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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 192 में से

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पृष्ठ 76

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अर्थ—अहं करने वाले को अहंकार कहते हैं, जैसे—कुम्हार
को कुम्भकार कहते हैं, और यह अहंकार शब्द अन्तःकरण का
नाम है। अहंकार और अभिमान यह दोनों एक ही वस्तु के नाम
हैं। अब अहंकार का कार्य दिखाते हैं।
एकादश पंचतन्मात्रं यत् कार्यम् ॥ १७ ॥
नेत्र को आदि लेकर १० इन्द्रियाँ, शब्द को आदि लेकर
पंचतन्मात्रा, सब अहंकार के कार्य हैं।
सात्विकमेकादशकं प्रवर्तते वैकृतादहङ्कारात् । १८
अर्थ—विकार को प्राप्त हुए अहंकार से सात्विक मन होता
है, और यह भी समझना चाहिये कि राजस रजोगुण वाले
अहंकार से केवल दश इन्द्रियाँ, और तामस तमोगुण वाले अहं-
कार से पंचतन्मात्रा होती हैं, और मन सत्वगुण से होता है,
इस कारण उनसे ही ग्यारह इन्द्रियाँ दिखाते हैं।
कर्मेन्द्रियबुद्धीन्द्रियैरान्तरमेकादशकम् ॥ १९ ॥
अर्थ—वाणी, हाथ, पाँव, गुदा, उपस्थ ( मूत्रस्थान ), यह
कर्मेन्द्रिय कहलाती हैं। नेत्र, कान, त्वचा ( खाल ), रसना
( जीभ ), घ्राण ( नाक ), यह पाँचों ज्ञानेन्द्रिय कहलाती हैं।
प्र०—इन्द्रियों की उत्पत्ति पंचभूतों से है ?
उ०—अहङ्कारिकत्वश्रुतेर्नभौतिकानि ॥ २० ॥
अर्थ—बहुत-सी श्रुतियां ऐसी देखने में आती हैं, जो
अहङ्कार से ही इन्द्रियों की उत्पत्ति को कहती हैं, जैसे—
( एकाऽहं बहुस्याम् ) एक में बहुत रूपों को धारण करता हूँ
इत्यादि। इस कारण आकाशादि पञ्चभूतों से इंद्रियों की उत्पत्ति
कहना ठीक नहीं।