सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—७४ देवता—अग्नि

शकेम रायः सुधरो यमं तेऽधि श्रवो देवभक्तं दधानाः.. (१०)
हे अग्नि! हमारे समस्त स्तोत्र तुम्हारे मन और अंतःकरण को प्रिय हों. हम देवों के भोग
करने योग्य धन तुम में स्थापित करके तुम्हारे उस धन की रक्षा करना चाहते हैं जो हमारी
दरिद्रता मिटा सके. (१०)
सूक्त—७४ देवता—अग्नि
उपप्रयन्तो अध्वरं मन्त्रं वोचेमाग्नये. आरे अस्मे च शृण्वते.. (१)
दूर रहकर भी हमारी स्तुतियां सुनने वाले एवं यज्ञ में शीघ्रता से उपस्थित होने वाले
अग्नि की हम स्तुति करते हैं. (१)
यः स्नीहितीषु पूर्व्यः संजग्मानासु कृष्टिषु. अरक्षद्दाशुषे गयम्.. (२)
शत्रु भाव से पूर्ण एवं हत्या करने में प्रवृत्त प्रजाओं के मध्य स्थित हवि देने वाले यजमान
के धन के रक्षक अग्नि की हम स्तुति करते हैं. (२)
उत ब्रुवन्तु जन्तव उदग्निर्वृत्रहाजनि. धनञ्जयो रणेरणे.. (३)
शत्रुनाशक एवं संग्राम में शत्रु के धन पर अधिकार करने वाले अग्नि के उत्पन्न होते ही
सब लोग उनकी स्तुति करें. (३)
यस्य दूतो असि क्षये वेषि हव्यानि वीतये. दस्मत्कृणोष्यध्वरम्.. (४)
हे अग्नि! जिस यजमान के यज्ञगृह में तुम देवदूत बनकर आते हो एवं उन देवों के भोग
के लिए हवि ग्रहण करके यज्ञ की शोभा बढ़ाते हो. (४)
तमित्सुहव्यमङ्गिरः सुदेवं सहसो यहो. जना आहुः सुबर्हिषम्.. (५)
हे बलपुत्र अग्नि! उसी यजमान को सब लोग शोभन हविसंपन्न, सुंदर देवों वाला एवं
उत्तम यज्ञयुक्त कहते हैं. (५)
आ च वहासि ताँ इह देवाँ उप प्रशस्तये. हव्या सुश्चन्द्र वीतये.. (६)
हे शोभन एवं आह्लादक अग्नि! हमारी स्तुति स्वीकार करने के लिए इस यज्ञ में देवों को
हमारे समीप ले आओ एवं उनके भक्षण के लिए हव्य प्रदान करो. (६)
न योरुपब्दिरश्व्यः शृण्वे रथस्य कच्चन. यदग्ने यासि दूत्यम्.. (७)
हे अग्नि! जब तुम देवों के दूत बनकर जाते हो तो शीघ्र चलने के कारण तुम्हारे रथ का
eBook converter DEMO Watermarks*

शब्द नहीं सुनाई पड़ता. (७)
त्वोतो वाज्यह्रयोऽभि पूर्वस्मादपरः. प्र दाश्वाँ अग्ने अस्थात्.. (८)
हे अग्नि! निकृष्ट पुरुष भी तुम्हें हव्यदान करके तुम्हारे द्वारा रक्षित अन्न का स्वामी एवं
ऐश्वर्यशाली बन जाता है. (८)
उत द्युमत्सुवीर्यं बृहदग्ने विवाससि. देवेभ्यो देव दाशुषे.. (९)
हे प्रकाशमान अग्नि! देवों को हव्य देने वाले यजमान को प्रौढ़, दीप्त एवं शक्तिसंपन्न
धन दो. (९)
सूक्त—७५ देवता—अग्नि
जुषस्व सप्रथस्तमं वचो देवप्सरस्तमम्. हव्या जुह्वान आसनि.. (१)
हे अग्नि देव! अपने मुख में हव्य ग्रहण करते हुए देवों को भली प्रकार प्रसन्न करो एवं
हमारी विस्तीर्ण स्तुतियां स्वीकार करो. (१)
अथा ते अङ्गिरस्तमाग्ने वेधस्तम प्रियम्. वोचेम ब्रह्म सानसि.. (२)
हे अंगिरागोत्रीय ऋषियों एवं मेधावियों में श्रेष्ठ अग्नि! हम तुम्हारे ग्रहण करने योग्य एवं
प्रसन्नतादायक स्तोत्र का उच्चारण करते हैं. (२)
कस्ते जामिर्जनानामग्ने को दाश्वध्वरः. को ह कस्मिन्नसि श्रितः.. (३)
हे अग्नि! मनुष्यों के बीच में तुम्हारा बंधु कौन है? कौन तुम्हारा यज्ञ करने में समर्थ है?
अर्थात् कोई नहीं. तुम कौन हो और कहां रहते हो? (३)
त्वं जामिर्जनानामग्ने मित्रो असि प्रियः. सखा सखिभ्य ईड्यः.. (४)
हे अग्नि! तुम सबके बंधु एवं प्रिय मित्र हो. तुम मित्रों के स्तुति योग्य मित्र हो. (४)
यजा नो मित्रावरुणा यजा देवाँ ऋतं बृहत्. अग्ने यक्षि स्वं दमम्.. (५)
हे अग्नि! हमारे निमित्त मित्र, वरुण एवं अन्य देवों को लक्ष्य करके यजन करो. तुम
विशाल एवं यथार्थ फल वाले यज्ञ को पूरा करने के लिए अपने यज्ञगृह में जाओ. (५)
सूक्त—७६ देवता—अग्नि
का त उपेतिर्मनसो वराय भुवदग्ने शंतमा का मनीषा.
ebook converter DEMO Watermarks*

को वा यज्ञैः परि दक्षं त आप केन वा ते मनसा दाशेम.. (१)
हे अग्नि! हमारे प्रति तुम्हारा मन प्रसन्न होने का क्या उपाय है? तुम्हें सुख देने वाली
स्तुति कैसी होगी? तुम्हारी क्षमता के अनुकूल यज्ञ कौन यजमान कर सकता है? हम किस
मन से तुम्हें हव्य प्रदान करें? (१)
एह्यग्न इह होता नि षीदादब्धः सु पुरएता भवा नः.
अवतां त्वा रोदसी विश्वमिन्वे यजा महे सौमनसाय देवान्.. (२)
हे अग्नि! इस यज्ञ में आओ और देवों के आह्वानकर्त्ता बनकर बैठो. राक्षसादि तुम्हारी
हिंसा नहीं कर सकते, इसलिए तुम हमारे अग्रगामी नेता बनो. तुम समस्त आकाश एवं धरती
द्वारा रक्षित होकर देवों को परम प्रसन्न करने के लिए हवि द्वारा उनकी पूजा करो. (२)
प्र सु विश्वान्रक्षसो धक्ष्यग्ने भवा यज्ञानामभिशस्तिपावा.
अथा वह सोमपतिं हरिभ्यामातिथ्यमस्मै चकृमा सुदाव्ने.. (३)
हे अग्नि! समस्त राक्षसों को भली प्रकार नष्ट करके हिंसा से यज्ञ की रक्षा करो. संपूर्ण
सोमरसों के पालनकर्त्ता इंद्र को उसके हरि नामक अश्वों सहित इस यज्ञ में लाओ, क्योंकि हम
शोभन फलदाता इंद्र का अतिथि सत्कार करेंगे. (३)
प्रजावता वचसा वह्निरासा च हुवे नि च सत्सीह देवैः.
वेषि होत्रमुत पोत्रं यजत्र बोधि प्रयन्तर्जनितर्वसूनाम्.. (४)
मैं मुख द्वारा हव्य ग्रहण करने वाले अग्नि का आह्वान ऐसे स्तोत्रों द्वारा करता हूं जो
संतान आदि फल देने में समर्थ हैं. हे यज्ञकर्म योग्य अग्नि! तुम अन्य देवों के साथ बैठो एवं
होता तथा पोता द्वारा किए जाने वाले कर्म करो. तुम धन के स्वामी एवं सबके जन्मदाता
बनकर हमें जगाओ. (४)
यथा विप्रस्य मनुषो हविर्भिर्देवाँ अयजः कविभिः कविः सन्.
एवा होतः सत्यतर त्वमद्याग्ने मन्द्रया जुह्वा यजस्व.. (५)
हे अग्नि! तुमने क्रांतदर्शी बनकर मेधावी ऋत्विजों के साथ जिस प्रकार मेधावी मनु के
यज्ञ में हव्य द्वारा देवों की पूजा की थी, हे यज्ञ संपन्नकर्त्ता साधु अग्नि! इसी प्रकार तुम इस
यज्ञ में देवों की पूजा आनंददायक जुहू नामक स्रुक् द्वारा करो. (५)
सूक्त—७७ देवता—अग्नि
कथा दाशेमाग्नये कास्मै देवजुष्टोच्यते भामिने गीः.
यो मर्त्येष्वमृत ऋतावा होता यजिष्ठ इत्कृणोति देवान्.. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*

मरणरहित, सत्ययुक्त, देवों का आह्वान करने वाले, यज्ञ पूर्ण कराने वाले एवं मनुष्यों के
बीच निवास करके भी देवों को हवियुक्त करने वाले अग्नि के अनुरूप हव्य हम कैसे दे
सकेंगे? हम तेजस्वी अग्नि के प्रति देवोचित स्तुति किस प्रकार करेंगे. (१)
यो अध्वरेषु शंतम ऋतावा होता तमू नमोभिरा कृणुध्वम्.
अग्निर्यद्देर्मर्त्ताय देवान्त्स चा बोधाति मनसा यजाति.. (२)
हे यजमानो! जो अग्नि यज्ञों में अतिशय सुखकारी, यथार्थदर्शी और देवों का आह्वान
करने वाले हैं, उन्हें स्तुतियों द्वारा हमारे अभिमुख करो. जिस समय अग्नि यजमान के निमित्त
देवों के समीप जाते हैं, उस समय वे देवों को यज्ञपात्र जानकर मन से उनकी पूजा करते हैं.
(२)
स हि क्रतुः स मर्यः स साधुर्मित्रो न भूदद्भुतस्य रथीः.
तं मेधेषु प्रथमं देवयन्तीर्विश उप ब्रुवते दस्ममारीः.. (३)
देवों की अभिलाषा करने वाली प्रजाएं यज्ञकर्त्ता, विश्वसंहारक, उत्पादनकर्त्ता, मित्र के
समान अप्राप्त धन के प्राप्त कराने वाले एवं दर्शनीय अग्नि के समीप जाकर उन्हें यज्ञ का
प्रधान देव मानतीं एवं उनकी स्तुति करती हैं. (३)
स नो नॄणां नृतमो रिशादा अग्निर्गिरोऽवसा वेतु धीतिम्.
तना च ये मघवानः शविष्ठा वाजप्रसूता इषयन्त मन्म.. (४)
यज्ञ के नेताओं के मध्य अतिशय नेता एवं शत्रुओं के भक्षणकर्त्ता अग्नि हमारी स्तुतियों
एवं हव्य से युक्त यज्ञ की कामना करें. जो धनी और शक्तिशाली यजमान हव्य प्रदान करके
अग्नि के मननीय स्तोत्र को करना चाहते हैं, अग्नि भी उनकी स्तुति की कामना करें. (४)
एवाग्निर्गोतमेभिर्ऋतावा विप्रेभिरस्तोष्ट जातवेदाः.
स एषु द्युम्नं पीपयत्स वाजं स पुष्टिं याति जोषमा चिकित्वान्.. (५)
यज्ञ के स्वामी एवं सर्वज्ञाता अग्नि की गौतम आदि ऋषियों ने इसी प्रकार स्तुति की थी.
अग्नि ने प्रसन्न होकर उन ऋषियों का तेजस्वी सोम पिया था एवं अन्न भक्षण किया था. वे
अग्नि हमारे द्वारा दिए हव्य को जानकर पुष्ट होते हैं. (५)
सूक्त—७८ देवता—अग्नि
अभि त्वा गोतमा गिरा जातवेदो विचर्षणे. द्युम्नैरभि प्र णोनुमः.. (१)
हे जातवेद एवं सर्वदर्शक अग्नि! गौतम ऋषि ने तुम्हारी स्तुति की थी. हम भी तुम्हारे
गुणप्रकाशक मंत्रों से बार-बार तुम्हारी स्तुति करते हैं. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*

तमु त्वा गोतमो गिरा रायस्कामो दुवस्यति. द्युम्नैरभि प्र णोनुमः.. (२)
धन की इच्छा वाले गौतम ऋषि जिस अग्नि की स्तोत्र द्वारा सेवा करते हैं, हम भी
गुणप्रकाशक स्तोत्र द्वारा उसी अग्नि की बार-बार स्तुति करते हैं. (२)
तमु त्वा वाजसातममङ्गिरस्वद्धवामहे. द्युम्नैरभि प्र णोनुमः.. (३)
हे अग्नि! हम अंगिरा ऋषि के समान सर्वाधिक अन्न देने वाले तुम्हें बुलाते हैं एवं तुम्हारे
गुणप्रकाशक मंत्रों से बार-बार स्तुति करते हैं. (३)
तमु त्वा वृत्रहन्तमं यो दस्यूंरवधूनुषे. द्युम्नैरभि प्र णोनुमः.. (४)
हे अग्नि! तुम दस्युओं एवं अनार्यों को स्थानच्युत करो. हम सर्वापेक्षा शत्रुहंता तुम्हारी
स्तुति तुम्हारे गुण प्रकाशक मंत्रों से बार-बार करते हैं. (४)
अवोचाम रहूगणा अग्नये मधुमद्वचः. द्युम्नैरभि प्र णोनुमः.. (५)
मैं रहूगणवंशीय गौतम अग्नि के प्रति मधुरवचनों का प्रयोग करता हुआ गुणप्रकाशक
स्तोत्र द्वारा उनकी बार-बार स्तुति करता हूं. (५)
सूक्त—७९ देवता—अग्नि
हिरण्यकेशो रजसो विसारेऽहिर्धुनिर्वात इव ध्रजीमान्.
शुचिभ्राजा उषसो नवेदा यशस्वतीरपस्युवो न सत्याः.. (१)
हिरण्यकेश विद्युतरूप अग्नि मेघों को कंपित करने वाले, वायु के समान शीघ्रगतियुक्त
एवं शोभनदीप्ति वाले बनकर मेघ से जल बरसाना जानते हैं, अन्नयुक्त, अपने काम में लगी
हुई एवं सीधीसादी प्रजाओं के समान उषा यह कार्य नहीं जानती. (१)
आ ते सुपर्णा अमिनन्तँ एवैः कृष्णो नोनाव वृषभो यदीदम्.
शिवाभिर्न स्मयमानाभिरागात्पतन्ति मिहः स्तनयन्त्यभ्रा.. (२)
हे अग्नि! तुम्हारी शोभन पतनशील किरणें मरुतों के साथ मिलकर वर्षा के उद्देश्य से
मेघों को ताड़ित करती हैं. तभी कृष्ण वर्ण एवं वर्षाकारी मेघ गरजता है और सुखकारिणी
तथा हंसती हुई सी श्वेत बूंदों के साथ आता है, फिर पानी गिरता है और बादल गरजता है.
(२)
यदीमृतस्य पयसा पियानो नयन्नृतस्य पथिभी रजिष्ठैः.
अर्यमा मित्रो वरुणः परिज्मा त्वचं पृञ्चन्त्युपरस्य योनौ.. (३)
ebook converter DEMO Watermarks*

जब ये अग्नि उदक के रस से संसार को भिगोते हैं एवं स्नान, पान आदि के रूप में जल
के उपयोग का सरल उपाय बताते हैं, उस समय अर्यमा, मित्र, वरुण एवं चारों ओर गतिशील
मरुद्गण मेघ के जलोत्पत्ति स्थान के आच्छादन को नष्ट करते हैं. (३)
अग्ने वाजस्य गोमत ईशानः सहसो यहो.
अस्मे धेहि जातवेदो महि श्रवः.. (४)
हे शक्तिपुत्र अग्नि! तुम बहुसंख्यक गायों से युक्त अन्न के स्वामी हो. हे जातवेद! हमें
पर्याप्त अन्न दो. (४)
स इधानो वसुष्कविरग्निरीळेन्यो गिरा. रेवदस्मभ्यं पुर्वणीक दीदिहि.. (५)
हे दीपनशील, सबको निवास देने वाले, क्रांतदर्शी, स्तोत्र द्वारा प्रशंसनीय एवं अनेक
ज्वाला युक्त अग्नि! तुम इस प्रकार दीप्त बनो, जिस प्रकार हमारे पास धनयुक्त अन्न हो सके.
(५)
क्षपो राजन्नुत त्मनाग्ने वस्तोरुतोषसः. स तिग्मजम्भ रक्षसो दह प्रति.. (६)
हे तेजस्वी अग्नि! दिवस अथवा रात्रि में अपने आप या अपने पुरुषों द्वारा राक्षस आदि
को बाधित करो. हे तीक्ष्णमुख! प्रत्येक राक्षस को जलाओ. (६)
अवा नो अग्न ऊतिभिर्गायत्रस्य प्रभर्मणि. विश्वासु धीषु वन्द्य.. (७)
हे समस्त यज्ञकर्मों में वंदनीय अग्नि! हमारे गायत्री छंद वाले सूक्त के संपादन के कारण
प्रसन्न होकर हमारी रक्षा करो. (७)
आ नो अग्ने रयिं भर सत्रासाहं वरेण्यं. विश्वासु पृत्सु दुष्टरम्.. (८)
हे अग्नि! हमें दारिद्र्य का अविलंब विनाश करने वाला, वरणीय एवं समस्त संग्रामों में
शत्रुओं द्वारा दुस्तर धन दो. (८)
आ नो अग्ने सुचेतुना रयिं विश्वायुपोषसम्. मार्डीकं धेहि जीवसे.. (९)
हे अग्नि! हमारे जीवन के लिए शोभन ज्ञानयुक्त, सुखहेतु, संपूर्ण आयु पर्यंत देह आदि
का पोषक धन प्रदान करो. (९)
प्र पूतास्तिग्मशोचिषे वाचो गोतमाग्नये. भरस्व सुम्नयुर्गिरः.. (१०)
हे शोभन धन के अभिलाषी गौतम! विशुद्ध वचनों से तीक्ष्ण ज्वालाओं वाले अग्नि की
स्तुति करो. (१०)
यो नो अग्नेऽभिदासत्यन्ति दूरे पदीष्ट सः. अस्माकमिद्वृधे भव.. (११)
ebook converter DEMO Watermarks*

हे अग्नि! जो शत्रु हमारे समीप या दूर रहकर हमें हानि पहुंचाता है, उसे नष्ट करके
हमारी वृद्धि करो. (११)
सहस्राक्षो विचर्षणििरग्नी रक्षांसि सेधति. होता गृणीत उक्थ्यः.. (१२)
असंख्य ज्वालाओं वाले एवं सबको विशेष रूप से देखने वाले अग्नि राक्षसों को
यज्ञभूमि से भगाते हैं, वे हमारे द्वारा स्तोत्रों की सहायता से स्तुत होकर देवों को बुलाते एवं
उनकी स्तुति करते हैं. (१२)
सूक्त-८० देवता—इंद्र
इत्था हि सोम इन्मदे ब्रह्मा चकार वर्धनम्.
शविष्ठ वज्रिन्नोजसा पृथिव्या निः शशा अहिार्चन्ननु स्वराज्यम्.. (१)
हे अतिशय शक्तिशाली एवं वज्रधारी इंद्र! जब तुमने प्रसन्नतादायक सोमरस पी लिया
तो स्तोता ने तुम्हारी वृद्धि करने वाली स्तुतियां कीं इसीलिए तुमने अपनी शक्ति से धरती पर
खड़े होकर अहि नामक राक्षस को पीटते हुए अपना अधिकार प्रकट किया था. (१)
स त्वामदद्वृषा मदः सोमः श्येनाभृतः सुतः.
येना वृत्रं निरद्भ्यो जघन्थ वज्रिन्नोजसार्चन्ननु स्वराज्यम्.. (२)
हे इंद्र! गीले करने वाले मादक श्येन पक्षी का रूप धारण करने वाली गायत्री द्वारा लाए
गए एवं निचोड़े हुए सोमरस ने तुम्हें प्रसन्न किया था. हे वज्री! तुमने अपना अधिकार प्रकट
करते हुए अपनी शक्ति से आकाश में वृत्र राक्षस को मारा था. (२)
प्रेह्यभीहि धृष्णुहि न ते वज्रो नि यंसते.
इन्द्र नृम्णं हि ते शवो हनो वृत्रं जया अपोऽर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (३)
हे इंद्र! जाओ और शत्रुओं के सामने पहुंचकर उन्हें हराओ कोई भी न तो तुम्हारे वज्र
का नियमन कर सकता है और न तुम्हारी शक्ति को अभिभूत करने में समर्थ है, इसलिए तुम
वृत्र राक्षस का वध करके उसके द्वारा रोके हुए जल को प्राप्त करो एवं अपने प्रभुत्व का
प्रदर्शन करो. (३)
निरिन्द्र भूम्या अधिं वृत्रं जघन्थ निर्दिवः.
सृजा मरुत्वतीरव जीवधन्या इमा अपोऽर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (४)
हे इंद्र! तुमने धरती और आकाश के ऊपर वृत्र का वध किया था तथा अपना प्रभुत्व
स्पष्ट करते हुए मरुद्गणों से युक्त एवं जीवों को तृप्त करने वाला जल बरसाया था. (४)
इन्द्रो वृत्रस्य दोधतः सानुं वज्रेण हीळितः.
ebook converter DEMO Watermarks*