सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 192 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 86

( ८५ )
उ०—प्रकृति का कार्य, प्रकृति की सूक्ष्मता, दो प्रकार की
इंद्रियाँ, अन्तःकरण आदि का वर्णन है । इतने विषय कहे गये हैं ।
इति सांख्यदर्शने द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥
तृतीयोऽध्यायः
अब इस तीसरे अध्याय में प्रधान जो प्रकृति है उसका स्थूल
कार्य और महाभूत ( पृथ्बी आदि ) और दो तरह के शरीर यह
सब कहते हैं ।
अविशेषाद्विशेषारम्भः ॥ १ ॥
अर्थ—अविशेषात् अर्थात् जिससे छोटी और कोई वस्तु
न हो सके ऐसे भूत सूक्ष्म अर्थात् पंचतन्मात्राओं से विशेष
स्थूलमहाभूतों की उत्पत्ति होती है, क्योंकि सुखादिकों का ज्ञान
स्थूलभूतों में हो सकता है, और सूक्ष्मभूत योगी महात्माओं के
हृदय में प्रकाश होते रहते हैं ।
तस्माच्छरीरस्य ॥ २ ॥
तिन पूर्वोक्त [ पहिले कहे हुए ] बाईस तत्वों में से स्थूल
सूक्ष्म शरीरों की उत्पत्ति होती है ।
प्र०—स्थूल शरीर किसको कहते हैं ?
उ०—जिसका जाग्रतावस्था में अभिमान होता है ।
प्र०—लिङ्ग-शरीर किसको कहते हैं ?
उ०—मन, अहङ्कार और इन्द्रियाँ, जिसके द्वारा अपने अपने
काम करने में तत्पर रहते हैं, उसको लिङ्ग-शरीर कहते हैं ।
प्र०—कारण-शरीर किसको कहते हैं ?