सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 83, कुल 192 में से
संदर्भ में पढ़ें( ८२ )
उ०—इन्द्रियेषु साधकतमत्वगुणयोगात् ।
कुठारवत् ॥ ३६ ॥
अर्थ—जैसेकि पेड़ के काटने में चोट का मारना मुख्य
कारण है, और उसके काटने का मुख्य साधन कुल्हाड़ा है, इस
ही प्रकार इन्द्रियों को करणत्व और मन को साधकतमत्व
( जिस के बिना किसी तरह कार्य सिद्ध न हो ) का योग है।
नोट—कपिलमुनि बुद्धि और चित्त को एक ही मानते हैं।
प्र०—जबकि अहङ्कार भी इन्द्रिय माना गया है, तो मन
ही मुख्य कारण है, ऐसा कहना अयोग्य है ?
उ०—द्वयोः प्रधानं मनोलोकवद्भृत्यवर्गेषु ॥४०
अर्थ—वाह्य ( बाहर ) की और आभ्यन्तर ( भीतर ) की,
इन बारह प्रकार के भेद वाली इन्द्रियों में मन ही प्रधान है;
क्योंकि संसार में यही बात दीखती है, जैसे—राजा के बहुत-से
नौकर-चाकर होते हैं, तथापि उन सबके बीच में एक मन्त्री ही
मुख्य होता है। छोटे-छोटे नौकर और ज़मींदार आदि सैकड़ों होते
हैं, इसी तरह केवल मन प्रधान है और सब इन्द्रियाँ गौण हैं,
और भी मन की प्रधानता को इन तीन सूत्रों से पुष्टि पहुँचती है।
अव्यभिचारात् ॥ ४१ ॥
अर्थ—यद्यपि मन सब इन्द्रियों में व्यापक है तथापि अपने
कार्य में उस मन का अव्यभिचार ( निश्चय ) दिखाई पड़ता है।
तथाऽशेषसंस्काराधारत्वात् ॥ ४२ ॥
अर्थ—जितने भी संस्कार हैं सबको मन ही धारण करता
है। यदि नेत्र आदि अहङ्कार अथवा मन इनको ही प्रधान मानें
तो अंधे, बहरे, इत्यादिकों को स्मरण ( याद ) की शक्ति न होना
चाहिये, लेकिन देखने में आता है, कि उन लोगों को स्मरण-