ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—५६ देवता—मरुद्गण
हे मरुतो! तुम हमें ऐश्वर्य के समीप ले आओ एवं हमारी स्तुतियों से प्रसन्न होकर हमें
पाप से दूर करो. हे यज्ञपात्र मरुतो! तुम हमारा दिया हुआ हव्य स्वीकार करो. हम लोग
विविध संपत्तियों के स्वामी बनें. (१०)
सूक्त—५६ देवता—मरुद्गण
अग्ने शर्धन्तमा गणं पृक्षं रुक्मेभिरञ्जिभिः.
विशो अद्य मरुतामव ह्वये दिवश्चिद्रोचनादधि.. (१)
हे अग्नि! चमकते हुए आभरणों से युक्त एवं शत्रुओं को हराने में कुशल मरुतों के गणों
को आज बुलाओ. हम आज दीप्तिशाली स्वर्ग से अपने सामने उपस्थित होने के लिए मरुतों
को बुलाते हैं. (१)
यथा चिन्मन्यसे हृदा तदिन्मे जग्मुराशसः.
ये ते नेदिष्ठं हवनान्यागमन्तान्वधं भीममन्दृशः.. (२)
हे अग्नि! जिस प्रकार तुम हृदय में मरुतों के प्रति पूजा का भाव रखते हो, उसी प्रकार
वे हमारे समीप शुभकामनाएं लेकर आवें. जो केवल पुकार सुनकर तुम्हारे समीप आ जाते हैं,
ऐसे भयानक दीखने वाले मरुतों को हव्य देकर बढ़ाओ. (२)
मीळहुष्मतीव पृथिवी पराहता मदन्त्येत्यस्मदा.
ऋक्षो न वो मरुतः शिमीवाँ अमो दुध्रो गौरिव भीमयुः.. (३)
धरती पर रहने वाली एवं प्रबल राजा वाली प्रजा जिस प्रकार दूसरे से पीड़ित होकर
अपने स्वामी के समीप जाती है, उसी प्रकार मरुतों का प्रसन्न समूह हमारे पास आता है. हे
मरुतो! तुम्हारा समूह अग्नि के समान कुशल एवं भीषण बैलों से युक्त गौ के समान दुर्धर्ष हो.
(३)
नि ये रिणन्त्योजसा वृथा गावो न दुर्धुरः.
अश्मानं चित्स्वर्यं१ पर्वतं गिरिं प्र च्यावयन्ति यामभिः.. (४)
मरुद्गण दुर्धर्ष बैल के समान अपने ही ओज से शत्रुओं का नाश करते हैं. वे गरजने
वाले, व्याप्त एवं जलवर्षा द्वारा संसार को प्रसन्न करने वाले मेघों को अपने गमन द्वारा बरसने
को विवश करते हैं. (४)
उत्तिष्ठ नूनमेषां स्तोमैः समुक्षितानाम्. मरुतां पुरुतममपूर्व्यं गवां सर्गमिव ह्वये.. (५)
हे मरुतो! उठो. हम स्तोत्रों द्वारा उन्नति प्राप्त, अतिशय महान् व जलराशि के समान
अपूर्व मरुतों को बुलाते हैं. (५)
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युङ्ग्ध्वं ह्यरुषी रथे युङ्ग्ध्वं रथेपु रोहितः.
युङ्ग्ध्वं हरी अजिरा धुरि वोळ्हवे वहिष्ठा धुरि वोळ्हवे.. (६)
हे मरुतो! तुम अपने रथों में चमकीले रंग की घोड़ियों अथवा लाल रंग के घोड़ों को
जोड़ो. बोझा ढोने में मजबूत हरि नामक शीघ्रगामी घोड़ों को तुम बोझा ढोने में लगाओ. (६)
उत स्य वाज्यरुषस्तुविष्वाणिरिह स्म धायि दर्शतः.
मा वो यामेषु मरुतश्चिरं करतप्र तं रथेषु चोदत.. (७)
हे मरुतो! तुम्हारे रथ में जुड़े हुए दीप्तिशाली, जोर से शब्द करने वाले एवं सुंदर घोड़े
तुम्हारे द्वारा इस प्रकार से हांके जाते हैं कि तुम्हारी यात्रा में विलंब नहीं करते. (७)
रथं नु मारुतं वयं श्रवस्युमा हुवामहे.
आ यस्मिन्तस्थौ सुरणानि बिभ्रती सचा मरुत्सु रोदसी.. (८)
हम लोग मरुतों के उस अन्नपूर्ण रथ का आह्वान करते हैं, जिस रथ में रमणीय जलों को
धारण करने वाली मरुतों की माता बैठती है. (८)
तं वः शर्धं रथेशुभं त्वेषं पनस्युमा हुवे.
यस्मिन्त्सुजाता सुभगा महीयते सचा मरुत्सु मीळ्हुषी.. (९)
हे मरुतो! हम सुशोभित, दीप्त, स्तुतियोग्य तुम्हारे उस रथ का आह्वान करते हैं, जिस में
शोभन उत्पत्ति वाली व सौभाग्य वाली मरुन्माता विराजती है. (९)
सूक्त—५७ देवता—मरुद्गण
आ रुद्रास इन्द्रवन्तः सजोषसो हिरण्यरथाः सुविताय गन्तन.
इयं वो अस्मत्प्रति हर्यते मतिस्तृष्णाजे न दिव उत्सा उदन्यवे.. (१)
हे इंद्र से युक्त, परस्पर प्रीति संपन्न, सोने के रथों पर बैठे हुए एवं रुद्रपुत्र मरुतो! तुम
सरल गमन वाले हमारे यज्ञ में आओ. हमारी स्तुति तुम्हारी कामना करती है. जिस प्रकार
तुमने प्यासे एवं जल चाहने वाले गोतम के पास स्वर्ग से आकर जल पहुंचाया था, उसी प्रकार
तुम हमारे समीप आओ. (१)
वाशीमन्त ऋष्टिमन्तो मनीषिणः सुधन्वान इषुमन्तो निष्षङ्गिणः.
स्वश्वाः स्थ सुरथा पृश्निमातरः स्वायुधा मरुतो याथना शुभम्.. (२)
हे भक्षण साधनयुक्त, छुरी वाले, मनस्वी, शोभन-धनुष के स्वामी, बाणों वाले, तूणीर
वाले, शोभन अश्व एवं रथ वाले मरुतो! तुम लोग शोभन आयुध धारण करो. हे पृश्निपुत्र
मरुतो! तुम हमारे कल्याण के लिए आगमन करो. (२)
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