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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 192 में से

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पृष्ठ 85

( ८४ )
भाव ( बड़प्पन ) एक दूसरे की निस्बत से होता है, जैसे—
नेत्र आदि के व्यापार में अहङ्कार मुख्य है, इसी तरह अहङ्कार
के व्यापार में मन प्रधान है ।
प्र०—इस पुरुष की मन इन्द्रियाँ ही मुख्य हैं, अर्थात् अन्य
इन्द्रियाँ गौण हैं ?
उ०—तत्कर्मार्जितत्वात् तदर्थमभिचेष्टा लोक-
वत् ॥ ४६ ॥
अर्थ—जैसेकि संसार में दीखता है, कि जो आदमी कुल्हाड़ी
को खरीदता है, उस कुल्हाड़ी के व्यापार से खरीदने वाले को
फल भी होता है, इस प्रकार मन भी पुरुष के कर्मों से पैदा
होता है, अतएव मन आदि का फल पुरुष को मिलता है । इस
कारण मनुष्य की मन इंद्रिय ही मुख्य है । यह समाधान पहले
कर भी आये हैं, कि पुरुष कर्म से रहित है, लेकिन पुरुष में
कर्म का आरोपण होता है । दृष्टान्त भी इस विषय का दे चुके हैं,
जैसे—राजा के सेवक इत्यादि युद्ध करें और हार-जीत राजा
की गिनी जाती है, इस प्रकार ही पुरुष में कर्म का आरोपण
होता है ।
समानकर्मयोगे बुद्धेः प्राधान्यं लोकवल्लोकवत् ॥४७
अर्थ—यद्यपि सब इन्द्रियों के साथ पुरुष का समान कर्मयोग
है, तथापि बुद्धि ही को मुख्यता है, जैसे—राज्य के रहने वाले
चांडाल को आदि ले द्विजाति पर्यंत सब ही लोग राजा की प्रजा
हैं तथापि जमींदार से मुख्य मंत्री ही गिना जाता है । इस दृष्टान्त
को संसार परंपरा के समान यहाँ समझ लेना चाहिये ।
प्र०—लोकवत् यह शब्द दुबारा क्यों कहा ?
उ०—यह दुबारा का कहना अध्याय की समाप्ति दिखाता है ।
प्र०—इस अध्याय में कितने विषय कहे गये हैं ?