सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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शक्ति अच्छी तरह होती है, और तत्वज्ञान के समय में मन
अहङ्कार का लय भी हो जाता है, तो भी स्मरण-शक्ति नष्ट नहीं
होती जोकि स्वाभाविक बुद्धि का धर्म है ।
स्मृत्यानुमानाच्च ॥ ४३ ॥
अर्थ—स्मृति का अनुमान बुद्धि से ही होता है, क्योंकि
चिन्ता-वृत्ति ( ध्यान की एक अवस्था ) सब अवस्थाओं से श्रेष्ठ
है, और इस सूत्र से यह भी मालूम होता है, कि कपिलाचार्य
बुद्धि और चित्त को एक ही मानते हैं, और मतवादियों की
तरह मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार, इन चारों को अन्तःकरण
चतुष्टय नहीं मानते हैं ।
प्र०—चिंतावृत्ति पुरुष को ही होनी चाहिये ?
उ०—सम्भवेन्न स्वतः ॥ ४४ ॥
अर्थ—अपने आप पुरुष को स्मृति नहीं हो सकती, क्योंकि
पुरुष कूटस्थ है ।
प्र०—जबकि मन को करण ( मुख्य इन्द्रिय ) माना है,
तो और इन्द्रियों से क्या प्रयोजन है ?
उ०—बिना नेत्रादि इन्द्रियों के मन अपना कोई भी काम
नहीं कर सकता । यदि नेत्रादि इन्द्रियों के बिना भी मन इन्द्रियों
का काम कर सकता है, तो अंधे आदमी को भी देखने की शक्ति
होनी चाहिये । क्योंकि मन तो उसके भी होता है । परन्तु संसार
में ऐसा देखने में ही नहीं आता, इससे प्रत्यक्ष सिद्ध होता है, कि
मन मुख्य है और सब इन्द्रियाँ गौण हैं ।
प्र०—जबकि मन को ही मुख्य ( प्रधान ) माना है तो
पहिले सूत्र में मन को उभयात्मक क्यों माना है ?
उ०—आपेक्षिकोगुणप्रधानभावःक्रियाविशेषात् ४५
अर्थ—क्रिया के कमती-बढ़ती होने से गुणों का भी प्रधान-