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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—२६ देवता—पवमान सोम

सूक्त—२६ देवता—पवमान सोम
तममृक्षन्त वाजिनमुपस्थे अदितेरधि. विप्रासो अण्व्या धिया.. (१)
मेधावी अध्वर्यु आदि वेगशाली सोम को धरती की गोद में अपनी उंगलियों और स्तुतियों
द्वारा मसलते हैं. (१)
तं गावो अभ्यनूषत सहस्रधारमक्षितम्. इन्दुं धर्त्तारमा दिव:.. (२)
स्तुतियां अनेक धाराओं वाले, क्षीणतारहित, दीप्तिशाली एवं स्वर्ग को धारण करने वाले
सोम की स्तुति करती हैं. (२)
तं वेधां मेधयाह्यन्यवमानमधि द्यवि. धर्णसिं भूरिधायसम्.. (३)
लोग सबको धारण करने वाले, अनेक कर्मों के कर्त्ता, विधाता एवं पवित्र होते हुए सोम
को स्वर्ग की ओर भेजते हैं. (३)
तमह्यन्भुरिजोर्धिया संवसानं विवस्वत:. पतिं वाचो अदाभ्यम्.. (४)
सेवा करने वाले ऋत्विज् पात्र में रहने वाले, स्तुतियों के स्वामी एवं अहिंसनीय सोम को
दोनों हाथों की उंगलियों के द्वारा आगे बढ़ाते हैं. (४)
तं सानावधि जामयो हरिं हिन्वन्त्यद्रिभि:. हर्यतं भूरिचक्षसम्.. (५)
उंगलियां हरे रंग वाले, सुंदर एवं बहुतों को देखने वाले सोम को ऊंचे स्थान की ओर
प्रेरित करती हैं. (५)
तं त्वा हिन्वन्ति वेधस: पवमान गिरावृधम्. इन्दविन्द्राय मत्सरम्.. (६)
हे स्तुतियों द्वारा बढ़ते हुए, दीप्तिशाली, नशीले एवं निचुड़ते हुए सोम! ऋत्विज् तुम्हें इंद्र
के पास जाने के लिए प्रेरित करते हैं. (६)
सूक्त—२७ देवता—पवमान सोम
एष कविरभिष्टुतः पवित्रे अधि तोशते. पुनानो घ्नन्नप स्रिधः.. (१)
मेधावी, चारों ओर से स्तुत एवं पवित्र होते हुए सोम शत्रुओं का विनाश करके
दशापवित्र से हरिण के काले चमड़े पर जाते हैं. (१)
एष इन्द्राय वायवे स्वर्जित्परि षिच्यते. पवित्रे दक्षसाधनः.. (२)
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सबको जीतने वाले एवं शक्तिदाता सोम को दशापवित्र पर इंद्र एवं वायु के लिए सींचा
जाता है. (२)
एष नृभिर्वि नीयते दिवो मूर्धा वृषा सुतः. सोमो वनेषु विश्ववित्.. (३)
द्युलोक के सिर के समान, अभिलाषापूरक, सर्वज्ञ, निचुड़े हुए एवं काष्ठ पात्रों में रखे हुए
सोम ऋत्विजों द्वारा अनेक प्रकार से ले जाए जाते हैं. (३)
एष गव्युरचिक्रदत् पवमानो हिरण्ययुः. इन्दुः सत्राजिदस्तुतः.. (४)
हमारे लिए गायों और धन की इच्छा करते हुए, दीप्तिशाली, असुरों को जीतने वाले एवं
स्वयं दूसरों द्वारा अहिंसित सोम निचुड़ते समय शब्द करते हैं. (४)
एष सूर्येण हासते पवमानो अधि द्यवि. पवित्रे मत्सरो मदः.. (५)
नशा करने वाले सोम जिस समय निचोड़े जाते हैं, उस समय सूर्य उन्हें द्युलोक में छोड़ते
हैं. (५)
एष शुष्यसिष्यददन्तरिक्षे वृषा हरिः. पुनाना इन्दुरिन्द्रमा.. (६)
ये शक्तिशाली, अभिलाषापूरक, हरितवर्ण, दीप्तिशाली एवं निचुड़ते हुए सोम दशापवित्र
पर गिरते हैं एवं इंद्र को प्राप्त होते हैं. (६)
सूक्त—२८ देवता—सोम
एष वाजी हितो नृभिर्विश्वविन्मनसस्पतिः. अव्यो वारं वि धावति.. (१)
ये गतिशील, अध्वर्यु द्वारा पात्र पर रखे हुए, सर्वज्ञ व स्तोत्र के स्वामी सोम भेड़ के बालों
से बने दशापवित्र पर चलते हैं. (१)
एष पवित्रे अक्षरत् सोमो देवेभ्यः सुतः. विश्वा धामान्याविशन्.. (२)
देवों के लिए निचोड़े गए सोमदेव शरीरों में प्रवेश पाने के लिए दशापवित्र पर गिरते हैं.
(२)
एष देवः शुभायतेऽधि योनावमर्त्यः. वृत्रहा देववीतमः.. (३)
ये मरणरहित, शत्रुहंता और देवों की अतिशय अभिलाषा करने वाले सोम अपने स्थान
में शोभा पाते हैं. (३)
एष वृषा कनिक्रदद्दशभिर्जामिभिर्यतः. अभि द्रोणानि धावति.. (४)
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ये अभिलाषापूरक, शब्द करने वाले एवं दस उंगलियों द्वारा पकड़े हुए सोम काष्ठ से बने
पात्र अर्थात् द्रोण कलश की ओर जाते हैं. (४)
एष सूर्यमरोचयत् पवमानो विचर्षणिः. विश्वा धामानि विश्ववित्.. (५)
ये निचोड़े जाते हुए, सबके द्रष्टा, सबको जानने वाले सोम सूर्य के साथ-साथ सभी
तेजस्वी पदार्थों को दीप्त करते हैं. (५)
एष शुष्म्यदाभ्यः सोमः पुनानो अर्षति. देवावीरघशंसहा.. (६)
ये निचोड़े हुए सोम, शक्तिशाली, अहिंसनीय, देवों के रक्षक एवं पापनाशक होकर
चलते हैं. (६)
सूक्त—२९ देवता—सोम
प्रास्य धारा अक्षरन्वृष्णः सुतस्यौजसा. देवाँ अनु प्रभूषतः.. (१)
अभिलाषापूरक, निचोड़े हुए देवों को प्रभावित करने के इच्छुक सोम की धाराएं अपनी
शक्ति से बहती हैं. (१)
सप्तिं मृजन्ति वेधसो गृणन्तः कारवो गिरा. ज्योतिर्जज्ञानमुक्थ्यम्.. (२)
स्तोता, यज्ञ करने वाले एवं कार्यकर्त्ता लोग दीप्तिशाली, बढ़े हुए, स्तुति योग्य एवं
गतिशील सोम को स्तुतियों द्वारा शुद्ध करते हैं. (२)
सुषहा सोम तानि ते पुनानाय प्रभूवसो. वर्धा समुद्रमुक्थ्यम्.. (३)
हे अधिक धन के स्वामी सोम! जब तुम शुद्ध किए जाते हो, जब तुम्हारे तेज शोभा वाले
बनते हैं, तब तुम स्तुति योग्य एवं समुद्र तुल्य द्रोणकलश को भरो. (३)
विश्वा वसूनि सञ्जयन्पवस्व सोम धारया. इनु द्वेषांसि सध्यक्.. (४)
हे सोम! समस्त धनों को हमें देने के लिए जीतते हुए धाराओं के रूप में नीचे गिरो.
सभी शत्रुओं को एक साथ दूर भगाओ. (४)
रक्षा सु नो अररुषः स्वनात्समस्य कस्य चित्. निदो यत्र मुमुच्महे.. (५)
हे सोम! दान न करने वाले एवं अन्य सभी निंदकों से हमारी रक्षा करो. ऐसे साधन द्वारा
हमारी रक्षा करो, जिससे हम मुक्त हो सकें. (५)
एन्डो पार्थिवं रयिं दिव्यं पवस्व धारया. द्युमन्तं शुष्ममा भर.. (६)
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