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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—४५ देवता—अश्विनीकुमार

उरुष्यतं जरितारं युवं ह श्रितः कामो नासत्या युवद्रिक्.. (७)
हे समान मन वाले अश्विनीकुमारो! हम जो स्तुति तुम्हारे समीप भेजते हैं, वह हमारे
लिए फल देने वाली हो. हे सुंदर अन्न वाले अश्विनीकुमारो! तुम स्तुति करने वाले की रक्षा
करो. हे नासत्यो! हमारी कामना तुम्हारे ही आश्रित है. (७)
सूक्त—४५ देवता—अश्विनीकुमार
एष स्य भानुरुदियर्ति युज्यते रथः परिज्मा दिवो अस्य सानवि.
पृक्षासो अस्मिन्मिथुना अधि त्रयो दृतिस्तुरीयो मधुनो वि रपशते.. (१)
यह सूर्य उदय होता है. तुम दोनों का रथ सभी ओर चलता है एवं चमकते हुए सूर्य के
साथ ऊंचे स्थान में पहुंचता है. इस रथ के ऊपरी भाग में तीन प्रकार का अन्न मिला हुआ है
तथा चौथी संख्या सोमरस से भरे हुए चमड़े के पात्र की है. (१)
उद्वां पृक्षासो मधुमन्त ईरते रथा अश्वास उषसो व्युष्टिषु.
अपोर्णुवन्तस्तम आ परीवृतं स्वर्णा शुक्लं तन्वन्त आ रजः.. (२)
तीन प्रकार के अन्न से युक्त, सोमरस-सहित एवं घोड़ों वाला तुम्हारा रथ उषा के
आरंभकाल में ही चारों ओर फैले हुए अंधकार को नष्ट करता हुआ एवं सूर्य के समान तेज
को फैलाता हुआ सामने की ओर जाता है. (२)
मध्वः पिबतं मधुपेभिरासभिरुत प्रियं मधुने युञ्जाथां रथम्.
आ वर्तनिं मधुना जिन्वथस्पथो दृतिं वहेथे मधुमन्तमश्विना.. (३)
तुम सोम पीने वाले मुखों से सोम पिओ. सोम पाने के लिए तुम अपना प्रिय रथ
अश्वयुक्त करके यजमान के घर तक लाओ. हे अश्विनीकुमारो! तुम सोमरसपूर्ण चमड़े का
पात्र धारण करके अपने मार्ग सोमरस द्वारा प्रसन्नतापूर्ण बनाओ. (३)
हंसासो ये वां मधुमन्तो अस्रिधो हिरण्यपर्णा उहुव उषर्बुधः.
उदप्रुतो मन्दिनो मन्दिनिस्पृशो मध्वो न मक्षः सवनानि गच्छथः.. (४)
तुम्हारे पास मार्ग में शीघ्र चलने वाले, माधुर्ययुक्त, द्रोह न करने वाले, सुनहरे रंग के
पंखों से युक्त, ढोने वाले, प्रातःकाल में जागने वाले, जल फैलाने वाले, प्रसन्नतादाता एवं सोम
का स्पर्श करने वाले घोड़े हैं. उन घोड़ों द्वारा तुम हमारे यज्ञों में उसी प्रकार आओ, जिस
प्रकार शहद की मक्खी शहद के पास जाती है. (४)
स्वध्वरासो मधुमन्तो अग्नय उस्रा जरन्ते प्रति वस्तोरश्विना.
यन्निहस्तस्तरणिर्विचक्षणः सोमं सुषाव मधुमन्तमद्रिभिः.. (५)
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मंत्रयुक्त जल से हाथ धोने वाले, यज्ञकर्म के पूरक एवं सभी बातों को देखने वाले
अध्वर्यु पत्थरों की सहायता से जब सोमरस निचोड़ते हैं, तब उत्तम यज्ञ के साधन एवं
सोमयुक्त गार्हपत्य आदि अग्नि एक साथ रहने वाले अश्विनीकुमारों की प्रतिदिन स्तुति करते
हैं. (५)
आकेनिपासो अहभिर्द्विध्वतः स्वर्ष्ण शुक्रं तन्वतः आ रजः.
सूरश्चिदश्वान्युयुजान ईयते विश्वाँ अनु स्वधया चेतथस्पथः.. (६)
किरणें दिवस के द्वारा अंधकार को नष्ट करती हुई सूर्य के समान उज्ज्वल तेज का
विस्तार करती हैं. हे अश्विनीकुमारो! सूर्य अपने रथ में घोड़े जोड़कर चलते हैं. तुम दोनों
सोमरस लेकर चलते हुए उनका रास्ता बताओ. (६)
प्र वामवोचमश्विना धियन्धा रथः स्वश्वो अजरो यो अस्ति.
येन सद्यः परि रजांसि याथो हविष्मन्तं तरिणं भोजमच्छ.. (७)
हे अश्विनीकुमारो! यज्ञकर्म करने वाले हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम्हारा रथ शोभन
अश्वों वाला एवं नित्य तरुण है. उसके द्वारा तुम तुरंत तीनों लोकों में घूम आते हो. उसीसे तुम
हमारे हव्ययुक्त, शीघ्रगामी एवं भोजयुक्त यज्ञ में आओ. (७)
सूक्त—४६ देवता—वायु एवं इंद्र
अग्रं पिबा मधूनां सुतं वायो दिविष्टिषु. त्वं हि पूर्वपा असि.. (१)
हे वायु! स्वर्ग प्राप्त कराने वाले यज्ञों में तुम सबसे पहले निचोड़े हुए सोमरस को पिओ.
तुम सबसे पहले सोम पीने वाले हो. (१)
शतेना नो अभिष्टिभिर्नियुत्वाँ इन्द्रसारथिः. वायो सुतस्य तृम्पतम्.. (२)
हे वायु! तुम नियुत अर्थात् लोककल्याण वाले हो एवं इंद्र तुम्हारे सारथि हैं. तुम
अगणित अभिलाषाएं पूर्ण करने हेतु आओ एवं निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (२)
आ वां सहस्रं हरय इन्द्रवायू अभि प्रयः. वहन्तु सोमपीतये.. (३)
हे इंद्र एवं वायु! सोमरस पीने के लिए हजारों घोड़े तुम्हें यहां लावें. (३)
रथं हिरण्यवन्धुरमिन्द्रवायू स्वध्वरम्. आ हि स्थाथो दिविस्पृशम्.. (४)
हे इंद्र एवं वायु! तुम स्वर्णनिर्मित आसन वाले, शोभन-यज्ञ-युक्त एवं स्वर्ग को छूने वाले
रथ पर बैठो. (४)
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रथेन पृथुपाजसा दाश्वांसमुप गच्छतम्. इन्द्रवायू इहा गतम्.. (५)
हे इंद्र एवं वायु! तुम अधिक शक्तिशाली रथ द्वारा हव्य देने वाले यजमान के समीप
पहुंचने के लिए इस यज्ञ में आओ. (५)
इन्द्रवायू अयं सुतस्तं देवेभिः सजोषासा. पिबतं दाशुषो गृहे.. (६)
हे इंद्र और वायु! तुम दोनों अन्य देवों के साथ मैत्रीपूर्ण बनकर हव्य देने वाले यजमान
के घर में इस सोम को पिओ. (६)
इह प्रयाणमस्तु वामिन्द्रवायू विमोचनम्. इह वां सोमपीतये.. (७)
हे इंद्र और वायु! तुम यहां आओ और सोमरस पीने के लिए यहां अपने घोड़े रथ से
अलग करो. (७)
सूक्त—४७ देवता—इंद्र, वायु
वायो शुक्रो अयामि ते मध्वो अग्रं दिविष्टिषु.
आ याहि सोमपीतये स्पार्हो देव नियुत्वता.. (१)
हे वायु! मैं व्रतचर्यादि द्वारा पवित्र होकर सबसे पहले तुम्हारे निमित्त मधुर सोमरस लाता
हूं, क्योंकि मैं स्वर्ग में जाना चाहता हूं. हे अभिषवणीय देव! तुम अपने अश्वों द्वारा सोमपान
के लिए यहां आओ. (१)
इन्द्रश्च वायवेषां सोमानां पीतिमर्हथः.
युवां हि यन्तीन्दवो निम्नमापो न सध्र्यक्.. (२)
हे वायु! तुम और इंद्र इन सोमों को पीने की योग्यता रखते हो. इस तरह सोम तुम दोनों
के पास जाते हैं, जैसे जल नीचे स्थान की ओर चलता है. (२)
वायविन्द्रश्च शुष्मिणा सरथं शवसस्पती.
नियुत्वन्ता न ऊतय आ यातं सोमपीतये.. (३)
हे वायु! तुम और इंद्र बल के स्वामी हो एवं घोड़ों से युक्त एक ही रथ पर चढ़ते हो. हम
लोगों की रक्षा एवं सोमपान करने के लिए यहां आओ. (३)
या वां सन्ति पुरुस्पृहो नियुतो दाशुषे नरा.
अस्मे ता यज्ञवाहसेन्द्रवायू नि यच्छतम्.. (४)
हे नेता एवं यज्ञपूर्णकर्त्ता इंद्र व वायु! तुम्हारे पास बहुतों द्वारा अभिलषित अश्व हैं, उन्हें
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