सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 74, कुल 192 में से
संदर्भ में पढ़ें( ७३ )
है, क्योंकि अग्नि और लोहे ने अपनी पहली अवस्था को छोड़
दिया है, तो भी एक ही परिणामी होना चाहिये ; क्योंकि दोनों
परिणामी होने से गौरव होता है, और जो दोनों ही को परिणामी
माना जाय तो स्फटिकमणि में लाल या पीले रंग की परछाईं
पड़ने से जो उसमें लाली वा पीलापन आता है वो भी वास्तविक
मानना पड़ेगा, लेकिन वैसा माना नहीं जाता ?
प्र०—सृष्टि का मुख्य निमित्तकारण क्या है ?
उ०—रागविरागयोर्योगः सृष्टिः ॥ ९ ॥
अर्थ—जिसमें राग और विराग इन दोनों का योग ( मेल )
हो, उसे सृष्टि कहते हैं । इन दोनों का योग होना ही सृष्टि करने
का निमित्त-कारण है ।
प्र०—सृष्टि प्रक्रिया ( होना ) किस तरह होती है ?
उ०—महदादिक्रमेण पञ्चभूतानाम् ॥ १० ॥
अर्थ—महत्तत्वादिकों से आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी,
यह पंचभूत पैदा हुये । यद्यपि प्रकृति का सृष्टित्व अपनी मुक्ति के
वास्ते हो क्योंकि वह प्रकृति नित्य है ; किन्तु महदादिकों का अपने-
अपने विकार का सृष्टत्व अपनी मुक्ति के वास्ते नहीं हो सकता,
क्योंकि वह अनित्य है । अतएव महदादिकों का सृष्टत्व पराये
वास्ते है । और भी प्रमाण है ।
आत्मार्थत्वात् सृष्टेर्नैषामात्मार्थआरम्भः ॥११॥
अर्थ—इन महदादिकों का कारणत्व पुरुष के मोक्ष के वास्ते
है, किन्तु अपने वास्ते नहीं है ; क्योंकि महदादि विनाशी हैं
अर्थात् नाशवाले हैं ।
प्र०—यदि महदादिकों का कारणत्व ( बनाने वालापन ) पराये
वास्ते है, तो प्रकृति के वास्ते होना चाहिये । पुरुष के वास्ते क्यों है ?