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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 192 में से

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पृष्ठ 89

( ८८ )
उ०—सप्तदशैकं लिङ्गम् ॥ ६ ॥
अर्थ—पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ, मन, अहंकार,
और पंचतन्मात्रा ( रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द ), यह सूक्ष्म
शरीर हैं।
प्र०—यदि लिङ्ग शरीर एक ही है, तो अनेक शरीरों की
आकृति ( चेष्टा ) में भेद क्यों होता है ?
उ०—व्यक्तिभेदः कर्मविशेषात् ॥ १० ॥
अर्थ—स्थूल शरीर अनेक प्रकार के अनेक कर्मों के करने
से होते हैं। अब विचार किया जाता है, तो इससे यही बात
सिद्ध होती है कि जीवों के भोग का हेतु कर्म ही हैं।
प्र०—जब कि भोगों के स्थान लिंग शरीर को ही शरीरत्व
है तो स्थूल शरीर को शरीर क्यों कहते हैं ?
उ०—तदधिष्ठानाश्रये देहे तद्वादात्ते तद्वादः ॥११॥
अर्थ—पञ्चभूतात्मक ( स्थल ) शरीर में उस लिङ्ग शरीर
का अधिष्ठान ( रहने का स्थान ) के सबब से देह वाद है, अर्थात्
लिंग शरीर का आश्रय स्थूल शरीर है, इसलिये स्थूल शरीर को
शरीर कहते हैं।
प्र०—स्थूल शरीर लिंग शरीर से दूसरा है, इसमें क्या
प्रमाण है ?
उ०—न स्वातन्त्र्यात् तदृते छायावच्चित्रवच्च ॥१२
अर्थ—वह लिङ्ग शरीर बिना किसी आश्रय के नहीं रह
सकता, जैसे—छाया किसी आश्रय के बिना नहीं रह सकती,
और तसवीर बिना आधार के नहीं खिंच सकती, इस तरह लिङ्ग
शरीर भी स्थूल शरीर के बिना नहीं ठहर सकता है ।