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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—१ देवता—अग्नि

दशम मंडल
सूक्त—१ देवता—अग्नि
अग्रे बृहन्नुषसामूर्ध्वो अस्थान्निर्जगन्वान्तमसो ज्योतिषागात्.
अग्निर्भानुना रुशता स्वङ्ग आ जातो विश्वा सद्मान्यप्राः.. (१)
महान् अग्नि प्रातःकाल में प्रज्वलित होकर ज्वाला के रूप में रहते हैं एवं अंधकार से
निकलकर अपने तेज के द्वारा यज्ञस्थल में जाते हैं. शोभन ज्वालाओं वाले एवं यज्ञ के लिए
उत्पन्न अग्नि अपने अंधकारनाशक तेज के द्वारा सभी यज्ञगृहों को पूर्ण करते हैं. (१)
स जातो गर्भो असि रोदस्योरग्ने चारुर्विभृत ओषधीषु.
चित्रः शिशुः परि तमांस्यक्तून्प्र मातृभ्यो अधि कनिक्रदद्गाः.. (२)
हे उत्पन्न, कल्याणकारक व अरणियों के मध्य विशेषरूप से मथित अग्नि! तुम द्यावा-
पृथिवी के गर्भ हो. हे विचित्र रंग वाले एवं वृक्षों के बालक अग्नि! तुम अपने तेज से अंधकार
रूप शत्रु को हराते हो. तुम माता के समान वनस्पतियों में शब्द करते हुए जन्म लेते हो. (२)
विष्णुरित्था परममस्य विद्वाञ्जातो बृहन्नभि पाति तृतीयम्.
आसा यदस्य पयो अक्रत स्वं सचेतसो अभ्यर्चन्त्यत्र.. (३)
जानते हुए, उत्पन्न, महान् एवं व्यापक अग्नि मुझ त्रित ऋषि की रक्षा करें. अपने मुख
द्वारा अग्नि से जल की याचना करने वाले यजमान तन्मय होकर अग्नि की पूजा करते हैं.
(३)
अत उ त्वा पितुभृतो जनित्रीरन्नावृधं प्रति चरन्त्यन्नैः.
ता ईं प्रत्येषि पुनरन्यरूपा असि त्वं विक्षु मानुषीषु होता.. (४)
हे अन्नवर्धक अग्नि! सारे संसार को धारण करने वाली और उत्पन्न करने वाली
ओषधियां अन्न के कारण तुम्हारी सेवा करती हैं. तुम सूखे वृक्षों के पास दावाग्नि के रथ में
जाते हो. तुम मानव प्रजाओं के होता हो. (४)
होतारं चित्ररथमध्वरस्य यज्ञस्य यज्ञस्य केतुं रुशन्तम्.
प्रत्यर्धिं देवस्य देवस्य मह्ना श्रिया त्वग्निमतिथिं जनानाम्.. (५)
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हम संपत्ति पाने के लिए देवों को बुलाने वाले, विविध रूप रथ वाले, झंडे के समान यज्ञ
के ज्ञापक, श्वेत वर्ण वाले, अपनी महत्ता से इंद्र के पास जाने वाले एवं यजमानों के पूज्य
अग्नि की शीघ्र स्तुति करते हैं. (५)
स तु वस्त्राण्यध पेशनानि वसानो अग्निर्नाभा पृथिव्याः.
अरुषो जातः पद इळायाः पुरोहितो राजन्यक्षीह देवान्.. (६)
हे दीप्तिशाली अग्नि! तुम अपने सोने के समान तेजों को धारण करते हुए धरती की
नाभि के समान उत्तर वेदी पर उत्पन्न हो. तुम शोभा धारण करके एवं पूर्व दिशा में स्थित
होकर देवों की पूजा करो. (६)
आ हि द्यावापृथिवी अग्न उभे सदा पुत्रो न मातरा ततन्थ.
प्र याह्यच्छोशतो यविष्ठाथा वह सहस्येह देवान्.. (७)
हे अग्नि! जिस प्रकार पुत्र माता-पिता को धनों से बढ़ाता है, उसी प्रकार तुम सदा
द्यावा-पृथिवी दोनों का विस्तार करते हो. हे अतिशय युवा अग्नि! तुम अपने अभिलाषी लोगों
को लक्ष्य करके जाओ. हे शक्तिपुत्र अग्नि! इस यज्ञ में देवों को लाओ. (७)
सूक्त—२ देवता—अग्नि
पिप्रीहि देवाँ उशतो यविष्ठ विद्वाँ ऋतूँर्रुतूपते यजेह.
ये दैव्या ऋत्विजस्तेभिरग्ने त्वं होतॄणामस्यायजिष्ठः.. (१)
हे अतिशय युवा अग्नि! तुम स्तुतियां सुनने के अभिलाषी देवों को प्रसन्न करो. हे
देवयज्ञों के समय के स्वामी अग्नि! इस यज्ञ में तुम यज्ञ के समयों को जानकर देवों की पूजा
करो. हे होताओं में श्रेष्ठ अग्नि! तुम देवों के पुरोहितों के साथ देवों की पूजा करो. (१)
वेषि होत्रमुत पोत्रं जनानां मन्धातासि द्रविणोदा ऋतावा.
स्वाहा वयं कृणवामा हवींषि देवो देवान्यजत्वग्निरर्हन्.. (२)
हे धन देने वाले तथा सत्ययुक्त अग्नि! तुम होता और पोता द्वारा की हुई स्तुतियों की
कामना करते हो तथा मेधावी हो. हम स्वाहा शब्द के साथ देवों को जो हवि देते हैं, उससे
दीप्तिशाली एवं प्रशंसनीय अग्नि देवों की पूजा करें. (२)
आ देवानाामपि पन्थामगन्म यच्छक्नवाम तदनु प्रवोळ्हम्.
अग्निर्विद्वान्त्स यजात्सेदु होता सो अध्वरान्त्स ऋतून्कल्पयाति.. (३)
हम देवों के मार्ग अथवा वेद-पथ पर चलें. हम जो भी कार्य आरंभ करें, उसे भली
प्रकार समाप्त कर सकें. वेद का मार्ग जानने वाले अग्नि वेदों की पूजा करें. मानवों के होता
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अग्नि यज्ञों को करें एवं उनका समय निश्चित करें. (३)
यद्वो वयं प्रमिनाम व्रतानि विदुषां देवा अविदुष्टरासः.
अग्निष्टद्विश्वमा पृणाति विद्वान्येभिर्देवाँ ऋतुभिः कल्पयाति.. (४)
हे देवो! आप अतिशय धनवान् हैं और हम अज्ञानी हैं. हमने आपसे संबंधित कर्म त्याग
दिए हैं, इसे आप जानते हैं. इस बात को जानने वाले अग्नि हमारे सभी कर्मों को पूर्ण करें.
अग्नि यज्ञ के योग्य समयों के द्वारा देवों को समर्थ बनाते हैं. (४)
यत्पाकत्रा मनसा दीनदक्षा न यज्ञस्य मन्वते मर्त्यासः.
अग्निष्टद्धोता क्रतुविद्विजानन्यजिष्ठो देवाँ ऋतुशो यजाति.. (५)
दुर्बल मनुष्य ज्ञानरहित होने के कारण जिन यज्ञकर्मों को नहीं जानते, होता एवं
अतिशय यज्ञकर्त्ता अग्नि उनको जानते हैं. वे यज्ञ के योग्य समय में देवों का यज्ञ करें. (५)
विश्वेषां ह्यध्वराणामनीकं चित्रं केतुं जनिता त्वा जजान.
स आ यजस्व नृवतीरनू क्षाःस्पार्हा इषः क्षुमतीर्विश्वजन्याः.. (६)
हे अग्नि! विधाता ने तुम्हें सभी यज्ञों के प्रधान, नाना रूप एवं ज्ञापक के रूप में उत्पन्न
किया है. तुम हमें दासों से युक्त भूमि दो. हे अभिलाषा योग्य अग्नि! तुम हमें स्तुतिमंत्रों से
युक्त और सर्व हितकारी अन्न दो. (६)
यं त्वा द्यावापृथिवी यं त्वापस्त्वष्टा यं त्वा सुजनिमा जजान.
पन्थामनु प्रविद्वान्पितृयाणं द्युमदग्ने समिधानो वि भाहि.. (७)
हे अग्नि! द्यावा-पृथिवी और अंतरिक्ष ने तुम्हें जन्म दिया. शोभन जन्म वाले प्रजापति ने
तुम्हें उत्पन्न किया. हे पितृमार्ग जानने वाले एवं प्रज्वलित अग्नि! तुम दीप्तिशाली होकर
विराजते हो. (७)
सूक्त—३ देवता—अग्नि
इनो राजन्रतिः समिद्धो रौद्रो दक्षाय सुषुमाँ अदर्शि.
चिकिद्धि भाति भासा बृहतासिक्रीमेति रुशतीमपाजन्.. (१)
हे दीप्तिशाली, सबके स्वामी, देवों के पास हवि लेकर जाने वाले, प्रज्वलित, शत्रुओं के
लिए भयानक एवं वनस्पतियों में स्थित अग्नि! तुम्हें लोग यजमानों की धनवृद्धि के लिए
देखते हैं. सबको जानने वाले अग्नि विशेष रूप से दीप्ति धारण करते हैं तथा अपने महान्
तेज के द्वारा श्वेत वर्ण की दीप्ति फैलाते हुए जाते हैं. (१)
कृष्णां यदेनीमभि वर्पसा भूज्जनयन्योषां बृहतः पितुर्जाम्.

ऊर्ध्वं भानुं सूर्यस्य स्तभायन्दिवो वसुभिररतिर्वि भाति.. (२)
अग्नि विश्व के पालक सूर्य से उत्पन्न उषा को उत्पन्न करते हुए अपनी ज्वालाओं से
काली रात को पराजित करते हैं. गमनशील अग्नि स्वर्ग में फैलने वाली अपनी किरणों द्वारा
सूर्य के प्रकाश को ऊपर रोकते हुए विशेषरूप से चमकते हैं. (२)
भद्रो भद्रया सचमान आगात्स्वसारं जारो अभ्येति पश्चात्.
सुप्रकेतैर्द्युभिरग्निर्विष्ठन्नुशद्भिर्वर्णैरभि राममस्थात्.. (३)
दीप्त उषा द्वारा सेवित कल्याणकारी अग्नि आए. इसके शत्रुओं को नष्ट करने वाले
अग्नि, अपनी बहिन उषा के पास जाते हैं. अपने शोभन ज्ञानों और दीप्त तेजों के साथ स्थित
अग्नि अपने निवारक श्वेत वर्ण के तेजों द्वारा काले अंधकार को मिटाते हैं. (३)
अस्य यामासो बृहतो न वग्नूनिन्धाना अग्नेः सख्युः शिवस्य.
ईड्यस्य वृष्णो बृहतः स्वासो भामासो यामन्नक्तवश्विकित्रे.. (४)
महान् अग्नि की दीप्तियुक्त किरणें स्तुतिकर्त्ताओं को बाधा नहीं पहुंचातीं सखा,
कल्याणकर्त्ता, स्तुतिमय, अभिलाषापूरक, महान् एवं शोभन मुख वाले अग्नि की किरणें
तीक्ष्ण होकर तप्त करने के लिए देवों के पास जाती हैं एवं प्रसिद्ध होती हैं. (४)
स्वना न यस्य भामासः पवन्ते रोचमानस्य बृहतः सुदिवः.
ज्येष्ठेभिर्यस्तेजिष्ठैः क्रीळुमद्भिर्वर्षिष्ठेभिर्भानुभिर्नक्षति द्याम्.. (५)
तेजस्वी, महान् और शोभन दीप्ति वाले अग्नि की किरणें शब्द करती हुई जाती हैं.
अग्नि अपने अत्यंत प्रशंसनीय, परम तेजस्वी, क्रीड़ा करने वाले एवं अधिक बड़े तेजों के
द्वारा स्वर्ग को व्याप्त करते हैं. (५)
अस्य शुष्मासो ददृशानपवेर्जेहमानस्य स्वनयन्नियुद्भिः.
प्रत्नेभिर्यो रुशद्भिर्देवतमो वि रेभद्भिररतिर्भाति विश्वा.. (६)
दीप्तिशाली शस्त्रों वाले और देव लोक में गमन की इच्छा वाले अग्नि की किरणें शोषक
बनकर शब्दायमान हैं एवं देवों में प्रमुख गमनशील अग्नि श्वेतवर्ण होकर अपनी दीप्ति
बिखेरते हैं. (६)
स आ वक्षि महि न आ च सत्सि दिवस्पृथिव्योररतिर्युवत्योः.
अग्निः सुतुकः सुतुकेभिरश्वै रभस्वद्भी रभस्वाँ एह गम्याः.. (७)
हे अग्नि! हमारे यज्ञ में महान् देवों को लाओ. हे परस्पर मिले हुए द्यवा-पृथिवी में सूर्य
के रथ से जाने वाले अग्नि! तुम हमारे यज्ञ में बैठो. हे स्तोताओं द्वारा सुखपूर्वक प्राप्त करने
योग्य एवं वेगशाली अग्नि! तुम सरल गति वाले एवं तीव्रगामी अश्वों द्वारा हमारे यज्ञ में आओ.
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