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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—१३ देवता—अग्नि

सूक्त—१३ देवता—अग्नि
प्रत्यग्निरुषसामग्रमख्यद्विभातीनां सुमना रत्नधेयम्.
यातमश्विना सुकृतो दुरोणमुत्सूर्यो ज्योतिषा देव एति.. (१)
शोभन मन वाले अग्नि अंधकार-विनाशिनी उषा का मनोहर प्रकाश फैलने के समय से
पहले ही बढ़ने लगते हैं. हे अश्विनीकुमारो! तुम यजमान के घर जाओ. सूर्य देव प्रकाश के
साथ आ रहे हैं. (१)
ऊर्ध्वं भानुं सविता देवो अश्रेद्दृप्सं दविध्वद्गविषो न सत्वा.
अनु व्रतं वरुणो यन्ति मित्रो यत्सूर्यं दिव्यारोहयन्ति.. (२)
सविता देव ऊपर जाने वाली किरणों का सहारा लेते हैं. किरणें जब सूर्य को आकाश
पर चढ़ाती हैं, तब वरुण, मित्र एवं अन्य देव अपने कर्म इस प्रकार प्रारंभ करते हैं, जैसे धूल
उड़ाता हुआ बैल गायों के पीछे चलता है. (२)
यं सीमकृण्वन्तमसे विपूचे ध्रुवक्षेमा अनवस्यन्तो अर्थम्.
तं सूर्यं हरितः सप्त यह्वीः स्पशं विश्वस्य जगतो वहन्ति.. (३)
सृष्टि करने वाले देवों ने संसार का कार्य न त्याग कर अंधकार को सभी प्रकार से दूर
करने के निमित्त जिस सूर्य को बनाया, हरि नामक सात महान् घोड़े समस्त प्राणियों को
जानने वाले उस सूर्य को ढोते हैं. (३)
वहिष्ठेभिर्विहरन्यासि तन्तुमवव्ययन्नसितं देव वस्म.
दविध्वतो रश्मयः सूर्यस्य चर्मेवावाधुस्तमो अप्स्व१न्तः.. (४)
हे सूर्य देव! तुम विश्व का निर्वाह करने वाला रस ग्रहण करने के लिए अपनी किरणें
फैलाते हुए एवं काले रंग की रात को नष्ट करते हुए अपने अत्यंत वेगवान् घोड़ों के सहारे
चलते हो. सूर्य की कांपती हुई किरणें आकाश के मध्य चमड़े के समान फैले हुए अंधकार को
नष्ट करती हैं. (४)
अनायतो अनिबद्धः कथायं न्यङ्ङुत्तानोऽव पद्यते न.
कया याति स्वधया को ददर्श दिवः स्कम्भः समृतः पाति नाकम्.. (५)
पास में रहने वाले, बंधनरहित एवं अधोमुख सूर्य को कोई बाधा नहीं पहुंचा सकता.
ऊर्ध्वमुख सूर्य किस शक्ति से चलते हैं? आकाश में खंभे के समान सूर्य स्वर्ग का पालन करते
हैं, इसे किसने देखा है? (५)
सूक्त—१४ देवता—अग्नि आदि

प्रत्यग्निरुषसो जातवेदा अख्यद्देवो रोचमाना महोभिः.
आ नासत्योरुगाया रथेनेमं यज्ञमुप नो यातमच्छ.. (१)
जातवेद अग्नि देव तेजों से दीप्त उषा को लक्ष्य करके बढ़ते हैं. हे परम गतिशील
अश्विनीकुमारो! तुम रथ द्वारा हमारे यज्ञ के सामने आओ. (१)
ऊर्ध्वं केतुं सविता देवो अश्रेज्ज्योतिर्विश्वस्मै भुवनाय कृण्वन्.
आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं वि सूर्यो रश्मिभिश्चिकितानः.. (२)
सारे संसार के लिए प्रकाश देते हुए सविता देव ऊर्ध्वमुखी किरणों का सहारा लेते हैं.
सूर्य ने सबको विशेष रूप से देखते हुए किरणों से धरती, आकाश और अंतरिक्ष को प्राप्त
किया है. (२)
आवहन्त्यरुणीर्ज्योतिषागान्माही चित्रा रश्मिभिश्चेकिताना.
प्रबोधयन्ती सुविताय देव्यु१षा ईयते सुयुजा रथेन.. (३)
धनों को धारण करने वाली, लाल रंग युक्त, तेजधारिणी, महान्, किरणों के कारण रंग-
बिरंगी एवं जानने वाली उषा आई थीं. उषादेवी सोए हुए प्राणियों को जगाती हुई भली प्रकार
जोते गए रथ द्वारा सुख पाने के लिए आती हैं. (३)
आ वां वहिष्ठा इह ते वहन्तु रथा अश्वास उषसो व्युष्टौ.
इमे हि वां मधुपैयाय सोमा अस्मिन्यज्ञे वृषणा मादयेथाम्.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! उषाकाल होने पर अधिक बोझा ढोने वाले एवं गतिशील घोड़े तुम्हें
इस यज्ञ में सब ओर से लावें. हे कामवर्षियो! यह सोमरस तुम्हारे पीने के लिए है. यज्ञ में
सोमपान से प्रसन्न बनो. (४)
अनायतो अनिबद्धः कथायं न्यङ्ङुत्तानोऽव पद्यते न.
कया याति स्वधया को ददर्श दिवः स्कम्भः समृतः पाति नाकम्.. (५)
पास में रहने वाले, बंधनरहित एवं ऊर्ध्वमुख-सूर्य को कोई बाधा नहीं पहुंचा सकता.
ऊर्ध्वमुख-सूर्य किस शक्ति से चलते हैं? आकाश के खंभे के समान सूर्य स्वर्ग का पालन करते
हैं, इसे किसने देखा है? (५)
सूक्त—१५ देवता—अग्नि, सोम आदि
अग्निहोता नो अध्वरे वाजी सन्परि णीयते. देवो देवेषु यज्ञियः.. (१)
देवों को बुलाने वाले, इंद्रादि देवों के मध्य तेजस्वी एवं यज्ञ के योग्य अग्नि शीघ्रगामी
अश्व के समान हमारे यज्ञ में चारों ओर से लाए जाते हैं. (१)
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परि त्रिविष्ट्यध्वरं यात्यग्नी रथीरिव. आ देवेषु प्रयो दधत्.. (२)
यजमानों द्वारा इंद्रादि देवों को दिया गया हव्य धारण करते हुए अग्नि दिन में तीन बार
रथ में बैठे पुरुष के समान चारों ओर से यज्ञ में जाते हैं. (२)
परि वाजपतिः कविरग्निर्हव्यान्यक्रमीत्. दधद्रत्नानि दाशुषे.. (३)
अन्नों का पालन करने वाले एवं मेधावी अग्नि हव्य देने वाले यजमान के लिए रमणीय
धन देते हुए हव्यों को चारों ओर से घेरते हैं. (३)
अयं यः सृञ्जये पुरो दैववाते समिध्यते. द्युमाँ अमित्रदम्भनः.. (४)
जो अग्नि देव वात के पुत्र सृजव के लिए पूर्व दिशा में प्रज्वलित होते हैं, वे शत्रुनाशक
अग्नि दीप्ति धारण करते हैं. (४)
अस्य घा वीर ईवतोऽग्नेरीशीत मर्त्यः. तिग्मजम्भस्य मीळहुषः.. (५)
स्तुति करने में कुशल मनुष्य तीखे तेज वाले, अभिलषित फल देने वाले एवं गतिशील-
अग्नि को वश में कर लें. (५)
तमर्वन्तं न सानसिमरुषं न दिवः शिशुम्. मर्मृज्यन्ते दिवेदिवे.. (६)
यजमान घोड़े के समान हव्य ढोने में समर्थ व आकाश के पुत्र सूर्य के समान तेजस्वी
अग्नि की प्रतिदिन सेवा करें. (६)
बोधन्मन्मा हरिभ्यां कुमारः साहदेव्यः. अच्छा न हूत उदरम्.. (७)
राजा सहदेव के पुत्र कुमार ने जब हमसे दोनों घोड़ों को देने की बात कही थी, तब हम
उन्हें ले आए थे. (७)
उत त्या यजता हरी कुमारात्साहदेव्यात्. प्रयता सद्य आ ददे.. (८)
सहदेव के पुत्र कुमार से हमने पूजनीय एवं गतिशील घोड़ों को उसी दिन ले लिया था.
(८)
एष वां देवावश्विना कुमारः साहदेव्यः दीर्घायुरस्तु सोमकः.. (९)
हे तेजस्वी अश्विनीकुमारो! तुम्हें तृप्त करने वाला सहदेव का पुत्र कुमार सोमक राजा
अधिक अवस्था वाला हो. (९)
तं युवं देवावश्विना कुमारं साहदेव्यम्. दीर्घायुषं कृणोतन.. (१०)
हे तेजस्वी अश्विनीकुमारो! तुम सहदेव के पुत्र कुमार को दीर्घ आयु वाला बनाओ. (१०)
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