सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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उ०—लिङ्ग-शरीर के कारण को कारण-शरीर कहते हैं।
प्र०—बाईस तेईस तत्त्वों के बिनां संसार की उत्पत्ति नहीं
होसकती ?
उ०—तद्बीजात् संसृतिः ॥ ३ ॥
अर्थ—बाईस तत्त्व शरीर के कारण हैं, और देखने में ऐसा
ही आता है, कि कारण के बिना कार्य्य की उत्पत्ति नहीं होती,
अतः उन्हीं बाईस तत्त्वों से संसार की उत्पत्ति होती है। अब
संसार की अवधि को भी कहते हैं—
आविवेकाच्च प्रवर्त्तनमविशेषाणाम् ॥ ४ ॥
अर्थ—अविशेष जो सूक्ष्म भूत है उनकी सृष्टि प्रवृत्ति तभी
तक रहती है जब तक विवेक ( ज्ञान ) नहीं होता। ज्ञान के होते
ही सूक्ष्म भूतों की प्रवृत्ति नहीं रहती।
प्र०—यदि अविवेक के ही वास्ते सृष्टि का होना है तो
महाप्रलय में भी सृष्टि का होना योग्य है, क्योंकि उस अवस्था
में भी अविवेक बना रहता है ?
उ०—उपभोगादितरस्य ॥ ५ ॥
अर्थ—जब अविवेक के कार्य्य प्रारब्ध का उपभोग पूरा होजाता
है, तब ही महाप्रलय होती है। जबकि अविवेक का भोग ही
विशेष रहा है। तब सूक्ष्म-भूत इस शरीर को क्यों उत्पन्न करेंगे ?
और महाप्रलयावस्था में प्रारब्ध कर्म का भोग नाश होजाता है
तब भी संचित कर्म बने रहते हैं, क्योंकि कर्म प्रवाह से अनादि हैं।
सम्प्रति परिमुक्तो द्वाभ्याम् ॥ ६ ॥
अर्थ—सृष्टि समय में पुरुष दोनों वासना और भोग-बद्ध
होता है।