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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 192 में से

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वैसे ही गुण हो जायेंगे ; यथा, कामिनी स्त्री की सङ्गति से कामी,
और वैराग्य-शील वाले के साथ वैराग्य-शील वाला हो जाता
है । इस ही तरह मन भी नेत्र आदि को लेकर जिस इन्द्रिय से
सङ्गति करता है, उसी इन्द्रिय से मन का मेल हो जाता है । अब
ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय इन दोनों के विषय में कहते हैं ।
रूपादि रसमलान्तउभयोः ॥ २८ ॥
अर्थ—रूप को आदि लेकर और मल-त्याग पर्यन्त ज्ञाने-
न्द्रिय और कर्मेन्द्रियों के विषय हैं, जैसे-नेत्र का रूप जिह्वा
[ जीभ ] का रस, नाक का गंध, त्वचा [ खाल ] का स्पर्श,
कानों का शब्द, मुख का वचन, हाथ का पकड़ना, पैरों का
चलाना, लिंग का पेशाब करना, गुदा का विष्ठा करना—यह दशों
विषय भिन्न-भिन्न हैं, और जिसका आश्रय लेकर यह इन्द्रिय
संज्ञा को प्राप्त होती हैं उस हेतु को भी कहते हैं ।
द्रष्टृत्वादिरात्मनः करणत्वमिन्द्रियाणाम् ॥ २६
अर्थ—इन्द्रियों का करणत्व आत्मा है अर्थात् जो-जो इन्द्रियाँ
अपने-अपने काम के करने में लगती हैं वे आत्मा के समीप
होने से कर सकती हैं, इससे आत्मा को परिणामित्व की प्राप्ति
नहीं हो सकती, जैसे—चुम्बक पत्थर के संसर्ग से लोह खिंच
आता है, ऐसे ही आत्मा के संसर्ग से नेत्र आदि इन्द्रियों में देखने
आदि की शक्ति होजाती है । अब अन्तःकरण की वृत्तियों को
भी कहते हैं ।
त्रयाणां स्वालक्षण्यम् ॥ ३० ॥
अर्थ—मन की तीन वृत्तियाँ जो चित्त, अहङ्कार और बुद्धि
हैं, उनका पृथक् २ लक्षण विदित होता है । अभिमान के समय
अहङ्कार, विचार के समय चित्त, और ज्ञान के समय बुद्धि स्वतः
विदित होती है ।