व्यापकता इन दोनों में भी है,
इस कारण यह दोनों नित्य हैं। और जो खण्ड दिशा और
काल हैं, सो उपाधियों के मेल से आकाश से उत्पन्न होते हैं, वे
अनित्य होते हैं। अब बुद्धि का स्वरूप और धर्म दिखाते हैं।
अध्यवसायोबुद्धिः ॥ १३ ॥
अर्थ—निश्चयात्मक ज्ञान का नाम बुद्धि है, और अध्यवसाय
नाम निश्चय का है, उस निश्चय को ही बुद्धि कहते हैं।
तत्कार्यं धर्म्मादि ॥ १४ ॥
प्र०—उस बुद्धि के कार्य धर्मादिक हैं तो मूर्ख पुरुषों की बुद्धि
में ज्ञानादि निन्दित क्यों प्रबल ( बलवान्. ) होते हैं ?
उ०—महदुपरागाद्विपरीतम् ॥ १५ ॥
अर्थ—मन के संयोग होने से यदि मन में मिथ्याज्ञान के
संस्कार हैं तो धर्मादिक विपरीत ( उलटे ) होजाते हैं, अर्थात्
अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्य, यह सब विपरीत होजाते हैं।
अब महत्तत्व के कार्य अहंकार को दिखाते हैं।
अभिमानोऽहंकारः ॥ १६ ॥
( ७५ )
अर्थ—अहं करने वाले को अहंकार कहते हैं, जैसे—कुम्हार
को कुम्भकार कहते हैं, और यह अहंकार शब्द अन्तःकरण का
नाम है। अहंकार और अभिमान यह दोनों एक ही वस्तु के नाम
हैं। अब अहंकार का कार्य दिखाते हैं।
एकादश पंचतन्मात्रं यत् कार्यम् ॥ १७ ॥
नेत्र को आदि लेकर १० इन्द्रियाँ, शब्द को आदि लेकर
पंचतन्मात्रा, सब अहंकार के कार्य हैं।
सात्विकमेकादशकं प्रवर्तते वैकृतादहङ्कारात् । १८
अर्थ—विकार को प्राप्त हुए अहंकार से सात्विक मन होता
है, और यह भी समझना चाहिये कि राजस रजोगुण वाले
अहंकार से केवल दश इन्द्रियाँ, और तामस तमोगुण वाले अहं-
कार से पंचतन्मात्रा होती हैं, और मन सत्वगुण से होता है,
इस कारण उनसे ही ग्यारह इन्द्रियाँ दिखाते हैं।
कर्मेन्द्रियबुद्धीन्द्रियैरान्तरमेकादशकम् ॥ १९ ॥
अर्थ—वाणी, हाथ, पाँव, गुदा, उपस्थ ( मूत्रस्थान ), यह
कर्मेन्द्रिय कहलाती हैं। नेत्र, कान, त्वचा ( खाल ), रसना
( जीभ ), घ्राण ( नाक ), यह पाँचों ज्ञानेन्द्रिय कहलाती हैं।
प्र०—इन्द्रियों की उत्पत्ति पंचभूतों से है ?
उ०—अहङ्कारिकत्वश्रुतेर्नभौतिकानि ॥ २० ॥
अर्थ—बहुत-सी श्रुतियां ऐसी देखने में आती हैं, जो
अहङ्कार से ही इन्द्रियों की उत्पत्ति को कहती हैं, जैसे—
( एकाऽहं बहुस्याम् ) एक में बहुत रूपों को धारण करता हूँ
इत्यादि। इस कारण आकाशादि पञ्चभूतों से इंद्रियों की उत्पत्ति
कहना ठीक नहीं।
( ७६ )
प्र०—"अग्निःवागप्येति वातं प्राणः ।" अग्नि में वाणी लय
होती है, और पवन में प्राण लय होता है। जबकि अग्नि इत्यादि
श्रुतियाँ कहती हैं कि अग्नि में वाणी लय होजाती है और वायु
में प्राण लय होजाता है, तो उत्पत्ति भी इन से ही क्यों न
मानी जाय ?
उ०—देवतालयश्रुतिर्नारम्भकस्य ॥ २१ ॥
अर्थ—अग्नि आदि श्रेष्ठ गुण से युक्त पदार्थों में लय दीखता
है, लेकिन उत्पत्ति नहीं दीखती और यह कोई नियम भी नहीं
है; कि जो जिसमें लय हो वह उससे ही उत्पन्न भी हो, जैसे—जल
की बूँद पृथिवी में लय होजाती है, लेकिन उससे उत्पन्न नहीं
होती। इस कारण इन्द्रियों की उत्पत्ति अहङ्कार ही से है, किन्तु
पंचभूतों से नहीं है।
प्र०—इन्द्रियों से सम्बन्ध रखने वाला मन नित्य है
व अनित्य ?
उ०—तदुत्पत्तिश्रुतेर्विनाशदर्शनाच्च ॥२२॥
अर्थ—नित्य नहीं है, किन्तु अनित्य है, क्योंकि "एतस्माज्जायते
प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च" इससे ही सब इन्द्रियाँ और
मन पैदा होते हैं, इत्यादि श्रुतियों से सिद्ध है कि मन का नाश
भी देखने में आता है, क्योंकि बुढ़ापे में चक्षु (तेज) आदि
इन्द्रियों की तरह नाश भी होता है। इससे मन नित्य नहीं है।
प्र०—नासिका आदि इन्द्रियों के गोलक (चिह्नों) को ही
इन्द्रिय माना है ?
उ०—अतीन्द्रियमिन्द्रियं भ्रान्तानामधिष्ठाने।२३
अर्थ—हाँ ! भ्रान्त मनुष्यों की बुद्धि ने गोलक का नाम
इन्द्रिय माना है, लेकिन इन्द्रियाँ तो अतीन्द्रिय हैं, अर्थात् इन्द्रियों
से इन्द्रियों का ज्ञान नहीं होता।
( ७७ )
प्र०-इन्द्रिय एक ही है, उसकी ही अनेक शक्तियाँ अनेक
विलक्षण काम करती रहती हैं ?
उ०—शक्तिभेदेऽपि भेदसिद्धौ नैकत्वम् ॥२४॥
अर्थ—एक इन्द्रिय की भी अनेक शक्तियों के मानने से
इन्द्रियों का भेद सिद्ध हो गया, क्योंकि उन शक्तियों में ही
इन्द्रियत्व का स्थापन हो सकता है ।
प्र०-एक अहङ्कार से अनेक प्रकार की इन्द्रियों की उत्पत्ति
होना यह बात तो न्याय से विरुद्ध है, क्योंकि एक वस्तु से एक
ही वस्तु उत्पन्न होनी चाहिये ?
उ०-न कल्पनाविरोधः प्रमाणदृष्टस्य ॥ २५ ॥
अर्थ-जो वस्तु प्रमाण ही से सिद्ध है, उसके विरुद्ध कल्पना
करना न्याय से विरुद्ध है, क्योंकि महदादिकों में जो गुण दीखते
हैं वे महदादिकों के कार्यों में भी दीखते हैं । इस प्रकार प्रत्यक्षादि
प्रमाणों से जो सिद्ध है वह न्याय से विरुद्ध नहीं हो सकता ।
कारण वास्तव में तो मन एक ही है, लेकिन उस कारण की
शक्तियों के भेद से दस इन्द्रियाँ अपने-अपने कार्य के करने में
तत्पर ( लगी ) रहती हैं और इस ही बात को अगला सूत्र भी
पुष्ट करता है ।
उभयात्मकं मनः ॥ २६ ॥
अर्थ—पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ-इन दशों
इन्द्रियों से मन का सम्बन्ध है, अर्थात् मन के बिना कोई भी
इन्द्रिय अपने किसी काम के करने में नहीं लग सकती । अब
इस कहे हुए सूत्र का अर्थ इस सूत्र में विस्तार से कहते हैं ।
गुणपरिणामभेदान्नानात्वमवस्थावत् ॥ २७ ॥
अर्थ—गुणों के परिणाम भेद से एक मन की अनेक शक्तियाँ
इस तरह होती हैं, जैसे-मनुष्य जैसी सङ्गति में बैठेगा उसके
( ७८ )
वैसे ही गुण हो जायेंगे ; यथा, कामिनी स्त्री की सङ्गति से कामी,
और वैराग्य-शील वाले के साथ वैराग्य-शील वाला हो जाता
है । इस ही तरह मन भी नेत्र आदि को लेकर जिस इन्द्रिय से
सङ्गति करता है, उसी इन्द्रिय से मन का मेल हो जाता है । अब
ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय इन दोनों के विषय में कहते हैं ।
रूपादि रसमलान्तउभयोः ॥ २८ ॥
अर्थ—रूप को आदि लेकर और मल-त्याग पर्यन्त ज्ञाने-
न्द्रिय और कर्मेन्द्रियों के विषय हैं, जैसे-नेत्र का रूप जिह्वा
[ जीभ ] का रस, नाक का गंध, त्वचा [ खाल ] का स्पर्श,
कानों का शब्द, मुख का वचन, हाथ का पकड़ना, पैरों का
चलाना, लिंग का पेशाब करना, गुदा का विष्ठा करना—यह दशों
विषय भिन्न-भिन्न हैं, और जिसका आश्रय लेकर यह इन्द्रिय
संज्ञा को प्राप्त होती हैं उस हेतु को भी कहते हैं ।
द्रष्टृत्वादिरात्मनः करणत्वमिन्द्रियाणाम् ॥ २६
अर्थ—इन्द्रियों का करणत्व आत्मा है अर्थात् जो-जो इन्द्रियाँ
अपने-अपने काम के करने में लगती हैं वे आत्मा के समीप
होने से कर सकती हैं, इससे आत्मा को परिणामित्व की प्राप्ति
नहीं हो सकती, जैसे—चुम्बक पत्थर के संसर्ग से लोह खिंच
आता है, ऐसे ही आत्मा के संसर्ग से नेत्र आदि इन्द्रियों में देखने
आदि की शक्ति होजाती है । अब अन्तःकरण की वृत्तियों को
भी कहते हैं ।
त्रयाणां स्वालक्षण्यम् ॥ ३० ॥
अर्थ—मन की तीन वृत्तियाँ जो चित्त, अहङ्कार और बुद्धि
हैं, उनका पृथक् २ लक्षण विदित होता है । अभिमान के समय
अहङ्कार, विचार के समय चित्त, और ज्ञान के समय बुद्धि स्वतः
विदित होती है ।
( ७६ )
सामान्यकरणवृत्तिः प्राणाद्या वायवः पंच ॥३१
अर्थ—प्राण वायु आदि को लेकर समान पर्यन्त जो पाँच
वायु हैं यह अन्तःकरण की साधारण वृत्ति कहलाते हैं, अर्थात् -
जो वायु हृदय में रहता है, उसका नाम प्राण है ; और जो गुदा
में रहता है, उसका नाम अपान है ; और जो कण्ठ में रहता है,
उसका नाम उदान है ; जो नाभि में रहता है, उसका नाम समान
है ; और जो सारे शरीर में रहता है, उसका नाम व्यान-वायु
है—यह सब अन्तःकरण के परिणामी भेद हैं, और जो बहुत-से
प्राण और वायु को एक मानते हैं, उनका मानना इस सबब से
अयोग्य है कि “एतस्माज्जायते प्राणः मनःसर्वेन्द्रियाणि च । खं
वायुर्ज्योतिरापश्च पृथिवी विश्वस्य धारिणी” । इस में प्राण और
वायु को भिन्न-भिन्न माना है । अब आचार्य अपने सिद्धान्त को
प्रकाश करते हैं, कि जैसे कई पुरुष इन्द्रियों की वृत्ति क्रम से
( एक समय में एक ही इन्द्रिय काम करेगी ) मानते हैं, उसको
अयुक्त सिद्ध करते हैं ।
क्रमशोऽक्रमशश्चेन्द्रियवृत्तिः ॥ ३२ ॥
अर्थ—इन्द्रियों की वृत्ति क्रम से भी होती है और बिना
क्रम के भी होती है, क्योंकि संसार में दीखता है कि एक आदमी
जब पानी पीने में तत्पर होता है, तब वह देखता भी है ।
प्र०-क्या न्याय ने जो एक ही इन्द्रिय के विषय का ज्ञान
होना लिखा है, वह ठीक नहीं ?
उ०—एक काल में दो ज्ञानेन्द्रियां काम नहीं करतीं, परन्तु
एक कर्मेन्द्रिय और एक ज्ञानेन्द्रि साथ-साथ काम कर सकती हैं।
मन की वृत्तियां ही संसार का निदान है, अर्थात् जन्म
मरण आदि सब मन की वृत्तियों से ही होते हैं, इसको ही कहते
भी हैं—
( ८० )
वृत्तयः पंचतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः ॥ ३३ ॥
अर्थ—प्रमाण ( प्रत्यक्ष आदि ), विपर्यय ( झूठा ज्ञान ),
विकल्प ( सन्देह ), नींद, स्मृति ( याद होना ) ; यह पाँच मन की
वृत्तियाँ हैं, और इनसे ही सुख-दुःख उत्पन्न होता है । जब मन की
वृत्तियाँ निवृत्त होजाती हैं तब पुरुष के स्वरूप में स्थित होजाती
हैं । इस बात को इस आगे के सूत्र से सिद्ध करते हैं ।
तन्निवृत्तावुपशान्तोपरागःस्वस्थः ॥ ३४ ॥
अर्थ—मन की वृत्तियों के निवृत्त होने पर पुरुष का उपराग
शान्त हो जाता है, और पुरुष स्वस्थ हो जाता है । यही बात
योग सूत्र में भी कही गई है, कि जब चित्त की वृत्तियों का निरोध
हो जाता है तब पुरुष अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है । पुरुष
का स्वस्थ होना यही है, कि उसके उपाधिरूप प्रतिबिम्ब का
निवृत्त हो जाना, इसको ही दृष्टान्त से भी सिद्ध करते हैं ।
कुसुमवच्चमणिः ॥ ३५ ॥
अर्थ—जैसे स्फटिक मणि में काले, पीले इत्यादि फूलों की
परछाईं पड़ने से काले, पीले रङ्ग वाली वह स्फटिक मणि मालूम
पड़ने लगती है, और जब उन काले, पीले फूलों को मणि के
साथ से भिन्न कर देते हैं तब वह मणि स्वच्छ प्रत्यक्ष रह जाती
है । इस ही तरह मन की वृत्तियों के दूर होने पर पुरुष राग
रहित और स्वस्थ हो जाता है ।
प्र०—यह इन्द्रियाँ किसके प्रयत्न से अपने-अपने कार्यों के
करने में लगी रहती हैं, क्योंकि पुरुष तो निर्विकार है और
ईश्वर से इन्द्रियों का कोई भी सम्बन्ध नहीं है ?
उ०—पुरुषार्थं करणोद्भवोऽप्यदृष्टोल्लासात् ।३६
( ८१ )
अर्थ—पुरुष के वास्ते इन्द्रियों की प्रवृत्ति भी उसी कर्म के
वश से है, जो पहिले प्रकृति को कह आये हैं, और इसका
दृष्टान्त भी ३५ वें सूत्र में दे चुके हैं, कि संयोग से जैसे एक का
गुण दूसरे में मालूम होता है, उसी प्रकार प्रकृति का कर्म पुरुष
संयोग से है, वही इन्द्रियों की प्रवृत्ति में हेतु है। इस सूत्र में 'अपि'
शब्द से पूर्व कही हुई प्रकृति की याद दिलाकर पुरुष को कर्म
से कुछ अंश में युक्त किया है, और फिर भी इसी पक्ष को
पुष्ट करने के वास्ते दृष्टान्त देंगे। दूसरे के वास्ते भी अपने आप
प्रवृत्ति होती है, इसमें दृष्टान्त भी देते हैं।
धेनु वद्वत्साय ॥ ३७ ॥
अर्थ—जैसेकि बछड़े के वास्ते गौ स्वयं (आप ही) दूध
उतार देती है, दूसरे की कुछ भी आवश्यकता नहीं रखती। इसी
प्रकार अपने स्वामी (पुरुष) के वास्ते इन्द्रियों की प्रवृत्ति
स्वयं होती है।
प्र०—भीतर और बाहर की सब इन्द्रियाँ कितनी हैं ?
उ०—करणं त्रयोदशविधमवान्तरभेदात् ॥३८
अर्थ—अवान्तर-भेद से इन्द्रियाँ तेरह तरह की हैं—पाँच
ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, एक बुद्धि, मन, और अहङ्कार, इन
भेदों के होने से।
प्र०—अवान्तर कहने का क्या प्रयोजन (मतलब) है ?
उ०—मन सब इन्द्रियों से मुख्य है।
प्र०—पुरुष के वास्ते इन्द्रियों की प्रवृत्ति में केवल मन ही
मुख्य है, और सब इन्द्रियाँ गौण हैं, तो बुद्धि में वो कौन-सा
मुख्य धर्म है ?
( ८२ )
उ०—इन्द्रियेषु साधकतमत्वगुणयोगात् ।
कुठारवत् ॥ ३६ ॥
अर्थ—जैसेकि पेड़ के काटने में चोट का मारना मुख्य
कारण है, और उसके काटने का मुख्य साधन कुल्हाड़ा है, इस
ही प्रकार इन्द्रियों को करणत्व और मन को साधकतमत्व
( जिस के बिना किसी तरह कार्य सिद्ध न हो ) का योग है।
नोट—कपिलमुनि बुद्धि और चित्त को एक ही मानते हैं।
प्र०—जबकि अहङ्कार भी इन्द्रिय माना गया है, तो मन
ही मुख्य कारण है, ऐसा कहना अयोग्य है ?
उ०—द्वयोः प्रधानं मनोलोकवद्भृत्यवर्गेषु ॥४०
अर्थ—वाह्य ( बाहर ) की और आभ्यन्तर ( भीतर ) की,
इन बारह प्रकार के भेद वाली इन्द्रियों में मन ही प्रधान है;
क्योंकि संसार में यही बात दीखती है, जैसे—राजा के बहुत-से
नौकर-चाकर होते हैं, तथापि उन सबके बीच में एक मन्त्री ही
मुख्य होता है। छोटे-छोटे नौकर और ज़मींदार आदि सैकड़ों होते
हैं, इसी तरह केवल मन प्रधान है और सब इन्द्रियाँ गौण हैं,
और भी मन की प्रधानता को इन तीन सूत्रों से पुष्टि पहुँचती है।
अव्यभिचारात् ॥ ४१ ॥
अर्थ—यद्यपि मन सब इन्द्रियों में व्यापक है तथापि अपने
कार्य में उस मन का अव्यभिचार ( निश्चय ) दिखाई पड़ता है।
तथाऽशेषसंस्काराधारत्वात् ॥ ४२ ॥
अर्थ—जितने भी संस्कार हैं सबको मन ही धारण करता
है। यदि नेत्र आदि अहङ्कार अथवा मन इनको ही प्रधान मानें
तो अंधे, बहरे, इत्यादिकों को स्मरण ( याद ) की शक्ति न होना
चाहिये, लेकिन देखने में आता है, कि उन लोगों को स्मरण-
( ८३ )
शक्ति अच्छी तरह होती है, और तत्वज्ञान के समय में मन
अहङ्कार का लय भी हो जाता है, तो भी स्मरण-शक्ति नष्ट नहीं
होती जोकि स्वाभाविक बुद्धि का धर्म है ।
स्मृत्यानुमानाच्च ॥ ४३ ॥
अर्थ—स्मृति का अनुमान बुद्धि से ही होता है, क्योंकि
चिन्ता-वृत्ति ( ध्यान की एक अवस्था ) सब अवस्थाओं से श्रेष्ठ
है, और इस सूत्र से यह भी मालूम होता है, कि कपिलाचार्य
बुद्धि और चित्त को एक ही मानते हैं, और मतवादियों की
तरह मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार, इन चारों को अन्तःकरण
चतुष्टय नहीं मानते हैं ।
प्र०—चिंतावृत्ति पुरुष को ही होनी चाहिये ?
उ०—सम्भवेन्न स्वतः ॥ ४४ ॥
अर्थ—अपने आप पुरुष को स्मृति नहीं हो सकती, क्योंकि
पुरुष कूटस्थ है ।
प्र०—जबकि मन को करण ( मुख्य इन्द्रिय ) माना है,
तो और इन्द्रियों से क्या प्रयोजन है ?
उ०—बिना नेत्रादि इन्द्रियों के मन अपना कोई भी काम
नहीं कर सकता । यदि नेत्रादि इन्द्रियों के बिना भी मन इन्द्रियों
का काम कर सकता है, तो अंधे आदमी को भी देखने की शक्ति
होनी चाहिये । क्योंकि मन तो उसके भी होता है । परन्तु संसार
में ऐसा देखने में ही नहीं आता, इससे प्रत्यक्ष सिद्ध होता है, कि
मन मुख्य है और सब इन्द्रियाँ गौण हैं ।
प्र०—जबकि मन को ही मुख्य ( प्रधान ) माना है तो
पहिले सूत्र में मन को उभयात्मक क्यों माना है ?
उ०—आपेक्षिकोगुणप्रधानभावःक्रियाविशेषात् ४५
अर्थ—क्रिया के कमती-बढ़ती होने से गुणों का भी प्रधान-
( ८४ )
भाव ( बड़प्पन ) एक दूसरे की निस्बत से होता है, जैसे—
नेत्र आदि के व्यापार में अहङ्कार मुख्य है, इसी तरह अहङ्कार
के व्यापार में मन प्रधान है ।
प्र०—इस पुरुष की मन इन्द्रियाँ ही मुख्य हैं, अर्थात् अन्य
इन्द्रियाँ गौण हैं ?
उ०—तत्कर्मार्जितत्वात् तदर्थमभिचेष्टा लोक-
वत् ॥ ४६ ॥
अर्थ—जैसेकि संसार में दीखता है, कि जो आदमी कुल्हाड़ी
को खरीदता है, उस कुल्हाड़ी के व्यापार से खरीदने वाले को
फल भी होता है, इस प्रकार मन भी पुरुष के कर्मों से पैदा
होता है, अतएव मन आदि का फल पुरुष को मिलता है । इस
कारण मनुष्य की मन इंद्रिय ही मुख्य है । यह समाधान पहले
कर भी आये हैं, कि पुरुष कर्म से रहित है, लेकिन पुरुष में
कर्म का आरोपण होता है । दृष्टान्त भी इस विषय का दे चुके हैं,
जैसे—राजा के सेवक इत्यादि युद्ध करें और हार-जीत राजा
की गिनी जाती है, इस प्रकार ही पुरुष में कर्म का आरोपण
होता है ।
समानकर्मयोगे बुद्धेः प्राधान्यं लोकवल्लोकवत् ॥४७
अर्थ—यद्यपि सब इन्द्रियों के साथ पुरुष का समान कर्मयोग
है, तथापि बुद्धि ही को मुख्यता है, जैसे—राज्य के रहने वाले
चांडाल को आदि ले द्विजाति पर्यंत सब ही लोग राजा की प्रजा
हैं तथापि जमींदार से मुख्य मंत्री ही गिना जाता है । इस दृष्टान्त
को संसार परंपरा के समान यहाँ समझ लेना चाहिये ।
प्र०—लोकवत् यह शब्द दुबारा क्यों कहा ?
उ०—यह दुबारा का कहना अध्याय की समाप्ति दिखाता है ।
प्र०—इस अध्याय में कितने विषय कहे गये हैं ?
तृतीयोऽध्यायः
( ८५ )
उ०—प्रकृति का कार्य, प्रकृति की सूक्ष्मता, दो प्रकार की
इंद्रियाँ, अन्तःकरण आदि का वर्णन है । इतने विषय कहे गये हैं ।
इति सांख्यदर्शने द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥
तृतीयोऽध्यायः
अब इस तीसरे अध्याय में प्रधान जो प्रकृति है उसका स्थूल
कार्य और महाभूत ( पृथ्बी आदि ) और दो तरह के शरीर यह
सब कहते हैं ।
अविशेषाद्विशेषारम्भः ॥ १ ॥
अर्थ—अविशेषात् अर्थात् जिससे छोटी और कोई वस्तु
न हो सके ऐसे भूत सूक्ष्म अर्थात् पंचतन्मात्राओं से विशेष
स्थूलमहाभूतों की उत्पत्ति होती है, क्योंकि सुखादिकों का ज्ञान
स्थूलभूतों में हो सकता है, और सूक्ष्मभूत योगी महात्माओं के
हृदय में प्रकाश होते रहते हैं ।
तस्माच्छरीरस्य ॥ २ ॥
तिन पूर्वोक्त [ पहिले कहे हुए ] बाईस तत्वों में से स्थूल
सूक्ष्म शरीरों की उत्पत्ति होती है ।
प्र०—स्थूल शरीर किसको कहते हैं ?
उ०—जिसका जाग्रतावस्था में अभिमान होता है ।
प्र०—लिङ्ग-शरीर किसको कहते हैं ?
उ०—मन, अहङ्कार और इन्द्रियाँ, जिसके द्वारा अपने अपने
काम करने में तत्पर रहते हैं, उसको लिङ्ग-शरीर कहते हैं ।
प्र०—कारण-शरीर किसको कहते हैं ?
( ८६ )
उ०—लिङ्ग-शरीर के कारण को कारण-शरीर कहते हैं।
प्र०—बाईस तेईस तत्त्वों के बिनां संसार की उत्पत्ति नहीं
होसकती ?
उ०—तद्बीजात् संसृतिः ॥ ३ ॥
अर्थ—बाईस तत्त्व शरीर के कारण हैं, और देखने में ऐसा
ही आता है, कि कारण के बिना कार्य्य की उत्पत्ति नहीं होती,
अतः उन्हीं बाईस तत्त्वों से संसार की उत्पत्ति होती है। अब
संसार की अवधि को भी कहते हैं—
आविवेकाच्च प्रवर्त्तनमविशेषाणाम् ॥ ४ ॥
अर्थ—अविशेष जो सूक्ष्म भूत है उनकी सृष्टि प्रवृत्ति तभी
तक रहती है जब तक विवेक ( ज्ञान ) नहीं होता। ज्ञान के होते
ही सूक्ष्म भूतों की प्रवृत्ति नहीं रहती।
प्र०—यदि अविवेक के ही वास्ते सृष्टि का होना है तो
महाप्रलय में भी सृष्टि का होना योग्य है, क्योंकि उस अवस्था
में भी अविवेक बना रहता है ?
उ०—उपभोगादितरस्य ॥ ५ ॥
अर्थ—जब अविवेक के कार्य्य प्रारब्ध का उपभोग पूरा होजाता
है, तब ही महाप्रलय होती है। जबकि अविवेक का भोग ही
विशेष रहा है। तब सूक्ष्म-भूत इस शरीर को क्यों उत्पन्न करेंगे ?
और महाप्रलयावस्था में प्रारब्ध कर्म का भोग नाश होजाता है
तब भी संचित कर्म बने रहते हैं, क्योंकि कर्म प्रवाह से अनादि हैं।
सम्प्रति परिमुक्तो द्वाभ्याम् ॥ ६ ॥
अर्थ—सृष्टि समय में पुरुष दोनों वासना और भोग-बद्ध
होता है।
( ८७ )
प्र०—परिमुक्त शब्द का अर्थ तो छूटना है, आप बद्ध
अर्थ करते हैं ?
उ०—पहले अध्याय के सूत्रों में पुरुष को भोक्तृत्वादि विशेषण
दे चुके हैं, इस कारण यहां अभोक्ता कहना अयोग्य है। दूसरे
संसार दशा में ही पुरुष को सुख-दुःख न होंगे, तो क्या मुक्त
अवस्था में होंगे और जो सुख-दुःख ही नहीं है, तो मुक्ति का
उपाय भी कोई न करेगा। तीसरे परिमुक्त शब्द का अर्थ मुक्त
करना भी अयोग्य है। यहाँ 'परि' शब्द का अर्थ बद्ध करना ही
ठीक है।
अब स्थूल और सूक्ष्म दोनों तरह के शरीरों के भेद कहते हैं।
मातापितृजं स्थूलं प्रायश इतरन्न तथा ॥ ७ ॥
अर्थ—स्थूल शरीर दो तरह के होते हैं—एक तो वह जो माता
के संगम से पैदा होते हैं; दूसरे वह जो बिन माता-पिता के
उत्पन्न हों, जैसे वर्षाऋतु में वीरबहूटी इत्यादिक होते हैं।
प्र०—पूर्व सूत्रों से साबित हुआ कि तीन प्रकार के शरीर
हैं, लेकिन पुरुष कौनसे शरीर की उपाधियों से सुख-दुःख का
भोक्ता होता है ?
उ०—पूर्वोत्पत्तेस्तत्कार्यत्वं भोगादेकस्यनेतरस्य ८
अर्थ—लिङ्ग-शरीर की उपाधियों से ही पुरुष को सुख-दुःख
होते हैं, क्योंकि संसार के आदि में लिङ्ग-शरीर की ही उत्पत्ति
है, इस कारण सुखादिक इसके कार्य हैं; अतः एक लिङ्ग-
शरीर की उपाधियों से ही पुरुष को सुखादिक हैं, किन्तु स्थूल
शरीर की उपाधियों से नहीं होते; क्योंकि जब स्थूल शरीर
मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, तब उसमें सुखादिक नहीं
देखने में आते।
प्र०—सूक्ष्म शरीर का स्वरूप क्या है ?
( ८८ )
उ०—सप्तदशैकं लिङ्गम् ॥ ६ ॥
अर्थ—पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ, मन, अहंकार,
और पंचतन्मात्रा ( रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द ), यह सूक्ष्म
शरीर हैं।
प्र०—यदि लिङ्ग शरीर एक ही है, तो अनेक शरीरों की
आकृति ( चेष्टा ) में भेद क्यों होता है ?
उ०—व्यक्तिभेदः कर्मविशेषात् ॥ १० ॥
अर्थ—स्थूल शरीर अनेक प्रकार के अनेक कर्मों के करने
से होते हैं। अब विचार किया जाता है, तो इससे यही बात
सिद्ध होती है कि जीवों के भोग का हेतु कर्म ही हैं।
प्र०—जब कि भोगों के स्थान लिंग शरीर को ही शरीरत्व
है तो स्थूल शरीर को शरीर क्यों कहते हैं ?
उ०—तदधिष्ठानाश्रये देहे तद्वादात्ते तद्वादः ॥११॥
अर्थ—पञ्चभूतात्मक ( स्थल ) शरीर में उस लिङ्ग शरीर
का अधिष्ठान ( रहने का स्थान ) के सबब से देह वाद है, अर्थात्
लिंग शरीर का आश्रय स्थूल शरीर है, इसलिये स्थूल शरीर को
शरीर कहते हैं।
प्र०—स्थूल शरीर लिंग शरीर से दूसरा है, इसमें क्या
प्रमाण है ?
उ०—न स्वातन्त्र्यात् तदृते छायावच्चित्रवच्च ॥१२
अर्थ—वह लिङ्ग शरीर बिना किसी आश्रय के नहीं रह
सकता, जैसे—छाया किसी आश्रय के बिना नहीं रह सकती,
और तसवीर बिना आधार के नहीं खिंच सकती, इस तरह लिङ्ग
शरीर भी स्थूल शरीर के बिना नहीं ठहर सकता है ।
( ८६ )
प्र०—यदि लिङ्ग शरीर मूर्त्त द्रव्य है तो वायु आदि के समान
उसका भी आधार आकाश हो सकत है, और जगह कल्पना
करने से क्या तात्पर्य्य है ?
उ०—मूर्त्तत्वेऽपि न संघातयोगात्तरणिवत् ॥१३
अर्थ—यदि लिङ्ग शरीर मूर्त्तत्व भी है तथापि वह किसी
स्थान के बिना नहीं रह सकता, जैसे—बहुत से तेज इकट्ठे
होकर बिना पार्थिव (पृथिवी से पैदा होने वाले) द्रव्य के आधार
के नहीं रह सकते, इस तरह लिंग शरीर भी बिना किसी आधार
के नहीं रह सकता ।
प्र०—लिंग-शरीर का परिमाण क्या है ?
उ०—अणुपरिमाणं तत् कृतिश्रुतेः ॥ १४ ॥
अर्थ—लिंग शरीर अणु परिमाण वाला अर्थात् ढका हुआ
है, बहुत अणु नहीं है ; क्योंकि बहुत ही अणु ( सूक्ष्म ) अवयव
रहित होता है, और लिंग शरीर अवयव वाला है। कारण यह
है, कि लिंग शरीर के कार्य दीखते हैं, इस में युक्ति भी प्रमाण है ।
तदन्नमयत्वश्रुतेश्च ॥ १५ ॥
अर्थ—वह लिंग शरीर अन्नमय है, इस कारण अनित्य है ;
क्योंकि इस विषय में श्रुतियाँ प्रमाण देती हैं । "अन्नमयं
हि सौम्य ! मन आपो मयः प्राणः तेजोमयीवाक्” । हे सौम्य !
यह मन अन्नमय है, प्राण जलमय है, वाणी तेजोमयी है । यद्यपि
मन आदि कार्य भौतिक नहीं हैं, तथापि दूसरे के मेल से इन में
घटना-बढ़ना दीखता है, इस कारण से ही अन्नमय मन को
माना है ।
प्र०—यदि लिंग शरीर अचेतन है, तो उसकी अनेक शरीरों
के वास्ते उत्पत्ति क्यों है ?
( ६० )
उ०—पुरुषार्थं संसृतिर्लिङ्गानां सूपकारवद्राज्ञः॥१६
अर्थ—लिंग शरीर की उत्पत्ति पुरुष के वास्ते है, जैसे—
पाकशाला ( भोजन बनाने की जगह ) में रसोइये को अपने
स्वामी के वास्ते जाना है, इस ही तरह लिंग शरीर का होना
भी पुरुष के वास्ते है। लिंग शरीर का विचार हो चुका। अब
स्थूल शरीर का विचार किया जाता है—
पाञ्चभौतिको देहः ॥ १७ ॥
अर्थ—यह शरीर पाञ्चभौतिक कहलाता है, अर्थात् पृथिवी,
जल, तेज, वायु, आकाश, इनसे इसकी उत्पत्ति है।
चातुर्भौतिकमित्येके ॥ १८ ॥
कोई ऐसा कहते हैं, कि चार ही भूतों से स्थूल शरीर होता
है, क्योंकि आकाश तो अवयव रहित है, इस कारण आकाश
किसी के साथ विकार को प्राप्त नहीं हो सकता है।
एकभौतिकमित्यपरे ॥ १९ ॥
और कोई ऐसा कहते हैं, कि यह स्थूल शरीर एक भौतिक
है, अर्थात् शरीर पार्थिव ( पृथिवी का विकार है ) और जो
विशेष चार भूत हैं वे केवल नाम-मात्र ही हैं। या इस प्रकार
जानना चाहिये, कि एक-एक भूत के सब शरीर हैं। मनुष्यों के
शरीर में पृथिवी का अंश ज्यादा है, इस कारण यह शरीर पार्थिव
है, और तैजस लोक वासियों में तेज ज्यादा है, इससे उनका
शरीर तैजस है। शरीर स्वभाव से चैतन्य नहीं है, इस पक्ष को
दूर करते हैं—
न सांसिद्धिकं चैतन्यं प्रत्येकादृष्टेः ॥ २० ॥
अर्थ—जब पृथिवी आदि भूतों को भिन्न-भिन्न करते हैं,
तब उनमें चेतन-शक्ति नहीं दीखती, अतः इससे सिद्ध होता
( ६१ )
है, कि देह स्वभाव से चैतन्य नहीं है, किन्तु किसी दूसरे चैतन्य
के मेल से चैतन्य-शक्ति को धारण करती है ।
प्रपंचमरणाद्यभावश्च ॥ २१ ॥
अर्थ—यदि शरीर को स्वभाव से चैतन्य माना जाय, तो
यह भी दोष हो सकता है कि प्रपंच, मरण, सुषुप्ति आदि भिन्न-भिन्न
अवस्थाएँ नहीं हो सकेंगी ; क्योंकि जो देह स्वभाव से चैतन्य-
है, तो मृत्यु-काल में इसकी चेतन-शक्ति कहाँ को भाग जाती है,
और बीसवें सूत्र में जो यह बात कही है कि हरेक भूत के भिन्न-
भिन्न करने पर चेतनता नहीं दीखती, अब इस पक्ष को भी पुष्ट
करते हैं ।
मदशक्तिवच्चेत् प्रत्येकपरिदृष्टेसांहत्ये तदुद्भवः॥२२
अर्थ—यदि मदिरा की शक्ति के समान माना जाय, जैसे—
अनेक पदार्थों के मिलने से मादकता, शक्ति उत्पन्न हो जाती
है, इस ही तरह पाँच भूतों के मिलने से शरीर में चैतन्य-
शक्ति उत्पन्न हो जाती है, ऐसा कहना भी योग्य नहीं है, क्योंकि
मदिरा में जो मादक शक्ति है, वह शक्ति उन पदार्थों में भी है,
जिनसे मदिरा बनी है । यदि यह कहा जाय कि हर एक भूत
में थोड़ी चेतनता है, और सब मिलकर बड़ी चेतनता हो जाती
है, ऐसा कहना भी असत्य है ; क्योंकि बहुत-सी चैतन्य-शक्तियों
की कल्पना करने में गौरव हो जायगा, इस कारण एक ही
चैतन्य-शक्ति का मानना योग्य है, और पहिले जो इस बात को
कह आये हैं, कि लिंग शरीर की सृष्टि पुरुष के वास्ते है, और
लिंग शरीर का स्थूल शरीर में सञ्चार भी पुरुष के वास्ते है, उस
का तात्पर्य अब कहते हैं, जो अत्यन्त पुरुषार्थ का हेतु है ।
ज्ञानान्मुक्तिः ॥ २३ ॥
( ६२ )
अर्थ—लिंग शरीर में जो मन आदि हैं, उन से ज्ञान उत्पन्न
होता है, और ज्ञान से ही मुक्ति होती है।
बन्धोविपर्ययात् ॥ २४ ॥
अर्थ—विपर्यय नाम मिथ्याज्ञान का है, मिथ्याज्ञान से ही
सुख-दुःख रूप बन्धन होता है। ज्ञान से मुक्ति और मिथ्या ज्ञान
से बंधन होता है, इस विषय को तो कह चुके, अब मुक्ति का
विचार किया जाता है—
नियतकारणत्वान्न समुच्चयविकल्पौ ॥ २५ ॥
अर्थ—ज्ञान से ही मुक्ति होती है, इस कारण मुक्ति का
नियत कारण ज्ञान है, इस वास्ते मुक्ति में ज्ञान और कर्म दोनों
हेतु नहीं हो सकते; क्योंकि मुक्ति में इस बात का कोई विकल्प
भी नहीं है, क्योंकि कर्म से मुक्ति हुई, या ज्ञान से, क्योंकि इसका
तो ज्ञान ही नियत कारण, और इस बात को भी इस सूत्र से
प्रत्यक्ष करते हैं।
स्वप्नजागराभ्यामिव मायिकामायिकाभ्यां
नोभयोर्मुक्तिः पुरुषस्य ॥ २६ ॥
अर्थ—जैसे स्वप्नावस्था और जाग्रतावस्था इन दोनों में
पहला तो प्रतिबिम्ब है, दूसरा सच्चा है। यह स्वप्नावस्था और
जाग्रतावस्था दोनों आपस में विरुद्ध धर्म वाले हैं, अतः ( इस
कारण ) एक वक्त में नहीं रहसकते, इसी तरह ज्ञान और कर्म
भी एक वक्त में नहीं रह सकते हैं। बस इसी से सिद्ध हो गया कि
विरुद्ध धर्म वाले पदार्थ न तो मिल सकते हैं, और न मुक्ति
का हेतु हो सकते हैं, और न इस विषय पर विकल्प करना
चाहिये, कि किस से मुक्ति होती है; क्योंकि मुक्ति का नियत
कारण ज्ञान है, और “न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेने के