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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—५ देवता—इंद्र

हे सौ यज्ञ करने वाले इंद्र! तुम युद्ध में बलप्रदर्शन करने वाले हो. हम धन पाने के लिए
तुम्हें यज्ञ में हवि देते हैं. (९)
यो रायोऽवनिर्महान्त्सुपारः सुन्वतः सखा. तस्मा इन्द्राय गायत.. (१०)
हे ऋत्विज्! जो इंद्र धन का रक्षक, गुणसंपन्न, सुंदर कार्यों को पूर्ण करने वाला तथा
यजमान का मित्र है, उसी को प्रसन्न करने के लिए स्तुति करो. (१०)
सूक्त—५ देवता—इंद्र
आ त्वेता नि षीदतेन्द्रमभि प्र गायत. सखायः स्तोमवाहसः.. (१)
हे स्तुति करने वाले मित्रो! शीघ्र आओ और यहां बैठो. तुम लोग इंद्र की स्तुति करो. (१)
पुरुतमं पुरूणामीशानं वार्याणाम्. इन्द्रं सोमे सचा सुते.. (२)
सोमरस तैयार हो जाने पर सब लोग एकत्र हो जाओ और शत्रुओं का नाश करने वाले
एवं श्रेष्ठ धनों के स्वामी इंद्र की स्तुति करो. (२)
स घा नो योग आ भुवत् स राये स पुरन्ध्याम्. गमद् वाजेभिरा स नः.. (३)
वह ही इंद्र हमारे अभावों को पूरा करें, हमें धन दें, अनेक प्रकार की बुद्धि प्रदान करें
और भांति-भांति के अन्न लेकर हमारे पास आवें. (३)
यस्य संस्थे न वृण्वते हरी समत्सु शत्रवः. तस्मा इन्द्राय गायत.. (४)
युद्ध में जिस इंद्र के घोड़ों सहित रथ को देखकर शत्रु भाग जाते हैं, उन्हीं इंद्र की स्तुति
करो. (४)
सुतपाव्ने सुता इमे शुचयो यन्ति वीतये. सोमासो दध्याशिरः.. (५)
यह पवित्र और विशुद्ध सोमरस यज्ञ में सोमपान करने वाले के समीप पीने हेतु अपने
आप पहुंच जाता है. (५)
त्वं सुतस्य पीतये सद्यो वृद्धो अजायथाः. इन्द्र ज्यैष्ठ्याय सुक्रतो.. (६)
हे सुंदर कर्म करने वाले इंद्र! तुम सभी देवों में बड़े होने के कारण सोमपान करने के
लिए सबसे अधिक उत्साहित रहते हो. (६)
आ त्वा विशन्त्वाशवः सोमास इन्द्र गिर्वणः. शं ते सन्तु प्रचेतसे.. (७)
हे स्तुतियों के लक्ष्य इंद्र! तीनों सवन नामक यज्ञों में व्याप्त सोमरस तुम्हें मिले. यह सोम
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उच्चज्ञान की प्राप्ति में तुम्हारा सहायक एवं कल्याणकारी प्राप्त हो. (७)
त्वां स्तोमा अवीवृधन् त्वामुक्था शतक्रतो. त्वां वर्धन्तु नो गिर:... (८)
हे सौ यज्ञ करने वाले इंद्र! ऋग्वेद के मंत्रों एवं सोम-संबंधी मंत्रों ने तुम्हारी प्रशंसा की है.
हमारी स्तुतियां भी तुम्हारी प्रतिष्ठा बढ़ावें. (८)
अक्षितोति: सनेदिमं वाजमिन्द्रः सहस्रिणम्. यस्मिन् विश्वानि पौंस्या.. (९)
रक्षा में सदा तत्पर रहने वाले इंद्र इस हजार संख्या वाले सोम रूपी अन्न को ग्रहण करें.
इसी में समस्त शक्तियां रहती हैं. (९)
मा नो मर्ता अभि द्रुहन् तनूनामिन्द्र गिर्वणः. ईशानो यवया वधम्.. (१०)
हे स्तुति करने के योग्य इंद्र! तुम शक्तिशाली हो. तुम ऐसी कृपा करना कि हमारे शत्रु
हमारे शरीर पर चोट न कर सकें. तुम उन्हें हमारा वध करने से रोकना. (१०)
सूक्त—६ देवता—इंद्र एवं मरुद्गण
युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः. रोचन्ते रोचना दिवि.. (१)
जो इंद्र तेजस्वी सूर्य के रूप में, अहिंसक अग्नि के रूप में तथा सर्वत्र गतिशील वायु के
रूप में स्थित हैं, सब लोकों में निवास करने वाले प्राणी उन्हीं इंद्र से संबंध रखते हैं. उन्हीं इंद्र
की मूर्ति आकाश में नक्षत्रों के रूप में चमकती है. (१)
युञ्जन्त्यस्य काम्या हरी विपक्षसा रथे. शोणा धृष्णू नृवाहसा.. (२)
सारथि उन इंद्र के रथ में हरि नाम के सुंदर, रथ के दोनों ओर जोड़ने योग्य, लाल रंग के
और शक्तिशाली दो घोड़ों को जोड़ते हैं. वे घोड़े इंद्र एवं उनके सारथि को ढोने में समर्थ हैं.
(२)
केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे. समुषद्भिरजायथा:... (३)
हे मनुष्यो! यह आश्चर्य देखो कि यह इंद्र रात को बेहोश प्राणियों को प्रातः होश में लाते
हुए और रात में अंधकार के कारण रूपहीन पदार्थों को प्रातः रूप प्रदान करते हुए सूर्य रूप
में किरणें बिखेरते हैं. (३)
आदह स्वधामनु पुनर्गर्भत्वमेरिरे. दधाना नाम यज्ञियम्.. (४)
इसके पश्चात् मरुद्गण ने यज्ञ के योग्य नाम धारण करके अपने प्रतिवर्ष के नियम के
अनुसार बादलों में जलरूपी गर्भ को प्रेरित किया है. (४)
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वीळु चिदारुजत्नुभिर्गुहा चिदिन्द्र वह्निभिः. अविन्द उस्रिया अनु.. (५)
हे इंद्र! तुमने मरुद्गण के साथ मिलकर गुफा में छिपाई हुई गायों को खोजकर वहां से
निकाला. वे मरुद्गण दृढ़ स्थान को भी भेदन करने एवं एक स्थान की वस्तु को दूसरी जगह
में ले जाने में समर्थ हैं. (५)
देवयन्तो यथा मतिमच्छा विदद्वसुं गिरः. महामनूषत श्रुतम्.. (६)
स्तुति करने वाले लोग स्वयं देवभाव प्राप्त करने की इच्छा से धन के स्वामी, शक्तिशाली
एवं विख्यात मरुद्गण को लक्ष्य करके उसी प्रकार स्तुति कर रहे हैं, जिस प्रकार वे इंद्र की
स्तुति करते हैं. (६)
इन्द्रेण सं हि दृक्षसे सञ्जग्मानो अबिभ्युषा. मन्दू समानवर्चसा.. (७)
हे मरुद्गण! भयरहित इंद्र के साथ तुम्हारी बहुत घनिष्ठता देखी जाती है. तुम दोनों
नित्य प्रसन्न और समान तेज वाले हो. (७)
अनवद्यैरभिद्युभिर्मखः सहस्वदर्चति. गणैरिन्द्रस्य काम्यैः.. (८)
यह यज्ञ दोषरहित, देवलोक में निवास करने वाले तथा फल देने के कारण कामना
करने योग्य मरुद्गण के साथ होने के कारण इंद्र को बलवान् समझकर पूजा-अर्चना करता
है. (८)
अतः परिज्मन्ना गहि दिवो वा रोचनादधि. समस्मिन्नृञ्जते गिरः.. (९)
हे चारों ओर व्यापक मरुद्गण! तुम द्युलोक, आकाश या दीप्त सूर्य मंडल से इस यज्ञ में
आओ. पुरोहित-समूह इस यज्ञ में तुम्हारी भली प्रकार स्तुति कर रहा है. (९)
इतो वा सातिमीमहे दिवो वा पार्थिवादधि. इन्द्रं महो वा रजसः.. (१०)
हम इंद्र देव की प्रार्थना इसीलिए करते हैं कि वे पृथ्वीलोक, आकाश या वायुलोक से
हमें धन प्रदान करते हैं. (१०)
सूक्त—७ देवता—इंद्र
इन्द्रमिद् गाथिनो बृहदिन्द्रमर्केभिरर्किणः. इन्द्रं वाणीरनूषत.. (१)
सामवेद का गान करने वालों ने सामगान के द्वारा, ऋग्वेद का पाठ करने वालों ने
ऋचाओं द्वारा और यजुर्वेद का पाठ करने वालों ने मंत्रों द्वारा इंद्र की स्तुति की है. (१)
इन्द्र इद्धर्योः सचा सम्मिश्ल आ वचोयुजा. इन्द्रो वज्री हिरण्ययः.. (२)
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वज्र धारण करने वाले एवं सर्वाभरणभूषित इंद्र अपने आज्ञाकारी दोनों घोड़ों को
अत्यंत शीघ्र रथ में जोतकर सबके साथ मिल जाते हैं. (२)
इन्द्रो दीर्घाय चक्षस आ सूर्यं रोहयद् दिवि. वि गोभिरद्रिमैरयत्.. (३)
इंद्र ने मनुष्यों को निरंतर देखने के लिए सूर्य को आकाश में स्थापित किया है. सूर्य
अपनी किरणों द्वारा पर्वत आदि समस्त संसार को प्रकाशित कर रहे हैं. (३)
इन्द्र वाजेषु नोऽव सहस्रप्रधनेषु च. उग्र उग्राभिरूतिभिः.. (४)
हे शत्रुओं द्वारा न हारने वाले इंद्र! अपनी अमोघ रक्षण शक्ति के द्वारा ऐसे महायुद्धों में
हमारी रक्षा करो जो हजारों गजों, अश्वों आदि का लाभ देने वाले हों. (४)
इन्द्रं वयं महाधन इन्द्रमर्भे हवामहे. युजं वृत्रेषु वज्रिणम्.. (५)
इंद्र हमारी सहायता करने वाले तथा धन-लाभ का विरोध करने वाले हमारे शत्रुओं के
लिए वज्रधारी हैं. हम स्वल्प अथवा विपुल धन पाने के लिए हम इंद्र का आह्वान करते हैं.
(५)
स नो वृषन्नमुं चरुं सत्रादावन्नपा वृधि. अस्मभ्यमप्रतिष्कुतः.. (६)
हे इंद्र! तुम हमारे लिए इच्छित फल देने वाले तथा वृष्टि प्रदान करने वाले हो. तुम हमारे
लाभ के लिए उस मेघ का मर्दन करो. तुमने कभी भी हमारी प्रार्थना अस्वीकार नहीं की है.
(६)
तुञ्जेतुञ्जे य उत्तरे स्तोमा इन्द्रस्य वज्रिणः. न विन्धे अस्य सुष्टुतिम्.. (७)
भिन्न-भिन्न फल देने वाले देवताओं के लिए जिन उत्तम स्तुतियों का प्रयोग किया जाता
है, वे सब वज्र धारण करने वाले इंद्र के लिए हैं. इंद्र के अनुरूप स्तुति को मैं नहीं जानता. (७)
वृषा यूथेव वंशगः कृष्टीरियर्त्योजसा. ईशानो अप्रतिष्कुतः.. (८)
जिस प्रकार तेज चाल वाला बैल धेनु समूह को अपने बल से अनुगृहीत करता है, उसी
प्रकार इच्छाओं को पूरा करने वाले इंद्र मनुष्यों को शक्तिशाली बनाते हैं. इंद्र समर्थ हैं एवं
किसी की प्रार्थना को ठुकराते नहीं हैं. (८)
य एकश्चर्षणीनां वसूनामिरज्यति. इन्द्रः पञ्च क्षितीनाम्.. (९)
इंद्र समस्त मानवों, संपत्तियों और पंच-क्षितियों पर निवास करने वाले वर्णों पर शासन
करने वाले हैं. (९)
इन्द्रं वो विश्वतस्परि हवामहे जनेभ्यः. अस्माकमस्तु केवलः.. (१०)
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